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गांधीनगर के कोबा तीर्थ में बनेगा इतिहास, संस्कृति और आस्था का संगम: 31 मार्च को पीएम मोदी करेंगे ‘सम्राट संप्रति म्यूजियम’ का उद्घाटन

| Updated: March 27, 2026 17:28

गांधीनगर के कोबा तीर्थ में 31 मार्च को पीएम मोदी करेंगे भव्य 'सम्राट संप्रति म्यूजियम' का उद्घाटन, जानिए जैन धर्म और भारतीय ऐतिहासिक धरोहरों को समेटे इस संग्रहालय की खासियत।

कोबा, गांधीनगर: गांधीनगर के कोबा तीर्थ में नवनिर्मित सम्राट संप्रति म्यूजियम भारतीय संस्कृति की भव्य विरासत और ऐतिहासिक धरोहर का अनूठा संगम बनने जा रहा है। इस भव्य म्यूजियम का लोकार्पण आगामी 31 मार्च, 2026 (मंगलवार) को महावीर जन्म कल्याणक के पावन अवसर पर माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी के करकमलों द्वारा किया जाएगा।

उद्घाटन समारोह में राष्ट्रसंत पूज्य आचार्य श्री पद्मसागरसूरीश्वरजी, गुजरात के माननीय राज्यपाल श्री आचार्य देवव्रत, मुख्यमंत्री श्री भूपेंद्रभाई पटेल, उपमुख्यमंत्री श्री हर्षभाई संघवी और श्री महावीर जैन आराधना केंद्र (कोबा तीर्थ) के अध्यक्ष श्री सुधीर मेहता सहित देशभर के कई गणमान्य अतिथि अपनी प्रेरक उपस्थिति दर्ज कराएंगे।

यह म्यूजियम ईसा पूर्व 224 से 215 के दौरान शासन करने वाले जैन धर्म की महान विभूति, अहिंसा के प्रचारक और सम्राट अशोक के पौत्र सम्राट संप्रति महाराज के प्रेरक जीवन और मूल्यों को समर्पित है। इसका निर्माण राष्ट्रसंत परम पूज्य आचार्यदेव पद्मसागरसूरीश्वरजी का एक आजीवन स्वप्न था।

उन्होंने पिछले छह दशकों में भारत और नेपाल में लगभग दो लाख किलोमीटर की पदयात्रा कर देश के कोने-कोने से इन अमूल्य सांस्कृतिक अवशेषों को असीम श्रद्धा के साथ संकलित किया है।

टोरेंट ग्रुप के यू.एन.एम. फाउंडेशन के विशेष सहयोग से निर्मित इस म्यूजियम में ईसा पूर्व 200 के समय की दुर्लभ कलाकृतियों को सात भव्य गैलरी में सहेजा गया है। इनमें पाषाण और धातु की मूर्तियां, विशाल तीर्थ पट्ट, यंत्र पट्ट, लघुचित्र, चांदी के रथ, प्राचीन सिक्के और प्राचीन हस्तप्रतियां शामिल हैं।

इस म्यूजियम के निर्माण में सहयोग के साथ-साथ इसके संचालन और रखरखाव की जिम्मेदारी भी यू.एन.एम. फाउंडेशन ने स्वीकार की है।

श्री महावीर जैन आराधना केंद्र, कोबा के अध्यक्ष श्री सुधीर मेहता ने इस ऐतिहासिक पहल पर कहा कि इस स्वप्न को साकार होते देखना अत्यंत संतोषजनक है।

उन्होंने बताया कि यह म्यूजियम हमारी साझी विरासत का प्रतीक बनेगा और भावी पीढ़ियों को भारत की आध्यात्मिकता, संस्कृति और कला के बारे में गहराई से जानने की प्रेरणा देगा। इस पुनीत कार्य का हिस्सा बनने पर उन्होंने गर्व व्यक्त किया।

यह म्यूजियम भारत की प्राचीन परंपरा और आधुनिकता का बेहतरीन मेल है। आधुनिक ऑडियो-विजुअल तकनीक, आध्यात्मिक संगीत और इमर्सिव प्रेजेंटेशन के जरिए यह मुसाफिरों, शोधकर्ताओं और विद्वानों को एक समृद्ध अनुभव प्रदान करता है। दृश्यों और ध्वनियों के इस वैभव से आगे बढ़कर यह स्थान समाज को अहिंसा, संयम और करुणा का शाश्वत संदेश देता है।

सात कॉरिडोर का अद्भुत सफर

प्रथम कॉरिडोर: यह कॉरिडोर जैन दर्शन के मूल सिद्धांतों का प्रभावशाली परिचय देती है। यहां भगवान ऋषभदेव (अयोध्या में जन्मे प्रथम तीर्थंकर) से लेकर भगवान नेमिनाथ (शौरीपुर में जन्मे 22वें तीर्थंकर) तक के जीवन और उपदेशों के साथ-साथ 5वीं से 15वीं सदी तक की प्राचीन मूर्तियां और हस्तप्रतियां प्रदर्शित की गई हैं।

दूसरा कॉरिडोर: यह हिस्सा 23वें तीर्थंकर भगवान पार्श्वनाथ के जीवन और उनकी आध्यात्मिक परंपरा को समर्पित है। यहां प्राचीन मूर्तियों के साथ धरणेंद्र-पद्मावती जैसे रक्षक देव-देवियों की प्रतिमाएं मौजूद हैं।

तीसरा कॉरिडोर: इसमें 24वें तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी के जन्म से लेकर निर्वाण तक के 72 वर्षों के जीवन सफर और 12वीं सदी तक की ज्ञान परंपरा को पाषाण व धातु की मूर्तियों, नक्शों और प्राचीन जैन आगम ग्रंथों के जरिए दर्शाया गया है।

चौथा कॉरिडोर: यह कॉरिडोर 13वीं से 17वीं सदी के दौरान विपरीत परिस्थितियों में भी जैन धर्म के विकास के स्वर्ण युग को दर्शाती है। इसमें मुगल सम्राट अकबर द्वारा जैन आचार्य जी को दिया गया मूल फरमान और अन्य ऐतिहासिक दस्तावेज शामिल हैं।

पांचवां कॉरिडोर: यह 18वीं से 20वीं सदी के जैन कला साहित्य और धार्मिक परंपरा को प्रस्तुत करती है। यहां चित्रित वस्त्र, चांदी का रथ और जैन मंदिरों व समवसरण के लकड़ी के सुंदर मॉडल रखे गए हैं।

छठा कॉरिडोर: भारतीय संस्कृति, कला और वास्तुकला को समर्पित इस कॉरिडोर में 8वीं से 20वीं सदी के प्राचीन सिक्के, वेद-पुराण-आयुर्वेद के ग्रंथ तथा पारंपरिक हस्तकला के नमूने प्रदर्शित किए गए हैं।

सातवां कॉरिडोर: इसे आधुनिक सुविधाओं से लैस ऑडिटोरियम के रूप में विकसित किया गया है, जहां शत्रुंजय गिरिराज, गिरनार और राणकपुर जैन मंदिरों जैसे पवित्र तीर्थस्थलों की डिजिटल प्रस्तुति दर्शकों को आध्यात्मिक ऊंचाई का अनुभव कराएगी।

म्यूजियम की मुख्य विशेषताएं

करुणाशील शासक, जैन धर्म के अनुयायी और अहिंसा के महान प्रचारक सम्राट संप्रति महाराज के नाम पर बना यह म्यूजियम उन्हें एक सच्ची श्रद्धांजलि है।

आधुनिक डिजिटल सुविधाओं और बेहतरीन प्रेजेंटेशन के जरिए यह स्थान प्राचीन कलाकृतियों को महज वस्तुओं के रूप में नहीं, बल्कि समय, आस्था और संस्कृति के जीवंत साक्ष्य के रूप में प्रस्तुत करता है।

यह म्यूजियम नई पीढ़ी के लिए भारत की गौरवशाली धार्मिक परंपरा और अन्य धर्मों की साझी विरासत को समझने का एक केंद्र है। इसकी सात गैलरियां ज्ञान और धरोहर की एक व्यापक और प्रેરक यात्रा करवाती हैं।

एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक और आध्यात्मिक पर्यटन केंद्र के रूप में विकसित हो रहा यह म्यूजियम स्कूली बच्चों, युवाओं, शोधकर्ताओं, कला-प्रेमियों और इतिहासकारों के लिए भारत के भव्य अतीत और सनातन धर्म को करीब से जानने का एक आदर्श और दर्शनीय स्थल साबित होगा।

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