पीएम-किसान (PM-Kisan), राजस्थान पेंशन और फसल नुकसान मुआवजा जैसी सरकारी योजनाएं इन दिनों एक बड़े फर्जीवाड़े का शिकार हैं। अब तक 51 लोगों की गिरफ्तारी हो चुकी है और करोड़ों रुपये के गबन का खुलासा हुआ है। लेकिन जांचकर्ताओं का मानना है कि यह तो सिर्फ हिमखंड का सिरा (tip of the iceberg) भर है।
नीचे दिए गए पांच उदाहरण उन हजारों अवैध लाभार्थियों की बानगी हैं, जिन्हें गांव स्तर पर काम करने वाले एजेंटों से लेकर जयपुर में बैठे सरकारी अधिकारियों के एक बड़े नेटवर्क ने अपने जाल में फंसाया। राजस्थान के झालावाड़ और अन्य जिलों में फैले इस समानांतर सिस्टम को अधिकारियों ने “साइबर सरकार” का नाम दिया है।
हजारी लाल (35): राजस्थान के मनोहर थाना के राजपुरा निवासी हजारी लाल बताते हैं कि करीब दो साल पहले एक 15 साल के लड़के ने उनसे आधार कार्ड की फोटो मांगी थी। उसने सरकारी नकद योजना का लाभ दिलाने और आधी रकम देने का वादा किया था। आठ दिन बाद लाल को वादे के मुताबिक 5,000 रुपये मिले। पैसे देने वाला आरोपी राम बाबू अब पुलिस हिरासत में है, लेकिन लाल को आज भी नहीं पता कि उन्हें किस योजना के तहत ये पैसे मिले।
दिनेश कुमार (38): झालावाड़ के बट्टूखेड़ी गांव में मोबाइल की दुकान चलाने वाले दिनेश कुमार को याद है कि तीन-चार साल पहले उन्होंने एक फॉर्म भरकर अपनी आधार डिटेल्स साझा की थीं क्योंकि “हर कोई ऐसा कर रहा था।” जल्द ही उनकी पत्नी को पीएम-किसान के तहत पैसे मिलने लगे और “कुछ महीने पहले” उन्हें एकमुश्त 32,000 रुपये मिले। पीएम-किसान के तहत भूमिहीन किसानों को छोड़कर सभी किसान परिवारों को सालाना 6,000 रुपये तीन किस्तों में दिए जाते हैं। कुमार के पिता के पास “10-12 बीघा” जमीन है, लेकिन दिनेश के नाम पर कोई जमीन नहीं है।
राम दयाल (25): मनोहर थाना के मदनपुरा गांव के निवासी और एक छोटे क्लिनिक के मालिक राम दयाल तब हैरान रह गए, जब दो साल पहले उनके खाते में अचानक 33,000 रुपये आ गए। चूंकि उन्होंने किसी योजना के लिए आवेदन नहीं किया था, इसलिए वे घबरा गए। उन्होंने कलेक्टर और साइबर पुलिस स्टेशन को इसकी सूचना दी। बाद में एक स्थानीय फोटोकॉपी दुकान के कर्मचारी को गिरफ्तार किया गया और दयाल के खाते से पैसे डेबिट कर लिए गए। उन्हें शक है कि दुकान वाले ने उनके आधार की कॉपी रखकर उसका गलत इस्तेमाल किया।
भगवान दास (30): मनोहर थाना के खातीखेड़ी निवासी भगवान दास के अनुसार, स्थानीय ई-मित्र संचालक ने करीब दो साल पहले उन्हें मजदूरों की एक योजना के बारे में बताया था। उसने कहा था कि पैसा आने पर दोनों आधा-आधा बांट लेंगे। दास को 34,000 रुपये मिले, जिसमें से आधा हिस्सा उन्होंने अपने “खर्चा पानी” के लिए रख लिया।
बीरम लाल (25): इनका दावा है कि कुछ साल पहले कुछ लोगों ने उनसे और उनकी बहन की आधार डिटेल्स मांगी थीं। इसके बाद, उन्हें राजस्थान की सामाजिक सुरक्षा पेंशन योजना और उनकी बहन को पीएम-किसान की किस्तें मिलने लगीं, जिसका आधा हिस्सा वे लोग ले जाते थे। बीरम स्वीकार करते हैं कि वे दोनों इन योजनाओं के पात्र नहीं थे, लेकिन उनका कहना है कि “मुझे नहीं पता था कि यह गैरकानूनी है, उन लोगों ने मुझे मूर्ख बनाया।”
‘ऑपरेशन शटरडाउन’ और घपले का पर्दाफाश
पिछले साल अगस्त में एक व्हिसलब्लोअर ने पहली बार इस घोटाले की ओर ध्यान दिलाया था। इसके जवाब में मध्य अक्टूबर में ‘ऑपरेशन शटरडाउन’ शुरू किया गया, जिसकी कमान अब राज्य पुलिस के स्पेशल ऑपरेशंस ग्रुप (SOG) के हाथों में है।
इस कार्रवाई में अब तक सरकारी अधिकारियों सहित 51 लोग गिरफ्तार किए जा चुके हैं। इलेक्ट्रॉनिक उपकरण, लग्जरी गाड़ियां और 3 करोड़ रुपये से ज्यादा की नकदी जब्त की गई है। जांच में 11,000 से अधिक “संदिग्ध” बैंक खाते भी सामने आए हैं।
48 मुख्य आरोपियों के खिलाफ चार्जशीट दायर की जा चुकी है। जांचकर्ताओं ने पाया है कि पीएम-किसान योजना में 14.81 करोड़ रुपये, राजस्थान आपदा प्रबंधन सूचना प्रणाली (DMIS) में 3.62 करोड़ रुपये और अकेले झालावाड़ में राजस्थान पेंशन योजना के तहत लगभग इतनी ही रकम का गबन हुआ है।
गिरफ्तार किए गए लोगों में पीएम-किसान के राजस्थान नोडल कार्यालय के मुख्य संचालक मोहम्मद लईक भी शामिल हैं। एक शीर्ष अधिकारी के अनुसार, “आरोपियों के पास से करीब 99 लाख लोगों का संवेदनशील डेटा मिला है।”
कैसे दिया गया घोटाले को अंजाम?
1. पीएम-किसान (PM-Kisan)
आरोपियों ने सबसे पहले उन योजनाओं को निशाना बनाया जहां से पैसा निकालना सबसे आसान था। शुरुआत में पीएम-किसान योजना के नियम ‘ढीले’ थे—जैसे एक परिवार में लाभार्थियों की संख्या पर कोई रोक नहीं, अलग भूमि रिकॉर्ड की जरूरत नहीं, और आवेदन उसी राज्य से होने की बाध्यता नहीं। अगर एक तय समय में आवेदन को मंजूरी नहीं मिलती थी, तो वह स्वतः स्वीकृत (auto-approve) हो जाता था।
ई-मित्र संचालकों ने निष्क्रिय पड़े खातों को निशाना बनाया और अपात्र लोगों को जोड़ा। कमीशन के लालच में पड़ोसी राज्यों के लोगों का भी रजिस्ट्रेशन किया गया। मनोहर थाना के कई निवासियों को गुजरात, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, आंध्र प्रदेश और हिमाचल प्रदेश में जमीन दिखाकर पैसे दिलाए गए। एक खामी यह भी थी कि लाभार्थी का खाता डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर से जुड़ते ही पंजीकरण की तारीख से सारी पेंडिंग किस्तें एक साथ ट्रांसफर हो जाती थीं।
2. राजस्थान सामाजिक सुरक्षा पेंशन योजना (RajSSP)
इस योजना के तहत न्यूनतम 1,300 रुपये की मासिक सहायता बुजुर्गों, विधवाओं और दिव्यांगों आदि को दी जाती है। जालसाजों ने फर्जी डॉक्टरों की मुहर का इस्तेमाल कर 40% से अधिक विकलांगता के फर्जी प्रमाण पत्र बनाए। झालावाड़ के मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (CMHO) कार्यालय के एक ऑपरेटर ने इसमें अहम भूमिका निभाई, जो OTP के जरिए प्रमाण पत्र जारी करता था।
अकेले झालावाड़ के अकलेरा और मनोहर थाना में 19,987 लोगों को विकलांगता पेंशन के लिए पंजीकृत किया गया। जबकि 2011 की जनगणना के अनुसार, राजस्थान में लगभग 2.4% लोग ही विकलांग हैं, लेकिन जालसाजों ने कुछ क्षेत्रों में लगभग दो-तिहाई आबादी को विकलांग दिखा दिया। 51,000 फर्जी पेंशन भुगतान आदेश (PPO) का भी पता चला है।
3. आपदा प्रबंधन सूचना प्रणाली (DMIS)
फसल नुकसान के मुआवजे वाली इस योजना में भी बड़ा खेल हुआ। ई-मित्रों ने स्थानीय पटवारी की सिंगल साइन-ऑन (SSO) आईडी और पासवर्ड हासिल करके पात्र किसानों का डेटा बदल दिया।
झालावाड़ के जिला कलेक्टर द्वारा किए गए भौतिक सत्यापन में 42.85% डेटा अमान्य पाया गया। टोंक के भूमि राजस्व विभाग की इसी तरह की एक रिपोर्ट में यह आंकड़ा 90% से अधिक निकला। 2021 से 2025 के बीच एक ही मोबाइल नंबर को दो अलग-अलग लोगों के तीन बैंक खातों से जोड़े जाने के मामले भी सामने आए हैं।
व्हिसलब्लोअर और मुख्य गिरफ्तारियां
- 8 अगस्त, 2025: झालावाड़ पुलिस को टिप मिली कि कामखेड़ा इलाके में आशिक अली नाम का व्यक्ति सरकारी योजनाओं में धोखाधड़ी कर रहा है। एसपी अमित कुमार ने जांच का जिम्मा साइबर पुलिस स्टेशन के रवि सेन को सौंपा।
- 22 अक्टूबर, 2025: झालावाड़, दौसा, दूदू और मध्य प्रदेश के राजगढ़ में छापेमारी की गई। लगभग 70 घंटों के भीतर 30 आरोपी गिरफ्तार हुए।
जांच में मास्टरमाइंड के तौर पर दौसा निवासी रामअवतार सैनी (28) और विक्रम सैनी का नाम सामने आया। विक्रम ‘टेक्निकल एक्सपर्ट’ था, जिसने ‘Burp Suite’ जैसे ऐप्स की मदद से पीएम-किसान के सेंट्रल नोड में खामियां खोजीं और पासवर्ड हैक कर राज्य व जिला स्तर की फर्जी आईडी बनाईं। वहीं, डीएमआईएस घोटाले के मास्टरमाइंड बिहारी लाल (32) को भी पकड़ा गया।
सरकारी अधिकारियों ने भी इस लूट में पूरा साथ दिया। मोहम्मद लईक, वासुदेव पारीक, रमेश चंद, मोहम्मद शाहिद खान और भागचंद जैसे अधिकारियों ने अपने अधिकारों का गलत इस्तेमाल कर बल्क डेटा को मंजूरी दी।
नवंबर में पुलिस ने विक्रम और उसके सहयोगी नरेश सैनी को दौसा से गिरफ्तार कर लिया। विक्रम के एक ठिकाने के बाहर लिखा था: “धनवान बनना इतना आवश्यक नहीं कि उसके लिए ईमान भी खोना पड़े।”
एसपी अमित कुमार कहते हैं, “लोग हमसे इस घोटाले के कुल अनुमान के बारे में पूछते हैं। मैं उन्हें बताता हूं कि मैं अभी कुछ नहीं कह सकता, क्योंकि हमने केवल एक मॉड्यूल पकड़ा है; हो सकता है कि राज्य और देश में ऐसे कई और मॉड्यूल सक्रिय हों।”
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