राजकोट: बेमौसम बारिश, अनियमित मौसम और ‘ताउते’ जैसे विनाशकारी चक्रवातों जैसी जलवायु चुनौतियों के बावजूद, फलों का राजा आम सौराष्ट्र में न केवल टिके रहने में कामयाब रहा है, बल्कि तेजी से फल-फूल भी रहा है। गुजरात बागवानी विभाग के आंकड़े बताते हैं कि आम की खेती में लगातार वृद्धि हो रही है।
पिछले पांच वर्षों में इसके रकबे में लगभग 10,000 हेक्टेयर का विस्तार हुआ है, जबकि उत्पादन में 1 लाख मीट्रिक टन से अधिक की बढ़ोतरी दर्ज की गई है।
कभी केवल जूनागढ़ और गिर सोमनाथ जैसे पारंपरिक उत्पादक क्षेत्रों तक सीमित रहने वाली आम की खेती अब सौराष्ट्र की लगभग सभी तहसीलों में फैल चुकी है। किसान नवाब काल की ‘दूध पेन्डो’ और ‘बेगम पसंद’ जैसी पारंपरिक किस्मों के साथ-साथ ‘सोनपरी’ और ‘पूसा अरुणिमा’ जैसी कुछ प्रयोगात्मक संकर किस्मों को भी उगा रहे हैं। हालांकि, इस पूरे विस्तार के केंद्र में मुख्य रूप से ‘केसर’ आम ही है और इसी का सबसे ज्यादा दबदबा है।
आधिकारिक आंकड़े इस तेजी को स्पष्ट रूप से दर्शाते हैं। साल 2020-21 में केसर की खेती का रकबा लगभग 35,000 हेक्टेयर था और उत्पादन 1.89 लाख मीट्रिक टन दर्ज किया गया था। वहीं 2024-25 तक, खेती का यह क्षेत्र बढ़कर 44,000 हेक्टेयर से अधिक हो गया, जिससे उत्पादन 3.15 लाख मीट्रिक टन तक पहुंच गया। पिछले आम के मौसम सहित 2025-26 के आंकड़े अभी जारी होने बाकी हैं।
विशेषज्ञ केसर आम की इस सफलता का श्रेय इसके बेहतरीन स्वाद, सामान्य बीमारियों के प्रति प्राकृतिक प्रतिरोधक क्षमता और मजबूत निर्यात मांग को देते हैं। विशेष रूप से अमेरिका, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और यूरोप में बसे गुजराती प्रवासियों के बीच इसकी भारी मांग रहती है।
बदलते निवेश के रुझान ने भी इस कृषि विस्तार में बड़ी भूमिका निभाई है। जानकारी के अनुसार, कई अमीर और संपन्न लोग खेती की जमीन में, विशेषकर गिर क्षेत्र में, अपना पैसा लगा रहे हैं और आम की खेती का विकल्प चुन रहे हैं।
एक किसान के मुताबिक, ये लोग मुनाफे के लिए नहीं बल्कि शौक के तौर पर आम उगाते हैं। वे ऐसे आम के बाग चाहते हैं जहां वे परिवार और दोस्तों के साथ आराम कर सकें और अपने जान-पहचान वालों के बीच फल बांट सकें।
आम की खेती का नक्शा भी अब स्पष्ट रूप से बदल रहा है। जूनागढ़ कृषि विश्वविद्यालय के बागवानी महाविद्यालय के प्रिंसिपल और डीन डी. के. वरु ने बताया कि विकास के नए क्षेत्र उभर रहे हैं। युवा किसान नए प्रयोग कर रहे हैं और खेती का दायरा बढ़ा रहे हैं।
रानावाव (पोरबंदर), भाणवड और कल्याणपुर (देवभूमि द्वारका), उपलेटा (राजकोट) और अमरेली जिले के जेसर के बीच के पहाड़ी इलाकों सहित केसर उगाने वाले कई नए क्षेत्र विकसित हुए हैं। उन्होंने यह भी बताया कि भावनगर, राजकोट, मोरबी और जामनगर जैसे जिले भी अब केसर की खेती को अपना रहे हैं।
गिर क्षेत्र में एक स्थानीय किसान उत्पादक संगठन (FPO) के निदेशक तुषार धमेलिया का कहना है कि युवा किसान पारंपरिक फसलों को छोड़कर बागवानी की ओर रुख कर रहे हैं। उनके अनुसार, युवाओं की पहली पसंद केसर आम है क्योंकि यह एक नकदी फसल है और शुरुआती दो से तीन वर्षों के बाद इसमें बहुत कम अतिरिक्त देखभाल की आवश्यकता होती है।
धमेलिया ने इस बात पर भी जोर दिया कि जहां कई कृषि उपजों को अच्छी कीमत पाने के लिए संघर्ष करना पड़ता है, वहीं आम शहरी बाजार में एक बेहतर कीमत की गारंटी देते हैं। इसके साथ ही, निर्यात की अपार संभावनाएं किसानों को डॉलर में कमाई करने का एक शानदार अवसर प्रदान करती हैं।
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