फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड अथॉरिटी ऑफ इंडिया (FSSAI) की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाना मशहूर यूट्यूबर नलिनी उनागर के लिए बड़ी मुसीबत बन गया है। उनके एक तीखे पोस्ट के बाद दिल्ली पुलिस ने उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज कर ली है। नलिनी ने अपने पोस्ट में बाजार में धड़ल्ले से बिक रहे नकली पनीर और दूध के मुद्दे को उठाते हुए देश के सर्वोच्च खाद्य नियामक की भूमिका पर कड़ी आपत्ति जताई थी।
उन्होंने अपने अब हटाए जा चुके पोस्ट में लिखा था कि बाजार में नकली दूध, पनीर, सब्जियां और तेल खुलेआम बेचे जा रहे हैं। उनका कहना था कि पूरे एफएसएसएआई विभाग को बर्खास्त कर देना चाहिए क्योंकि ऐसा लगता ही नहीं कि भारत में उनका कोई अस्तित्व बचा है। नलिनी ने इसे अपना व्यक्तिगत हमला नहीं, बल्कि उन 140 करोड़ भारतीयों का गुस्सा बताया था जिन्हें हर दिन नकली खाना परोसा जा रहा है।
यह कानूनी कार्रवाई एफएसएसएआई के एक प्रतिनिधि की शिकायत के बाद की गई है। पुलिस ने भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 316(4) और 3(5) तथा आईटी एक्ट की धारा 72A के तहत मामला दर्ज किया है। इस इन्फ्लुएंसर और कुछ अन्य लोगों पर आपराधिक विश्वासघात और निजी डेटा के दुरुपयोग जैसे गंभीर आरोप लगाए गए हैं।
डीसीपी (सेंट्रल) रोहित राजबीर सिंह ने बताया कि शिकायत में सोशल मीडिया पर एफएसएसएआई के दस्तावेजों को अनधिकृत रूप से प्रसारित करने की बात कही गई है। इसमें कुछ इन्फ्लुएंसर्स और अज्ञात लोगों की संलिप्तता का आरोप है, साथ ही कुछ दस्तावेजों से छेड़छाड़ की आशंका भी जताई गई है।
पुलिस फिलहाल दस्तावेजों की प्रामाणिकता और इसमें शामिल सभी लोगों की भूमिका की गहन जांच कर रही है।
हालांकि, नलिनी उनागर ने एफएसएसएआई से जुड़े किसी भी सरकारी दस्तावेज के प्रसार की जानकारी होने से साफ इनकार किया है। गुरुवार को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर उन्होंने एक और पोस्ट लिखकर अपना बचाव किया और एफआईआर पर सवाल उठाए।
मानसिक तनाव का हवाला देते हुए उन्होंने बताया कि वह अपने कई पुराने पोस्ट हटा रही हैं और भविष्य में शायद पूरी तरह खामोश ही रहें।
इस घटना पर सोशल मीडिया यूजर्स की तरफ से मिली-जुली प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। कुछ लोग इसे सरकार की आलोचना को दबाने का प्रयास मान रहे हैं, जबकि कई लोग तंज कसते हुए कह रहे हैं कि इसी एफआईआर ने नलिनी को रातों-रात और भी ज्यादा मशहूर कर दिया है।
इस बीच दिल्ली पुलिस ने एक्स से संपर्क करके नलिनी और नियामक की छवि खराब करने वाले अन्य यूजर्स के अकाउंट की आधिकारिक जानकारी मांगी है।
नलिनी ने एक मीडिया बातचीत में बताया कि वह हमेशा से बाजार में बिक रहे मिलावटी उत्पादों के खिलाफ अपनी आवाज उठाती रही हैं। उनका दावा है कि वह अक्सर अपनी पोस्ट में एफएसएसएआई और उसके सीईओ को टैग करके कार्रवाई की मांग करती हैं, लेकिन कोई ठोस कदम नहीं उठाया जाता।
उनका मानना है कि शायद उनके शब्द थोड़े सख्त हो गए थे, लेकिन इसके बदले उन पर सीधे मुकदमा ठोक दिया गया।
नलिनी का डिजिटल सफर साल 2021 में उनके यूट्यूब चैनल ‘नलिनीज किचन रेसिपी’ के साथ शुरू हुआ था। उन्होंने 250 से ज्यादा कुकिंग वीडियो बनाने में करीब 8 लाख रुपये का निवेश किया था। हालांकि, तीन साल की कड़ी मेहनत के बाद भी उन्हें सिर्फ 2000 सब्सक्राइबर मिले और उनकी कोई कमाई नहीं हुई।
साल 2024 में उन्होंने यूट्यूब छोड़ दिया और माइक्रोब्लॉगिंग साइट एक्स का रुख किया। यहां सामाजिक और उपभोक्ता अधिकारों के मुद्दों पर उनके बेबाक विचारों ने उन्हें जल्द ही करीब 2 लाख फॉलोअर्स दिला दिए। उन्होंने अक्सर खाद्य नियामक पर अपना गहरा अविश्वास जताया है।
इसी साल मार्च में उन्होंने स्पष्ट रूप से लिखा था कि एफएसएसएआई पूरी तरह से बेकार संस्था है और अब वह उस पर बिल्कुल भरोसा नहीं कर सकतीं।
पिछले महीने ही नलिनी ने बाजार के केमिकल वाले उत्पादों से बचने के लिए 10 किलो आलू काटकर घर पर वेफर्स बनाने का एक वीडियो साझा किया था। इसके अलावा उन्होंने एफएसएसएआई के लाइसेंस को स्थायी बनाने के सरकार के फैसले पर भी गहरी चिंता जताई थी। उन्होंने सवाल किया था कि जिस देश में खाद्य पदार्थों में मिलावट इतनी आम है, वहां पांच या दस साल बाद उत्पादों की गुणवत्ता की जांच कौन सुनिश्चित करेगा।
जनवरी में उन्होंने एक्स पर यह भी बताया था कि वह पैकेट बंद डेयरी उत्पादों पर जरा भी भरोसा नहीं करतीं। इसी वजह से उनका परिवार सीधे ताजा दूध लेकर आता है और घर पर ही मक्खन तथा घी तैयार करता है। अपने पोस्ट्स में उन्होंने 2015 के चर्चित मैगी विवाद का भी जिक्र किया था, जहां उन्होंने लेड के स्तर को लेकर नेस्ले कंपनी की तीखी आलोचना की थी।
पुलिस की एफआईआर के तुरंत बाद नलिनी ने अपना वह विवादित ट्वीट हटा दिया। उन्होंने स्पष्ट किया कि पारिवारिक जिम्मेदारियों और कानूनी पचड़ों से खुद को दूर रखने के लिए उन्होंने यह कदम उठाया है। इसके साथ ही उन्हें एक्स की तरफ से एक ईमेल भी मिला था, जिसमें उन्हें कानूनी सलाह लेने या स्वेच्छा से अपना कंटेंट हटाने जैसे कई विकल्प सुझाए गए थे।
नलिनी का कहना है कि उन्होंने देश में खाद्य सुरक्षा को बेहतर बनाने के लिए कई व्यावहारिक समाधान भी सुझाए थे, लेकिन उन पर किसी ने ध्यान नहीं दिया। उन्होंने एफएसएसएआई से अपील की थी कि सिंगापुर के ‘न्यूट्री-ग्रेड’ जैसी सरल और पारदर्शी लेबलिंग प्रणाली को अपनाया जाए।
यह प्रणाली उत्पादों को ए से डी तक का ग्रेड देती है, जिससे कोई भी ग्राहक तुरंत उत्पाद की पोषण गुणवत्ता समझ सकता है।
उन्होंने वर्तमान पैकेजिंग रणनीतियों और मशहूर हस्तियों के विज्ञापनों को बेहद भ्रामक करार दिया। उन्होंने उदाहरण दिया कि कैसे “ताजा जूस” के नाम पर बेचे जा रहे उत्पादों में भारी मात्रा में चीनी छिपाई जाती है।
अपनी बात साबित करने के लिए उन्होंने कोका-कोला के डिब्बे का उदाहरण भी दिया, जिसे अपनी खराब न्यूट्रिशन वैल्यू के कारण सिंगापुर में डी-ग्रेड मिला हुआ है।
कई सोशल मीडिया यूजर्स ने उनके इस विचार का खुलकर समर्थन किया है। उनका मानना है कि इससे भारत में आम तौर पर बिकने वाले नकली पनीर और भारी प्रोसेस्ड स्नैक्स की असली पहचान करने में मदद मिल सकती है।
हालांकि एफएसएसएआई ने 2022 से ‘हाई-इन’ चेतावनी और स्टार-रेटिंग जैसी प्रणाली शुरू की है, लेकिन लोगों का तर्क है कि ये उपाय न्यूट्री-ग्रेड जितने आसान और प्रभावी साबित नहीं हुए हैं।
नलिनी ने हाल ही में अपना एक नया फूड ब्रांड भी शुरू किया है, लेकिन अपनी सही लोकेशन गुप्त रखने के लिए उन्होंने इसके नाम का खुलासा नहीं किया। उन्होंने सरकारी लाइसेंसिंग प्रक्रिया और बिचौलियों की समस्या पर भी अपना अनुभव साझा किया।
उन्होंने बताया कि एक एजेंट ने लाइसेंस बनवाने के लिए उनसे 3,000 रुपये मांगे थे, लेकिन जब उन्होंने खुद ऑनलाइन आवेदन किया तो महज 100 से 200 रुपये के खर्च में उनका काम हो गया।
इन सबके बीच एफएसएसएआई के पूर्व सीईओ पवन अग्रवाल ने भारत में खाद्य सुरक्षा के मुद्दों से निपटने की जमीनी चुनौतियों पर अपने विचार रखे हैं। उन्होंने माना कि इन्फ्लुएंसर जनता के बीच जागरूकता जरूर बढ़ा सकते हैं, लेकिन कभी-कभी उनके दावे हकीकत से बहुत दूर और भ्रामक हो जाते हैं।
अग्रवाल ने अपने कार्यकाल का एक किस्सा साझा करते हुए बताया कि कैसे चंडीगढ़ में एक सरकारी अधिकारी ने बिना किसी ठोस रिपोर्ट के यह अफवाह फैला दी थी कि भारत का 85 प्रतिशत दूध मिलावटी है। उन्होंने बताया कि खासकर खुले में बिकने वाले मिलावटी खाद्य पदार्थों को ट्रैक करना सबसे मुश्किल काम है।
पैकेट बंद भोजन के स्रोत का पता तो आसानी से लगाया जा सकता है, लेकिन स्थानीय बाजारों में खुलेआम बिकने वाले पनीर या दूध में मिलावट पकड़ना लगभग असंभव हो जाता है। पूर्व सीईओ ने कहा कि उनके कार्यकाल में भी इस तरह की घटनाएं हुई थीं, लेकिन उन्होंने कभी किसी आलोचक पर एफआईआर दर्ज नहीं करवाई थी।
हालांकि, अग्रवाल का यह भी मानना है कि इस पूरे इकोसिस्टम में कंपनियों और इन्फ्लुएंसर्स दोनों की जवाबदेही तय होनी चाहिए। उन्होंने स्पष्ट किया कि भारत के खाद्य क्षेत्र की चुनौतियां बेहद जटिल हैं और इन पर एक साथ काबू नहीं पाया जा सकता।
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