राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) प्रमुख मोहन भागवत के तीन दिवसीय व्याख्यानमाला (दिल्ली) से एक सप्ताह पहले, संगठन के आर्थिक क्षेत्र में काम करने वाले छह संगठनों के लगभग 80 प्रतिनिधियों के लिए एक बंद-दरवाजा बैठक आयोजित की गई। इसमें देश की सामाजिक और आर्थिक स्थिति पर चर्चाएं की गईं।
मुरली मनोहर जोशी बने मुख्य वक्ता
इस बैठक में विशेष आमंत्रित और मुख्य वक्ता रहे भारतीय जनता पार्टी (BJP) के पूर्व अध्यक्ष मुरली मनोहर जोशी (91), जिन्हें मोदी-शाह नेतृत्व के बाद पार्टी के निष्क्रिय ‘मार्गदर्शक मंडल’ में भेज दिया गया था। जोशी ने करीब 70 स्लाइड्स के माध्यम से देश की अर्थव्यवस्था, आय असमानता और प्रति व्यक्ति जीडीपी की स्थिति पर विस्तार से बात की।
उन्होंने अर्थशास्त्री और नोबेल पुरस्कार विजेता अमर्त्य सेन का हवाला देते हुए कहा कि किसी राष्ट्र की सफलता केवल आर्थिक वृद्धि से नहीं मापी जानी चाहिए, बल्कि लोगों के संपूर्ण कल्याण पर भी ध्यान देना जरूरी है।
‘डिग्रोथ’ का प्रस्ताव
जोशी ने ‘डिग्रोथ’ (Degrowth) की अवधारणा प्रस्तुत की। इसका अर्थ है सार्वजनिक विमर्श को केवल आर्थिक विकास पर केंद्रित रखने की प्रवृत्ति से बाहर निकालकर, समाज को ‘साझेदारी’, ‘सादगी’, ‘देखभाल’ और ‘सामूहिकता’ जैसे मूल्यों की दिशा में संगठित करना।
भागवत ने जोशी की प्रस्तुति की सराहना करते हुए कहा कि “जोशी जी ने सब कुछ कह दिया है।”
बैठक का स्वरूप और प्रतिभागी
यह बैठक 19-20 अगस्त को हुई, जिसका समन्वय भारतीय मजदूर संघ (BMS) के संगठन मंत्री बी सुरेंद्रन ने किया। इसमें भारतीय किसान संघ, सहकार भारती, ग्राहक पंचायत, स्वदेशी जागरण मंच और लघु उद्योग भारती के प्रतिनिधि भी मौजूद रहे।
RSS के सह-सरकार्यवाह कृष्ण गोपाल, सी.आर. मुकुंद, अरुण कुमार, रामदत्त चक्रधर, अतुल लिमये और आलोक कुमार लगातार बैठक में उपस्थित रहे।
इसके अलावा RSS विचारक एस गुरुमूर्ति, BJP महासचिव (संगठन) बी.एल. संतोष, BJP महासचिव अरुण सिंह, प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के सदस्य संजीव सान्याल और उत्तर प्रदेश के वित्त मंत्री सुरेश खन्ना भी आमंत्रित अतिथियों में शामिल थे।
आय असमानता और प्रति व्यक्ति आय पर चिंता
जोशी ने बताया कि वर्ष 2021 में भारत की शीर्ष 10% आबादी के पास कुल घरेलू संपत्ति का 65% हिस्सा था। भारत की प्रति व्यक्ति जीडीपी मात्र 2,878.5 डॉलर रही, जबकि जापान की 33,955.7 डॉलर थी।
उन्होंने यह भी कहा कि भारत चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने के बावजूद प्रति व्यक्ति आय के मामले में काफी पीछे है।
दीनदयाल उपाध्याय का हवाला
जनसंघ संस्थापक दीनदयाल उपाध्याय और उनकी ‘एकात्म मानववाद’ की विचारधारा का उल्लेख करते हुए जोशी ने कहा कि विदेशी देशों पर अत्यधिक निर्भरता भारत के हित में नहीं है। उन्होंने जोर दिया कि हमें कृषि और स्वदेशी उद्योगों पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए, न कि केवल विदेशी सहयोग पर।
नशाखोरी और आत्महत्याओं पर चेतावनी
जोशी ने आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया कि देश में 10 से 17 वर्ष आयु वर्ग के 1.58 करोड़ बच्चे नशे की गिरफ्त में हैं। एम्स के एक अध्ययन के मुताबिक दिल्ली के एक-तिहाई सड़क बच्चों द्वारा नशा और शराब का सेवन किया जाता है। गृहमंत्री अमित शाह का भी बयान उद्धृत किया गया कि 7% भारतीय नशे की चपेट में हैं।
आत्महत्याओं पर बोलते हुए उन्होंने कहा कि NCRB के अनुसार, 2018 में 1.34 लाख आत्महत्याएँ हुईं, जो 2022 में बढ़कर 1.70 लाख हो गईं। 2019 से 2021 के बीच 35,950 छात्रों ने आत्महत्या की। वहीं, 2018 से 2023 तक IIT, IIM और केंद्रीय विश्वविद्यालयों जैसे संस्थानों में 98 छात्रों ने जान दी।
शिक्षा और रोजगार की स्थिति
जोशी ने कहा कि भारत का उच्च शिक्षा स्तर पर सकल नामांकन अनुपात (GER) 32.7% है, जबकि 1995 में यह मात्र 5.5% था। हालांकि यह प्रगति है, लेकिन पोलैंड (75.3%) और जापान (64.6%) जैसे देशों से बहुत पीछे है।
उन्होंने यह भी बताया कि भारत की 43.5% कार्यबल कृषि क्षेत्र में है, जबकि पोलैंड में यह 7.6% और जापान में मात्र 3% है। वहीं, भारत के उद्योग क्षेत्र में 25.03% और सेवा क्षेत्र में 31.5% लोग काम करते हैं। तुलना में जापान के आंकड़े क्रमशः 73.3% और 62.8% हैं।
भारत में केवल 23.9% लोग वेतनभोगी कर्मचारी हैं, जबकि पोलैंड में यह संख्या 80.1% और जापान में 90.5% है।
कृत्रिम बुद्धिमत्ता और जलवायु संकट
जोशी ने चेतावनी दी कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) सामाजिक असमानताओं को और गहरा कर सकता है। साथ ही, उन्होंने उत्तराखंड, जम्मू और हिमाचल प्रदेश में हाल की प्राकृतिक आपदाओं का उल्लेख करते हुए जलवायु आपातकाल का जिक्र किया।
उन्होंने कहा कि पश्चिमी आर्थिक मॉडल विफल हो चुका है और संयुक्त राष्ट्र भी युद्ध जैसी चुनौतियों का समाधान नहीं कर पा रहा। असम, बिहार और सुंदरबन जैसे क्षेत्र जलवायु-प्रेरित पलायन के नए केंद्र बन सकते हैं।
यह भी पढ़ें- सुप्रीम कोर्ट ने उठाए सवाल: अल्पसंख्यक स्कूलों को आरटीई एक्ट से छूट पर फिर से विचार जरूरी









