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पीएम मोदी डिग्री विवाद: दिल्ली हाईकोर्ट ने CIC का 2016 का आदेश रद्द किया

| Updated: August 26, 2025 13:22

दिल्ली हाईकोर्ट ने CIC का 2016 का आदेश रद्द कर दिया, कहा- पीएम मोदी की डिग्री और शैक्षणिक रिकॉर्ड ‘व्यक्तिगत सूचना’ हैं, जिन्हें बिना जनहित उजागर नहीं किया जा सकता।

दिल्ली हाईकोर्ट ने सोमवार को एक अहम फैसला सुनाते हुए केंद्रीय सूचना आयोग (CIC) के उस आदेश को खारिज कर दिया, जिसमें 2016 में दिल्ली विश्वविद्यालय (DU) को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की डिग्री संबंधी जानकारी सार्वजनिक करने का निर्देश दिया गया था।

शैक्षणिक रिकॉर्ड व्यक्तिगत सूचना: अदालत

न्यायमूर्ति सचिन दत्ता ने अपने फैसले में कहा कि छात्र और विश्वविद्यालय के बीच एक “विशेष भरोसे और गोपनीयता का रिश्ता” होता है। इसी आधार पर अदालत ने माना कि किसी भी व्यक्ति की शैक्षणिक योग्यता, डिग्री और अंकपत्र जैसी जानकारियां व्यक्तिगत सूचना की श्रेणी में आती हैं, और इन्हें आरटीआई कानून के तहत तब तक उजागर नहीं किया जा सकता जब तक कोई “बड़ा जनहित” न जुड़ा हो।

1978 के रिकॉर्ड पर विवाद

दरअसल, 2017 में दायर याचिका में दिल्ली विश्वविद्यालय ने CIC के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें 1978 में BA प्रोग्राम पास करने वाले छात्रों के रिकॉर्ड दिखाने का निर्देश दिया गया था। इसी साल नरेंद्र मोदी ने दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक की डिग्री प्राप्त की थी।

निजता का अधिकार सर्वोपरि

अदालत ने कहा कि बिना किसी विशेष जनहित के शैक्षणिक विवरणों का खुलासा करना किसी व्यक्ति की निजी जिंदगी में दखल माना जाएगा। विश्वविद्यालय के नियम भी किसी तीसरे पक्ष को छात्रों के अंक और ग्रेड साझा करने की अनुमति नहीं देते। इसलिए छात्रों को उम्मीद होती है कि उनकी जानकारी गोपनीय रखी जाएगी।

गुजरात हाईकोर्ट के फैसले का भी हवाला

दिल्ली हाईकोर्ट ने 2023 में गुजरात हाईकोर्ट के उस आदेश का भी जिक्र किया, जिसमें CIC के निर्देश को रद्द कर दिया गया था। उस मामले में गुजरात विश्वविद्यालय से पीएम मोदी की 1983 की डिग्री से जुड़ी जानकारी मांगने की कोशिश की गई थी।

अदालत की सख्त टिप्पणी

175 पन्नों के इस आदेश में कहा गया कि अंक, ग्रेड और उत्तरपुस्तिकाएं व्यक्तिगत सूचना होती हैं, जो आरटीआई एक्ट की धारा 8(1)(j) के तहत सुरक्षित हैं। न्यायमूर्ति दत्ता ने लिखा कि सतही तौर पर भले ही ऐसी जानकारी साधारण लगे, लेकिन इसका खुलासा करने से “बेमतलब की जिज्ञासा या सनसनी फैलाने वाली मांगों” की बाढ़ आ सकती है।

CIC के आदेश को बताया गलत

अदालत ने स्पष्ट किया कि CIC का 2016 का आदेश कानूनी प्रावधानों की सही व्याख्या पर आधारित नहीं था, बल्कि यह एक व्यक्तिगत दृष्टिकोण जैसा प्रतीत होता है। हाईकोर्ट ने कहा कि CIC का रवैया “पूरी तरह से गलत दिशा में” था।

छह याचिकाओं पर फैसला

इस मामले में अदालत छह याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी, जिनमें से चार दिल्ली विश्वविद्यालय की ओर से दायर की गई थीं। याचिकाएं कई आरटीआई आवेदकों — नीरज कुमार, मोहम्मद इरसाद, आर. के. जैन और अन्य — के खिलाफ दायर थीं।

CPIO पर जुर्माना भी रद्द

CIC ने 2016 में अपने आदेश में विश्वविद्यालय के CPIO की तनख्वाह से 25,000 रुपये की वसूली का भी निर्देश दिया था। हाईकोर्ट ने इसे भी खारिज कर दिया और कहा कि किसी अधिकारी की सैलरी से पेनाल्टी काटने के लिए उसके खिलाफ जानबूझकर की गई गलती या गलत नीयत का स्पष्ट प्रमाण होना चाहिए, जो इस मामले में मौजूद नहीं था।

अदालत ने यह भी माना कि विश्वविद्यालय हर साल करीब 2,100 से 2,400 आरटीआई आवेदन प्राप्त करता है। ऐसे में CPIO पर इस तरह का जुर्माना थोपना अनुपातहीन है।

अन्य याचिकाओं पर भी सुनवाई

इसी दौरान अदालत ने मोहम्मद इरसाद द्वारा दाखिल उस याचिका पर भी विचार किया, जिसमें उन्होंने पीएम मोदी की डिग्री संबंधी जानकारी मांगी थी। इसे समय पर फीस न जमा करने के कारण खारिज कर दिया गया था।

साथ ही, अदालत ने CBSE की उस याचिका पर भी फैसला दिया, जिसमें CIC के आदेश को चुनौती दी गई थी। इस आदेश में 2015 में दाखिल एक आरटीआई के तहत पूर्व बीजेपी सांसद स्मृति ईरानी की अंकतालिका और एडमिट कार्ड की कॉपी उपलब्ध कराने का निर्देश दिया गया था। हाईकोर्ट ने इसे भी खारिज करते हुए कहा कि ऐसी जानकारियां भी आरटीआई एक्ट की धारा 8(1)(j) के तहत व्यक्तिगत सूचना मानी जाती हैं।

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