नागपुर: 15 जनवरी को होने वाले नागपुर नगर निगम चुनावों से ठीक पहले भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को अपने ही गढ़ में जबरदस्त आंतरिक कलह का सामना करना पड़ रहा है। शहर के प्रभाग 16 (डी) में पार्टी के संगठनात्मक ढांचे को करारा झटका लगा है, जहां 80 से अधिक कार्यकर्ताओं ने सामूहिक रूप से इस्तीफा दे दिया है। सूत्रों का दावा है कि आने वाले दिनों में शहर के अन्य हिस्सों से भी और इस्तीफे देखने को मिल सकते हैं।
स्थानीय नेताओं की अनदेखी से बढ़ा आक्रोश
प्रभाग के पूर्व भाजपा अध्यक्ष गजानन निशितकर ने मीडिया से बात करते हुए पुष्टि की कि अब तक कुल 80 कार्यकर्ताओं ने पार्टी छोड़ी है, जिनमें 45 पदाधिकारी शामिल हैं। निशितकर ने अपनी पीड़ा व्यक्त करते हुए कहा कि 2017 के चुनावों में भी उनका टिकट काटा गया था और इस बार भी वही कहानी दोहराई गई है।
उन्होंने कहा, “इस बार यह सीट ओपन थी और मैं इसका प्रबल दावेदार था। प्रभाग में सबसे अधिक (24) बूथ मेरे ही क्षेत्र में आते हैं। मुझे बार-बार दस्तावेज़ तैयार रखने के लिए कहा गया और वरिष्ठ नेताओं ने भी प्रयास किए। लेकिन अंत में, टिकट एक ऐसी महिला उम्मीदवार को दे दिया गया जो न तो स्थानीय हैं और न ही इस प्रभाग की निवासी हैं।”
सोशल मीडिया तक सीमित है विरोध: भाजपा अध्यक्ष
जहां एक तरफ इस्तीफों की झड़ी लगी है, वहीं भाजपा की नागपुर इकाई के अध्यक्ष दयाशंकर तिवारी ने इसे ज्यादा तूल न देने की कोशिश की। उन्होंने कहा, “जो भी इस्तीफे की खबरें आ रही हैं, वे केवल सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म तक ही सीमित हैं। मुझे व्यक्तिगत रूप से किसी का लिखित इस्तीफा नहीं मिला है, इसलिए अभी इस मामले पर कोई टिप्पणी करना उचित नहीं होगा।”
पूर्व मेयर के घर मची पारिवारिक कलह
टिकट बंटवारे के तनाव ने नेताओं के निजी जीवन को भी प्रभावित किया है। पूर्व मेयर अर्चना डेहनकर के आवास पर बुधवार को भारी ड्रामा देखने को मिला। उनके पति विनायक डेहनकर द्वारा भाजपा से इस्तीफा देने और निर्दलीय चुनाव लड़ने के फैसले से नाराज होकर अर्चना घर छोड़कर अपने मायके चली गईं।
विनायक डेहनकर ने बताया कि वह 1984 से भाजपा के कार्यकर्ता हैं, उस दौर से जब यह क्षेत्र कांग्रेस का गढ़ हुआ करता था। उन्होंने कहा, “मैंने जमीनी स्तर पर संगठन को खड़ा करने के लिए खून-पसीना एक किया है। मेरी पत्नी को पहले टिकट मिला और वह जीतीं भी। लेकिन इस बार प्रभाग 17 में नए स्थानीय कार्यकर्ताओं को मौका देने के बजाय बाहरी लोगों को टिकट दिया गया, जिनमें एक पूर्व कांग्रेसी भी शामिल है। मैं इस फैसले से बहुत आहत हूं।”
उन्होंने आगे कहा कि पार्टी ने जिन चार उम्मीदवारों को मैदान में उतारा है, उनमें से कोई भी स्थानीय नहीं है। इसी वजह से उन्होंने बगावत का रास्ता चुना है।
विदर्भ में गठबंधन की रस्साकशी
सिर्फ भाजपा ही नहीं, बल्कि विदर्भ के प्रमुख नगर निगमों में पूरा राजनीतिक परिदृश्य बंटा हुआ नजर आ रहा है। गठबंधनों में दरारें पड़ चुकी हैं और कई दल अब ‘एकला चलो’ की राह पर हैं।
नागपुर: यहां भाजपा और शिवसेना (शिंदे गुट) का गठबंधन बरकरार है, लेकिन सीटों का बंटवारा असमान है। भाजपा ने 143 उम्मीदवारों की घोषणा की है, जबकि शिवसेना को सिर्फ 8 सीटें मिली हैं। वहीं, विपक्ष पूरी तरह बिखरा हुआ है। एनसीपी ने अकेले लड़ने का फैसला किया, जबकि कांग्रेस ने लगभग 100 और एनसीपी (शरद पवार गुट) ने 79 उम्मीदवार उतारे हैं। शिवसेना (यूबीटी) भी स्वतंत्र रूप से मैदान में है।
धोखे का आरोप: एनसीपी (शरद पवार गुट) के सूत्रों का आरोप है कि कांग्रेस के साथ सीट शेयरिंग का फॉर्मूला तय हो गया था, लेकिन आखिरी दिन कांग्रेस ने बिना सूचना दिए एनसीपी के लिए छोड़ी गई सीटों पर भी अपने उम्मीदवारों को ‘बी-फॉर्म’ जारी कर दिए। इसे भाजपा को फायदा पहुंचाने की कोशिश बताया जा रहा है।
अन्य शहरों का हाल
- चंद्रपुर: यहां 66 सीटों के लिए भाजपा (57) और शिवसेना (9) का गठबंधन जारी है। वहीं कांग्रेस ने अधिकांश सीटें अपने पास रखते हुए जन विकास सेना को केवल 3 सीटें दी हैं।
- अकोला: राजनीतिक मुकाबला बहुकोणीय हो गया है। भाजपा (66) और एनसीपी (अजित पवार गुट-14) साथ हैं। कांग्रेस (55) और एनसीपी (शरद पवार गुट) मिलकर लड़ रहे हैं। जबकि शिवसेना (शिंदे) और शिवसेना (यूबीटी) अलग-अलग मैदान में हैं।
- अमरावती: यहां महायुति और महाविकास अघाड़ी, दोनों ही गठबंधन पूरी तरह से टूट चुके हैं। सभी प्रमुख दल—भाजपा (75), कांग्रेस (74), एनसीपी (82) और शिवसेना (69)—स्वतंत्र रूप से अपनी किस्मत आजमा रहे हैं।
विदर्भ में टूटे गठबंधनों और बागी सुरों के बीच इस बार का निकाय चुनाव बेहद दिलचस्प और संघर्षपूर्ण होने की उम्मीद है।
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