“पाँव में चप्पल नहीं पहनने का… पहले मेरे हाथ मिलावे, फिर मेरे होटल में जावे, एक चाय पीने की और एक गक्खर खाने का, बस! मैंने कहा, ‘हुसैन साहब, एक साइन तो कर दो’; और उन्होंने नोट पे ‘MF Husain’ साइन किया।”
ये शब्द हैं खोजेमाभाई खंभाती के, जिनकी आवाज़ में आज भी वही गर्मजोशी है जो शायद दशकों पहले हुआ करती थी। भले ही महान चित्रकार एम.एफ. हुसैन को दुनिया छोड़े 15 साल और देश छोड़े लगभग दो दशक बीत चुके हों, लेकिन अहमदाबाद के सारसपुर इलाके में छोटी-मोटी चीज़ों की दुकान चलाने वाले खोजेमाभाई के लिए ये कल की ही बात है। उनकी यादों में हुसैन साहब आज भी उसी तरह ज़िंदा हैं।
खोजेमाभाई की ‘होटल’ आज भी वैसी ही है, जैसी 20-25 साल पहले थी। फीके पड़ चुके लैमिनेशन वाली चार सफेद मेजें, पानी की बोतलें, ब्रेड और बिस्कुट के डिब्बे। इसी मामूली सी जगह पर भारत का सबसे बड़ा कलाकार चाय की चुस्कियाँ लेने आता था।
हालांकि, हुसैन साहब का यहाँ आने का मुख्य कारण कुछ और था। दुकान के ठीक बगल में सुलेमानी आध्यात्मिक प्रमुख की दरगाह है, जो उन्हें यहाँ खींच लाती थी। दरगाह के एक संरक्षक, सलीम सुलेमानी बताते हैं, “हुसैन साहब को यहाँ सुकून मिलता था।” अगर हुसैन आज जीवित होते, तो बुधवार को अपना 110वाँ जन्मदिन मना रहे होते।
अहमदाबाद के कला संग्राहक अनिल रेलिया, जिनके पास हुसैन के कामों का एक निजी संग्रह है, उन दिनों को याद करते हुए कहते हैं कि कैसे वो दोनों शहर के पुराने टेक्सटाइल मिल हब सारसपुर आते थे।
रेलिया बताते हैं, “हुसैन एक संरक्षक से पीतल की एक लंबी चाबी लेते और हम दरगाह पर जाते। चाबी को सात बार घुमाने पर, हर बार एक क्लिक की आवाज़ के साथ, लकड़ी का दरवाज़ा खुलता। हुसैन अंदर जाकर प्रार्थना करते और मैं बाहर इंतज़ार करता।”
रेलिया के अनुसार, हुसैन ने उस दरगाह के लिए सोने की नक्काशी वाला एक चाँदी का दरवाज़ा भी डिजाइन किया था, जिसने पुराने लकड़ी के दरवाजे की जगह ली। यह दरगाह सुलेमानी बोहरा समुदाय के आध्यात्मिक नेता सैयद सुलेमान बिन हसन की है, और हुसैन भी इसी समुदाय से ताल्लुक रखते थे।
अहमदाबाद के साथ हुसैन का रिश्ता सिर्फ इस दरगाह तक ही सीमित नहीं था। अनिल रेलिया के पास 1970 के दशक के हुसैन के बनाए कुछ दुर्लभ रेखाचित्र भी हैं, जिनमें पुराने अहमदाबाद की आत्मा बसती है। इन रेखाचित्रों में तीन दरवाज़ा, रायपुर का मशहूर भजिया हाउस, पुरानी पोल की गलियाँ और रोज़मर्रा की ज़िंदगी को काली स्याही से कागज़ पर उतारा गया है।
इन तस्वीरों में शहर की बारीकियां भी कैद हैं, जैसे एक रेडीमेड कपड़ों की दुकान का साइनबोर्ड, जिस पर गुजराती में लिखा है, ‘सिली हुई और पूरी धोतियाँ उपलब्ध हैं’।
रायपुर के भजिया हाउस वाले एक चित्र में गुजराती में एक नारा लिखा है, ‘कठोर परिश्रम नो कोई विकल्प नथी’ (कड़ी मेहनत का कोई विकल्प नहीं है)। एक अन्य चित्र में, एक बैलगाड़ी पर बैठे जोड़े के साथ 21 नवंबर, 1976 की तारीख भी अंकित है। इनमें से ज़्यादातर कलाकृतियों पर हुसैन ने गुजराती में अपने हस्ताक्षर किए हैं।
रेलिया कहते हैं, “वह लगभग 2002 में इन्हें मेरे पास लाए थे; उस समय भी कागज़ पीले पड़ चुके थे। वह इन्हें एक दस्तावेज़ में संकलित करना चाहते थे, लेकिन यह काम अधूरा ही रह गया।”
हुसैन और रेलिया का रिश्ता 1990 के दशक के मध्य में तब शुरू हुआ जब हुसैन अपनी फिल्म ‘गज गामिनी’ के फ्रेम प्रिंट करने के लिए एक ग्राफिक आर्टिस्ट की तलाश में थे। प्रित्ज़कर पुरस्कार विजेता वास्तुकार बालकृष्ण दोशी ने ही हुसैन को रेलिया से मिलवाया था, और यह मुलाकात जीवन भर की दोस्ती में बदल गई।
इससे पहले 1992 में, इन दोनों दिग्गजों (हुसैन और दोशी) ने मिलकर CEPT विश्वविद्यालय के पास ‘हुसैन-दोशी गुफा’ का निर्माण किया था। दोशी ने इस अनूठी गुफा जैसी संरचना को डिजाइन किया और हुसैन ने इसकी भीतरी दीवारों और छत को अपनी खास शैली में मानव आकृतियों, जानवरों और घोड़ों से सजाया। बाद में हुसैन ने ही इसका नाम बदलकर ‘अमदावाद-नी-गुफा’ करने का फैसला किया।
1996 में, देवी-देवताओं पर हुसैन के कामों का विरोध कर रहे बजरंग दल के कार्यकर्ताओं ने इस गुफा में तोड़फोड़ की थी। रेलिया उस पल को याद करते हुए कहते हैं, “हुसैन अपनी कला के नुकसान से ज़्यादा गुफा में काम करने वाले लोगों की सुरक्षा को लेकर चिंतित थे। उन्होंने मुझसे यह सुनिश्चित करने के लिए कहा कि उन लोगों का ध्यान रखा जाए।”
सारसपुर से लगभग पाँच किलोमीटर दूर, 16वीं सदी की प्रसिद्ध सिदी सैयद मस्जिद के ठीक सामने, हुसैन का एक और पसंदीदा अड्डा था – ‘लकी टी स्टॉल’। एक कब्रिस्तान के चारों ओर बना यह चाय का स्टॉल आज भी वैसा ही है।
यहाँ 16 साल से काम कर रहे एक कर्मचारी ने अपना नाम न बताते हुए कहा, “यहाँ 26 कब्रों के चारों ओर मेजें लगी हैं। हुसैन साहब चाय पीने आते थे और 2004 में उन्होंने मालिक को यह पेंटिंग दी थी।”
अनिल रेलिया, जिन्हें हुसैन प्यार से ‘बाबा’ कहते थे, बताते हैं कि यह पेंटिंग हुसैन ने उनके घर पर ही बनाई थी। उन पलों की तस्वीरें आज भी रेलिया ने सहेज कर रखी हैं। उन दिनों हुसैन, दोशी और एक अन्य प्रसिद्ध कलाकार अमित अंबालाल के साथ अक्सर ‘लकी टी स्टॉल’ पर चाय पीने जाया करते थे।
हुसैन का गुजरात से गहरा नाता था। उनका ननिहाल पाटन के सिद्धपुर में था और वह महज़ छह साल की उम्र में पहली बार अहमदाबाद आए थे। उन्हें पढ़ाई के लिए वडोदरा के एक मदरसे में भेजा गया, लेकिन उनका मन चित्रकारी में ही रमा।
1991 में पद्म विभूषण से सम्मानित हुसैन, अपने कामों पर हुए विवादों के बाद 2006 में देश छोड़कर चले गए। उन्होंने अपना आखिरी समय कतर, दुबई और लंदन में बिताया। 9 जून, 2011 को जब उनका निधन हुआ, तब अनिल रेलिया लंदन में ही उनके साथ एक प्रोजेक्ट पर काम कर रहे थे। उन्होंने लंदन के सरे स्थित ब्रुकवुड कब्रिस्तान में इस महान कलाकार को अंतिम विदाई दी।
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