नई दिल्ली: देश में प्रदूषण का स्तर लगातार चिंता का विषय बना हुआ है, लेकिन इस साल के बजट में सरकार की प्राथमिकताएं कुछ और ही कहानी बयां कर रही हैं। ‘प्रदूषण नियंत्रण’ (Control of Pollution) के लिए इस बार आवंटित की गई राशि, चालू वित्त वर्ष में इस मद (Head) के तहत खर्च के संशोधित अनुमान (Revised Estimate) से भी कम है।
भले ही आम जनता साफ हवा के लिए तरस रही हो, लेकिन सरकारी खजाने से इस संकट से निपटने के लिए निकलने वाली रकम उम्मीद से कम नजर आ रही है।
आंकड़े क्या कहते हैं?
सरकार के वार्षिक बजट में ‘प्रमुख योजनाओं के लिए परिव्यय’ (Outlay for major schemes) की सूची में उन योजनाओं को शामिल किया जाता है जिनका बजट 1,000 करोड़ रुपये से अधिक होता है। इस साल ‘प्रदूषण नियंत्रण’ भी इसी श्रेणी में है।
बजट दस्तावेजों पर नजर डालें तो पता चलता है कि इस वित्तीय वर्ष में खर्च का संशोधित अनुमान 1,300 करोड़ रुपये है। लेकिन हैरानी की बात यह है कि आगामी वर्ष के लिए सरकार ने इससे कम राशि आवंटित की है—मात्र 1,091 करोड़ रुपये।
अगर हम पिछले साल के बजट आवंटन की बात करें, तो इसके लिए 854 करोड़ रुपये रखे गए थे। वहीं, एक चौंकाने वाला आंकड़ा यह भी है कि पिछले वर्ष, यानी 2024-25 में, इस मद के तहत वास्तविक खर्च (Actual Spend) महज 16 करोड़ रुपये ही था। इतनी कम खर्च राशि यह सवाल खड़ा करती है कि क्या हम वाकई प्रदूषण को लेकर गंभीर हैं?
‘युद्ध स्तर’ पर काम करने की जरूरत: गीता गोपीनाथ
प्रदूषण अब केवल पर्यावरण की समस्या नहीं, बल्कि अर्थव्यवस्था और आजीविका के लिए भी बड़ा खतरा बन चुका है। स्विट्जरलैंड के दावोस में आयोजित विश्व आर्थिक मंच (World Economic Forum) में बोलते हुए, आईएमएफ (IMF) की गीता गोपीनाथ ने भारत को आगाह किया।
उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि अमेरिका द्वारा लगाए जाने वाले किसी भी टैरिफ की तुलना में, वायु प्रदूषण भारत की अर्थव्यवस्था के लिए कहीं ज्यादा बड़ा खतरा है। उन्होंने जोर देकर कहा कि भारत को वायु प्रदूषण से निपटने के लिए “युद्ध स्तर” (War Footing) पर काम करने की जरूरत है।
राहुल गांधी: “यह राष्ट्रीय स्वास्थ्य आपातकाल है”
विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने भी इस मुद्दे पर सरकार को घेरा है और प्रदूषण पर संसद में बहस की मांग की है। उन्होंने इसे केवल पर्यावरणीय मुद्दा न मानकर एक “राष्ट्रीय स्वास्थ्य आपातकाल” (National Health Emergency) करार दिया है।
राहुल गांधी ने कहा, “प्रदूषण अब सिर्फ पर्यावरण का मुद्दा नहीं रहा, यह एक नेशनल हेल्थ इमरजेंसी है। संसद को इस पर चर्चा करनी ही होगी। सरकार को कदम उठाने होंगे। और इस बजट में असली समाधानों के लिए असली संसाधन (Real Resources) दिए जाने चाहिए। भारत के लोग रिपोर्ट या लच्छेदार भाषण नहीं मांग रहे हैं, वे साफ हवा मांग रहे हैं।”
प्रदूषण से निपटने में छिपा है 220 बिलियन डॉलर का फायदा
प्रदूषण को सिर्फ एक समस्या के रूप में ही नहीं, बल्कि एक आर्थिक अवसर के रूप में भी देखा जा सकता है। वैश्विक परामर्श फर्म Dalberg Advisors और Clean Air Fund की नई रिपोर्ट—‘The Business Case for Clean Air: Unlocking Economic Opportunities for India’—के अनुसार, अगर भारत वायु प्रदूषण को नियंत्रित कर लेता है, तो 2030 तक 220 बिलियन डॉलर तक की कमाई कर सकता है।
रिपोर्ट में यह निष्कर्ष भी निकाला गया है कि प्रभावी कार्रवाई से भारत को व्यापार में होने वाले 85 बिलियन डॉलर के नुकसान से बचाया जा सकता है।
सेहत के मोर्चे पर भी इसके बड़े फायदे हैं। अगर हम सूक्ष्म कणों (PM2.5) के प्रदूषण स्तर को लगभग 20 प्रतिशत तक कम कर पाते हैं, तो इसका मतलब होगा कि भारत हर साल “10 मिलियन डिसएबिलिटी-एडजस्टेड लाइफ इयर्स” (Disability-Adjusted Life Years) को बचा सकता है। आसान भाषा में कहें तो, यह देश के नागरिकों को बीमारी से बचाकर उन्हें जीवन के कई स्वस्थ वर्ष लौटाने जैसा होगा।
बजट भाषण में ‘प्रदूषण’ शब्द नदारद
इतने गंभीर आंकड़ों और चेतावनियों के बावजूद, वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के बजट भाषण में ‘प्रदूषण’ (Pollution) शब्द का जिक्र तक नहीं आया। यह चुप्पी उस समय है जब देश की राजधानी समेत कई शहर साल के बड़े हिस्से में जहरीली हवा में सांस लेने को मजबूर हैं।
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