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वह शाही दावतें जो सिर्फ स्वाद नहीं, रूतबे और पहचान की कहानी कहती हैं

| Updated: February 12, 2026 16:08

1897 में बड़ौदा के महाराजा की 'फ्रेंच' दावत से लेकर पुतिन के लिए 'शुद्ध शाकाहारी' थाली तक—जानिए कैसे शाही भोज सिर्फ स्वाद नहीं, बल्कि सत्ता और पहचान की कहानी कहते हैं।

क्या भोजन का मतलब सिर्फ पेट भरना और जायके का आनंद लेना है? अगर आप गहराई से देखें, तो यह स्वाद से कहीं बढ़कर ‘पहचान’ और ‘सत्ता’ का प्रतीक है। इतिहास और वर्तमान की दो बड़ी दावतें इस बात को बखूबी साबित करती हैं।

हाल ही में इतिहासकार नेहा वर्मानी ने 1897 के एक शाही रात्रिभोज (Royal Dinner) का ब्यौरा साझा किया, जिसकी मेजबानी बड़ौदा के महाराजा ने की थी। इस खुलासे ने पिछले साल दिसंबर (2025) में रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के सम्मान में आयोजित राष्ट्रपति भोज की यादें ताजा कर दीं।

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू द्वारा आयोजित उस कार्यक्रम में परोसे गए ‘शुद्ध शाकाहारी’ भोजन ने एक बड़ी बहस छेड़ दी थी।

आखिर ये दावतें चर्चा का विषय क्यों हैं? क्योंकि सत्ता के गलियारों में परोसा जाने वाला खाना कभी भी तटस्थ (neutral) नहीं होता। यह मेजबान के रूतबे, उसके मूल्यों और उस छवि को बयां करता है, जिसे वह दुनिया को दिखाना चाहता है।

1897 की वह शाम: जब थाली में भारतीय व्यंजन नहीं थे

मुगल दक्षिण एशिया की विशेषज्ञ इतिहासकार नेहा वर्मानी ने 31 जनवरी 1897 के एक डिनर मेनू को साझा किया। यह दावत बड़ौदा राज्य के महाराजा सयाजीराव गायकवाड़ III (शासनकाल: 1875-1939) द्वारा आयोजित की गई थी।

यह आयोजन ग्वालियर के महाराजा सर माधोराव सिंधिया I (शासनकाल: 1876-1925) के सम्मान में रखा गया था। स्थान था- गुजरात का आलीशान लक्ष्मी विलास पैलेस, और दौर था औपनिवेशिक भारत का।

वर्मानी ने ‘X’ (पूर्व में ट्विटर) पर लिखा कि यह मेनू वैसा बिल्कुल नहीं था, जैसा आप 19वीं सदी में बड़ौदा के महाराजा द्वारा ग्वालियर के महाराजा के लिए आयोजित दावत से उम्मीद करेंगे। इसमें ट्रफल्स (truffles), आर्टिचोक (artichokes) और कई फैंसी फ्रांसीसी नाम शामिल थे।

हैरानी की बात यह थी कि मेनू में भारतीय व्यंजन नदारद थे। इसमें वह खाना था जिसे आज हम ‘फ्यूजन फूड’ कहते हैं। यह मेनू ‘फ्रेंच हॉट कुज़ीन’ (French haute cuisine) के किसी पाठ जैसा लग रहा था। राजा की तस्वीर के साथ उभरे हुए उस पीले पड़ चुके पुराने कार्ड पर रात के खाने का समय शाम 7:30 बजे दर्ज था।

क्या था उस शाही मेनू में?

दावत की शुरुआत ‘पोटाज डी अमैंड्स’ (Potage d’Amandes) से हुई, जो बादाम का कस्टर्ड या फ्लैन था। इसके बाद ‘प्वासों ब्रेज़ सॉस मेयोनेज़’ (Poisson Braise sauce Mayonnaise) परोसा गया, जो मेयोनेज़ सॉस में पकी हुई मछली थी। स्टार्टर का समापन ‘क्रेम डी वोले ऑक्स ट्रफल्स’ (Crème de Volaille aux truffes) से हुआ, जो ट्रफल्स के स्वाद वाला चिकन क्रीम सूप था।

मुख्य भोजन (Main Course) में ‘कोतेलेत डी मूटन अ ल इतालियेन’ (Côtelettes de mouton à l’Italienne) यानी इटालियन स्टाइल लैंब कटलेट शामिल थे। इसके अलावा ‘सेले डी परड्रो रोटी ऑक्स पेतिस पॉइस’ (Selle de perdreau rôtie aux petits pois) भी था, जिसमें तीतर (partridge) के भुने हुए मांस को ताजी मटर के साथ परोसा गया था।

साइड डिश में ‘फोंड्स डी आर्टिचोट्स अ ला डेमी-ग्लेस’ (फ्रेंच ब्राउन सॉस में आर्टिचोक) और सब्जियों व चावल की एक करी शामिल थी। अंत में, डेजर्ट के तौर पर क्रीम और पिस्ता आइसक्रीम के साथ पके हुए सेब परोसे गए।

दिन में देसी, रात में विलायती

यह मेनू महाराजा की एक महान भोजन-प्रेमी (gourmet) और मेजबान के रूप में प्रतिष्ठा को दर्शाता था। वे कला के संरक्षक थे और उन्होंने 1888 में नवनिर्मित लक्ष्मी विलास पैलेस के लिए राजा रवि वर्मा को पौराणिक चित्र बनाने का काम सौंपा था। भोजन में भी उनकी रुचि कम नहीं थी।

उनकी पोती, महारानी शुभांगिनीराजे गायकवाड़ ने लिखा कि ‘गायकवाड़ी भोजन’ अद्वितीय था और लक्ष्मी विलास पैलेस के बाहर भारत में कहीं भी उपलब्ध नहीं था। उनका मानना था कि यह देश में ‘फ्यूजन कुकिंग’ का सबसे शुरुआती संस्करण था।

महाराजा ने गायकवाड़ी व्यंजनों को बढ़ावा दिया, जो ग्वालियर, तंजौर, कोल्हापुर और अन्य रियासतों की राजकुमारियों के साथ गायकवाड़ परिवार के विवाह संबंधों से विकसित हुआ था। इन राजकुमारियों और विभिन्न शैलियों के रसोइयों ने बड़ौदा पैलेस के मूल मराठा भोजन को अपने स्वाद के अनुसार बदल दिया था। एक समय में वहां जंगली सूअर, तीतर, मोर और बत्तख पकाया जाता था, और महल के रसोइयों के पास आज भी इनकी रेसिपी मौजूद हैं।

महारानी शुभांगिनीराजे ने लिखा कि महल में दोपहर का भोजन (लंच) भारतीय होता था, लेकिन रात का खाना (डिनर) हमेशा ‘कॉन्टिनेंटल’ होता था। उनका कहना था कि भारतीय भोजन, विशेषकर गायकवाड़ी व्यंजन, इतना भारी (rich) होता था कि उसे दिन में दो बार नहीं खाया जा सकता था। उन्हें कॉन्टिनेंटल खाना पसंद था और उनके रसोइye बेहतरीन क्लासिक फ्रेंच रेस्तरां के टक्कर का खाना बनाते थे।

उन्होंने अपने ‘टार्टर सॉस’ को अद्वितीय बताया और कहा कि यह रोस्ट लैंब के साथ बहुत अच्छा लगता था। यहां तक कि विदेश यात्राओं के दौरान वे अक्सर सोचते थे कि काश वे अपना टार्टर सॉस साथ ले आए होते।

एक सदी बाद: जब शाकाहारी थाली बनी चर्चा का केंद्र

इस घटना के एक सदी से भी अधिक समय बाद, एक और राजकीय भोज ने सबका ध्यान खींचा।

दिसंबर 2025 में, रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने अपनी भारत यात्रा का समापन राष्ट्रपति भवन में आयोजित एक सम्मानजनक रात्रिभोज के साथ किया। मेजबान थीं राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू। इस हाई-प्रोफाइल डिनर का मेनू सोशल मीडिया पर वायरल हो गया।

नेटिज़न्स (इंटरनेट यूजर्स) ने भोजन के चयन पर कटाक्ष किया क्योंकि मेनू में कोई भी मांसाहारी (non-vegetarian) व्यंजन नहीं था। साथ ही, शराब (alcoholic beverages) भी नहीं परोसी गई थी।

यह पूरी तरह से शाकाहारी दावत एक पारंपरिक ‘थाली’ के रूप में पेश की गई थी, जिसे ताजी सामग्री और सुगंधित मसालों से तैयार किया गया था। इसका उद्देश्य भारत की क्षेत्रीय विविधता और पाक विरासत को उजागर करना था, जो हल्का, सुरुचिपूर्ण और उत्सव के अनुकूल हो।

राष्ट्रपति भवन का वह वायरल मेनू

भोजन की शुरुआत ‘मुरुंगेलाई चारु’ (murungelai chaaru) सूप से हुई। यह मोरिंगा (सहजन) की पत्तियों और मूंग की दाल का हल्का शोरबा था, जिसे करी पत्ते की महक वाले बीजों से गार्निश किया गया था।

इसके बाद ‘गुच्ची दून चेटिन’ (सफेद अखरोट की चटनी के साथ भरवां गुच्ची मशरूम), ‘काले चने के शिकमपुरी’ कबाब और चटनी के साथ ‘वेजीटेबल झोल मोमो’ परोसे गए। स्वादों का यह सफर मिट्टी की सोंधी खुशबू से लेकर तीखे और हल्के मसालेदार जायकों तक फैला था।

मेन कोर्स में ‘जाफरानी पनीर रोल’, ‘पालक मेथी मटर का साग’, ‘तंदूरी भरवां आलू’, ‘अचारी बैंगन’ और ‘दाल तड़का’ शामिल थे। इनके साथ विभिन्न प्रकार की ग्रेवी और सूखी सब्जियां थीं। ये व्यंजन अंतरराष्ट्रीय स्वाद (palate) के साथ तालमेल बिठाते हुए भारतीय परंपराओं में रचे-बसे थे।

इनके साथ ड्राई फ्रूट और केसर पुलाव परोसा गया। रोटियों की टोकरी में लच्छा परांठा, मगज नान, सतनाज रोटी, मिस्सी रोटी और बिस्कुटी रोटी शामिल थी।

मिठाई (Desserts) में बादाम का हलवा, केसर पिस्ता कुल्फी और ताजे फल शामिल थे। भोजन का समापन एक मीठे और ताजगी भरे अहसास के साथ हुआ।

दावत के साथ-साथ एक समानांतर ‘राग मेनू’ भी रखा गया था। सरोद, सारंगी और तबला वादकों की एक मंडली ने भारतीय शास्त्रीय रागों के साथ परिचित रूसी धुनों को बजाया। यह डिनर सिर्फ पेट पूजा नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक आदान-प्रदान बन गया।

राजनीति और आलोचना

हालांकि, कांग्रेस नेता कार्ति चिदंबरम ने मेनू पर टिप्पणी करते हुए सवाल उठाया। उन्होंने लिखा कि यह पूरी तरह से शाकाहारी क्यों है? उन्होंने कहा कि भारतीय व्यंजनों को स्वीकार करने और उसका जश्न मनाने के लिए मांस, पक्षी (fowl) और समुद्री भोजन (seafood) के व्यंजनों को भी शामिल किया जाना चाहिए था।

दूसरी ओर, शिवसेना (UBT) की सांसद प्रियंका चतुर्वेदी ने इस राजकीय रात्रिभोज में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और कांग्रेस नेता राहुल गांधी को आमंत्रित न करने के लिए केंद्र सरकार की आलोचना की और इस चूक को “ओछा” (petty) करार दिया।

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