नई दिल्ली: भारत के महत्वाकांक्षी ‘प्रोजेक्ट चीता’ को लेकर एक बड़ी खुशखबरी सामने आई है। उच्च सरकारी सूत्रों के अनुसार, इस साल के अंत तक भारत में चीतों का एक और जत्था विदेश से लाया जाएगा। इसके लिए केन्या, बोत्सवाना और नामीबिया जैसे कई देशों से बातचीत अंतिम चरण में है।
उम्मीद है कि दिसंबर तक नामीबिया या बोत्सवाना से 8 से 10 चीतों का पहला समूह भारत पहुँच जाएगा, जबकि केन्या से चीतों की खेप अगले साल आ सकती है। यह कदम भारत में चीतों की आबादी को और मज़बूत करेगा।
प्रोजेक्ट चीता की शानदार सफलता
सरकारी सूत्रों ने इस प्रोजेक्ट को बेहद सफल बताया है। आंकड़ों के मुताबिक, भारत में चीता शावकों की जीवित रहने की दर 61 प्रतिशत से भी अधिक है, जो 40 प्रतिशत के वैश्विक मानक से काफी बेहतर है।
वर्तमान में, देश में कुल 27 चीते मौजूद हैं, जिनमें से 15 चीते पूरी तरह से खुले जंगल में स्वच्छंद जीवन जी रहे हैं। मध्य प्रदेश के कूनो नेशनल पार्क के अलावा, इस साल तीन चीतों को गांधीसागर अभयारण्य में भी सफलतापूर्वक छोड़ा गया है।
सिर्फ शावक ही नहीं, वयस्क चीतों के मामले में भी सफलता दर सराहनीय है। कूनो में वयस्क चीतों की जीवित रहने की दर पहले साल के 70 प्रतिशत से बढ़कर दूसरे साल में 85.7 प्रतिशत हो गई।
नए घर और भविष्य की योजनाएं
भविष्य की योजनाओं के तहत चीतों को बसाने के लिए दो और जगहों की पहचान की गई है। इनमें गुजरात का बन्नी घास का मैदान और मध्य प्रदेश का नौरादेही वन्यजीव अभयारण्य शामिल हैं। ऐसी संभावना है कि केन्या से आने वाले चीतों को गुजरात के बन्नी घास के मैदानों में छोड़ा जा सकता है।
अधिकारियों का मानना है कि इस प्रोजेक्ट की सफलता के पीछे भारत के जंगलों में शिकार के लिए जानवरों की अच्छी उपलब्धता और समृद्ध प्राकृतिक आवास एक बड़ा कारण है। इसके अलावा, चीतों को वन्यजीव संरक्षण अधिनियम की अनुसूची 1 के तहत सर्वोच्च सुरक्षा प्रदान की गई है।
आंकड़ों में प्रोजेक्ट चीता
गौरतलब है कि 2022 में नामीबिया से 8 और 2023 में दक्षिण अफ्रीका से 12 चीतों को भारत लाया गया था। इन 20 विदेशी चीतों में से 11 अभी भी जीवित हैं। सबसे उत्साहजनक बात यह है कि भारत की धरती पर अब तक 26 चीता शावकों का जन्म हुआ है, जिनमें से 16 पूरी तरह स्वस्थ हैं और जीवित हैं।
सभी वयस्क चीतों की लाइव मॉनिटरिंग के लिए उन्हें रेडियो-कॉलर पहनाए गए हैं। अधिकारियों ने बताया कि शुरुआत में कुछ दिक्कतों के बाद अब चीते इसके अभ्यस्त हो गए हैं और दूसरे साल से कॉलर की वजह से किसी भी तरह के नुकसान की कोई घटना सामने नहीं आई है।
भारत की योजना हर साल 10 से 12 चीते लाने की है ताकि नए ठिकानों को आबाद किया जा सके, आनुवंशिक विविधता सुनिश्चित हो और प्राकृतिक आवास को बहाल करने में मदद मिले। एक सूत्र ने बताया, “किसी भी पुनर्वास परियोजना की असली सफलता भारत में जन्मे चीतों और उनके जीवित रहने की दर पर निर्भर करती है।”
हाल ही में, केंद्रीय पर्यावरण एवं वन मंत्री भूपेंद्र यादव ने भी इस परियोजना की प्रगति पर संतोष व्यक्त किया था। उन्होंने बताया था कि चीतों ने स्थानीय जलवायु परिस्थितियों के साथ अच्छी तरह से तालमेल बिठा लिया है। वे स्थानीय रूप से उपलब्ध शिकार का शिकार कर रहे हैं और अन्य मांसाहारी जानवरों के साथ अपने आवास को साझा करते हुए जीवित हैं।
मंत्री ने आगे कहा, “मुझे यह बताते हुए खुशी हो रही है कि चीते उम्मीद से कहीं बेहतर प्रजनन कर रहे हैं। इतने कम समय में इस तरह के विकास दुनिया के अन्य हिस्सों में अभूतपूर्व हैं। यह काफी उत्साहजनक है और परियोजना की सफलता का एक अच्छा संकेतक है।”
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