ईरान के साथ अमेरिका-इजरायल के मौजूदा संघर्ष और होर्मुज जलडमरूमध्य के आसपास बढ़ते तनाव के कारण ईंधन की कीमतों में भारी उछाल की आशंका जताई जा रही थी। इसी बीच, सरकार ने शुक्रवार को आम जनता और बाजार को ध्यान में रखते हुए पेट्रोल और डीजल पर उत्पाद शुल्क (एक्साइज ड्यूटी) में 10 रुपये प्रति लीटर की बड़ी कटौती कर दी है। इस फैसले के बाद पेट्रोल पर केंद्रीय कर घटकर महज 3 रुपये प्रति लीटर रह गया है, जबकि डीजल पर यह प्रभावी रूप से शून्य हो गया है।
हालांकि, आम उपभोक्ताओं को पेट्रोल पंप पर कीमतों में तुरंत कोई बड़ी राहत मिलने की उम्मीद कम ही है। पेट्रोलियम उद्योग से जुड़े सूत्रों का कहना है कि वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की ऊंची कीमतों के कारण तेल विपणन कंपनियों (OMCs) को लगातार भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है। ऐसे में ड्यूटी में कटौती का यह फायदा कंपनियां ग्राहकों को देने के बजाय अपने घाटे की भरपाई के लिए इस्तेमाल कर सकती हैं।
पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक उथल-पुथल और होर्मुज मार्ग पर आंशिक प्रतिबंधों के कारण ब्रेंट क्रूड की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गई हैं। कच्चे तेल की इन आसमान छूती कीमतों की वजह से भारतीय तेल कंपनियों को ईंधन की बिक्री पर लगभग 48.8 रुपये प्रति लीटर का भारी नुकसान झेलना पड़ रहा है।
इस स्थिति पर पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने बताया कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें महज एक महीने के भीतर लगभग 70 डॉलर से उछलकर 122 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई हैं। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि ईंधन की कीमतों में यह बढ़ोतरी पूरी दुनिया में हुई है। दक्षिण-पूर्व एशिया में 30 से 50 प्रतिशत, उत्तरी अमेरिका में करीब 30 प्रतिशत, यूरोप में 20 प्रतिशत और अफ्रीका के कुछ हिस्सों में 50 प्रतिशत तक दाम बढ़े हैं।
मंत्री पुरी ने स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा कि सरकार के पास सिर्फ दो ही विकल्प थे। पहला यह कि कई अन्य देशों की तरह सारा आर्थिक बोझ आम नागरिकों पर डाल दिया जाए, या फिर भारतीय उपभोक्ताओं को बचाने के लिए इस झटके को खुद बर्दाश्त किया जाए। रूस-यूक्रेन संघर्ष के बाद से ही भारत वैश्विक अस्थिरता के बावजूद घरेलू कीमतों को लगातार नियंत्रित रखने का प्रयास कर रहा है।
उत्पाद शुल्क में यह ताजा कटौती ऐसे समय में की गई है जब हाल ही में निजी क्षेत्र के ईंधन खुदरा विक्रेताओं ने अपनी कीमतों में इजाफा किया है। यह इस बात का स्पष्ट संकेत है कि मौजूदा समय में यह पूरा सेक्टर कितने भारी दबाव से गुजर रहा है।
मौजूदा भू-राजनीतिक संकट ने पश्चिम एशिया से होने वाली तेल और गैस की सप्लाई चेन को बुरी तरह प्रभावित किया है। होर्मुज जलडमरूमध्य कच्चे तेल की आवाजाही का एक बेहद अहम और संवेदनशील रास्ता है। सामान्य हालात में इस मार्ग से हर दिन लगभग 2 से 2.5 करोड़ (20-25 मिलियन) बैरल कच्चा तेल और भारी मात्रा में गैस दुनिया भर में भेजी जाती है।
भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए इस मार्ग पर काफी हद तक निर्भर है। देश का 40 से 50 प्रतिशत कच्चा तेल आयात, जो कि लगभग 22 से 28 लाख बैरल प्रतिदिन बैठता है, इसी होर्मुज जलडमरूमध्य से होकर भारत पहुंचता है। इसके अलावा, भारत का 16 से 17 प्रतिशत एलएनजी आयात कतर और यूएई से होता है। साथ ही 33 करोड़ से अधिक भारतीय परिवारों द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली एलपीजी की एक बड़ी खेप भी इसी रास्ते से आती है।
इन तमाम चिंताओं और वैश्विक संकट के बावजूद, सरकार ने देश को आश्वस्त किया है कि फिलहाल ईंधन सप्लाई को लेकर कोई तत्काल खतरा नहीं है। शीर्ष अधिकारियों के मुताबिक, भारत के पास अभी करीब 60 दिनों का कच्चा तेल रिजर्व और लगभग 30 दिनों की एलपीजी सप्लाई सुरक्षित है। बाजार में ईंधन की कमी की खबरों को सरकार ने पूरी तरह से खारिज करते हुए इसे घबराहट पैदा करने वाली अफवाह बताया है।
आने वाले समय की चुनौतियों से निपटने के लिए सरकार आयात के विकल्पों को बढ़ाने और सप्लाई चेन को और अधिक मजबूत करने की कोशिशों में जुटी हुई है। मंत्री सुरेश गोपी के अनुसार, भारत के रणनीतिक पेट्रोलियम रिजर्व में वर्तमान में लगभग 3.37 मिलियन टन कच्चा तेल मौजूद है, जो इसकी कुल क्षमता का लगभग दो-तिहाई हिस्सा है। तेल कंपनियों के स्टॉक को भी मिला दिया जाए तो देश के पास कुल मिलाकर करीब 74 दिनों का ईंधन रिजर्व मौजूद है।
इन सबके बीच, सरकार ने घरेलू एलपीजी उत्पादन को भी 25 प्रतिशत तक बढ़ाने की दिशा में तेज कदम उठाए हैं। प्रशासन ने साफ कर दिया है कि देश में ईंधन की पर्याप्त उपलब्धता है और आम जनता को किसी भी तरह की चिंता करने या घबराने की कोई आवश्यकता नहीं है।
यह भी पढ़ें-
अडानी और यूथ4जॉब्स ने ‘ग्लोबल एबिलिटी फोटोग्राफी चैलेंज 2026’ के लिए मिलाया हाथ
अमेरिकी डॉलर पर होंगे डोनाल्ड ट्रंप के हस्ताक्षर, इतिहास में पहली बार होने जा रहा है यह बड़ा बदलाव…










