भोपाल के फुटबॉल कोच परम आशावर के लिए अब बैंक से लोन की किश्त चुकाने के रिमाइंडर आना आम बात हो गई है। ‘चक दे! इंडिया’ फिल्म के कबीर खान की ही तरह, इस 36 वर्षीय एनआईएस (NIS) प्रमाणित कोच ने अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया है। ग्रामीण मध्य प्रदेश की वंचित लड़कियों की एक टीम को निखारने के लिए उन्होंने 10 लाख रुपये का बड़ा कर्ज लिया।
उनके इस जोखिम भरे फैसले का बेहद शानदार नतीजा सामने आया है। इस टीम ने आर्थिक बाधाओं को तोड़ते हुए इतिहास रच दिया और एलीट इंडियन विमेंस लीग (IWL) के टियर 2 में अपनी जगह पक्की कर ली।
डिस्ट्रिक्ट रायसेन फुटबॉल क्लब (DRFC) की यह ऐतिहासिक सफलता सिर्फ लड़कियों की प्रतिभा का परिणाम नहीं है, बल्कि यह परम के अटूट विश्वास और उनके त्याग की कहानी है। कोच ने अपना सारा निजी कर्ज इन युवा खिलाड़ियों की ट्रेनिंग किट, यात्रा और कैंप के खर्चों को पूरा करने में लगा दिया।
इन होनहार लड़कियों ने भी अपने कोच को निराश नहीं किया और उनके हर त्याग का मोल चुकाया। पिछले महीने खेले गए IWL क्वालिफिकेशन राउंड में उन्होंने शानदार प्रदर्शन किया। अपने इस अभियान के दौरान उन्होंने ओडिशा एफसी जैसी बेहद अनुभवी और मजबूत टीम को भी धूल चटा दी।
अपने पहले IWL क्वालिफिकेशन अभियान में डीएआरएफसी (DRFC) की टीम पूल में संयुक्त रूप से तीसरे स्थान पर रही। एक जीत और एक ड्रॉ के साथ टीम ने कुल चार अंक हासिल करके सभी को चौंका दिया।
टूर्नामेंट से लौटने के बाद कोच परम ने बताया कि इन लड़कियों के अंदर कुछ कर गुजरने का जज्बा था, लेकिन इनके पास संसाधनों की भारी कमी थी। वह इनकी प्रतिभा को यूं ही बर्बाद होते हुए नहीं देख सकते थे। खेल में इन बच्चियों का भविष्य सुरक्षित करने के लिए लिया गया कर्ज उनके लिए एक बहुत छोटी सी कीमत है।
रायसेन की टीम को इस टूर्नामेंट में एक बेहद कड़े पूल में रखा गया था। इसके बावजूद उन्होंने कई मौकों पर दिग्गजों को चौंकाया, जिसमें ओडिशा एफसी के खिलाफ 1-0 की रोमांचक जीत सबसे अहम रही।
इस ऐतिहासिक जीत में निर्णायक गोल दागने वाली फॉरवर्ड खिलाड़ी सोनी मुंडा ने इस सफलता का पूरा श्रेय अपने कोच को दिया है। टीम की एक अन्य खिलाड़ी ने कहा कि कोच परम उनके असली हीरो हैं और वे उनके समर्पण को कभी नहीं भूलेंगी। खिलाड़ियों का कहना है कि अगले साल वापसी करके वे अपने कोच के लिए ट्रॉफी जीतने की पूरी कोशिश करेंगी।
अपने ऊपर लदे कर्ज के भारी बोझ के बावजूद परम पूरी तरह से बेफिक्र नजर आते हैं। उनका कहना है कि अगर टीम को आगे ले जाने के लिए उन्हें और भी कर्ज लेना पड़े, तो वह खुशी-खुशी ऐसा करेंगे।
कोच को नहीं पता कि वह यह कर्ज कैसे चुकाएंगे, लेकिन उन्हें इस बात की जरा भी चिंता नहीं है। उनकी टीम की जीत ने उनकी सारी परेशानियां दूर कर दी हैं। परम का दृढ़ संकल्प है कि वह मध्य प्रदेश में महिला फुटबॉल की बेहतरी के लिए तब तक प्रयास करते रहेंगे, जब तक यहां खेलने वाली हर लड़की बड़े सपने देखने का साहस नहीं जुटा लेती।
मध्य प्रदेश फुटबॉल एसोसिएशन ने डीएआरएफसी (DRFC) की इस उपलब्धि को जमीनी स्तर के खेलों, विशेषकर महिलाओं के लिए एक बड़ा मील का पत्थर बताया है। एआईएफएफ (AIFF) के सचिव अमित रंजन देव ने इस कहानी को प्रेरणादायक बताते हुए कहा कि यह साबित करता है कि जुनून हमेशा पैसे पर भारी पड़ता है।
बंगाल और मणिपुर जैसे फुटबॉल के दिग्गजों के साये में लंबे समय तक रहने वाले मध्य प्रदेश के लिए अब एक नया और ऊंचा मानदंड स्थापित हो गया है। कोच परम भी तब तक रुकने वाले नहीं हैं, जब तक उनकी लड़कियां IWL का खिताब जीतकर घर नहीं ले आतीं।
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