दाहोद के चोपट पल्ली गांव स्थित एक मंदिर परिसर में दिन भर गूंजने वाली प्रार्थनाओं के बीच कुछ छोटी मशीनों की आवाज भी साफ सुनाई देती है। यहां आने वाले श्रद्धालु शांति राठवा और महिलाओं के एक छोटे समूह को सैनिटरी नैपकिन बनाते हुए बेहद सम्मान की नजरों से देखते हैं।
कभी अपने ही परिवार और गांव वालों द्वारा ‘डायन’ करार दी गईं शांति का सफर आसान नहीं रहा। लिमखेड़ा तालुका के इस आदिवासी गांव से उन्हें बुरी तरह पीटकर निकाल दिया गया था। उनकी जिंदगी सड़कों पर गुमनामी में खत्म हो सकती थी, लेकिन उन्होंने अपने दम पर इसे फिर से संवारने का फैसला किया।
आज यह साहसी महिला उन लोगों के बीच सम्मान के साथ खड़ी है, जो कभी उनकी जान लेना चाहते थे। अपनी दर्दनाक आपबीती सुनाते हुए 45 वर्षीय शांति बताती हैं कि 12 साल पहले उनके अपने ही परिवार ने उन्हें डायन बताकर घर से बेदखल कर दिया था।
गांव वालों ने भी उनके साथ मारपीट की और उन्हें अपशकुन मानकर गांव से निकाल दिया। उस वक्त उनके पास जाने के लिए कोई जगह नहीं थी। सड़कों पर कुछ दिन गुजारने के बाद उन्हें गांव के बाहर एक धार्मिक संस्था में आसरा मिला।
शांति की किस्मत तब पलटी जब उनकी मुलाकात स्वाति बेडेकर से हुई। स्वाति महिलाओं को सैनिटरी नैपकिन बनाने की ट्रेनिंग देती हैं और उन्हें आर्थिक रूप से स्वतंत्र बनाने में मदद करती हैं। गुजरात की ‘पैड-वुमन’ के नाम से मशहूर स्वाति ने बताया कि लिमखेड़ा में एक शैक्षणिक परियोजना के दौरान उनकी मुलाकात शांति से हुई थी।
उनकी दर्दभरी कहानी सुनकर स्वाति काफी भावुक हो गईं। इसके बाद उन्होंने शांति को पैड बनाने का काम सीखने के लिए राजी किया, ताकि वह अपना जीवन यापन कर सकें। शुरुआत में हिचकिचाहट के बाद शांति और कुछ अन्य महिलाएं इस काम के लिए तैयार हो गईं।
हालांकि, गांव वालों ने उन्हें इस काम के लिए जमीन का एक छोटा सा टुकड़ा देने से भी साफ इनकार कर दिया। तब एक हनुमान मंदिर के पुजारी ने उन्हें मंदिर परिसर में सैनिटरी नैपकिन यूनिट लगाने की अनुमति दी। स्वाति बेडेकर कहती हैं कि ग्रामीण इलाकों में आज भी पीरियड्स को लेकर कई तरह की भ्रांतियां हैं, ऐसे में मंदिर के पुजारी का यह कदम बेहद सुखद आश्चर्य था।
सातवीं कक्षा तक पढ़ीं और दो बच्चों की मां शांति को एक सरकारी योजना के तहत आर्थिक मदद मिली, जिससे उन्होंने मशीन खरीदी। लेकिन उनकी मुश्किलें यहीं खत्म नहीं हुईं। शांति बताती हैं कि कुछ गांव वाले उन पर पथराव करते थे और कभी-कभी उनकी यूनिट की बिजली काट देते थे। वे अन्य महिलाओं को भी वहां काम नहीं करने देते थे।
इन सब के बावजूद शांति ने हार नहीं मानी और अक्सर अकेले ही काम करती रहीं। धीरे-धीरे उनकी अच्छी कमाई होने लगी। जल्द ही कुछ और महिलाएं उनके साथ जुड़ गईं। उन्होंने अपने बनाए पैड प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों, आंगनवाड़ियों और आसपास के गांवों के परिवारों को बेचना शुरू कर दिया।
ऑर्डर बढ़ने पर उन्होंने अपने उत्पाद की मार्केटिंग के लिए कुछ लड़कियों को भी काम पर रखा। वर्तमान में शांति ने अपनी यूनिट में 20 महिलाओं को रोजगार दिया है। यह यूनिट आज भी मंदिर परिसर से संचालित होती है और यहां हर दिन करीब 2,000 पैड बनाए जाते हैं।
एक दशक पहले तक मुश्किल से कुछ शब्द बोल पाने वाली शांति अब सरकारी अधिकारियों से पूरे आत्मविश्वास के साथ बात करती हैं। उनका कहना है कि जो लोग कभी उनसे दूर भागते थे, वे अब अक्सर उनसे मिलने यूनिट पर आते हैं। उनके उत्पाद अब 15 गांवों में बेचे जा रहे हैं और वे जल्द ही अपने काम का विस्तार करने की योजना बना रही हैं।
सबसे अहम बात यह है कि शांति ने अब अपने क्षेत्र में महिलाओं को डायन बताकर प्रताड़ित करने के खिलाफ एक अभियान छेड़ दिया है। वह अलग-अलग गांवों में जाकर लोगों को अपनी कहानी सुनाती हैं और इस अंधविश्वास के खिलाफ बेखौफ होकर आवाज उठाती हैं, जिसने न जाने कितनी ही महिलाओं की जिंदगी बर्बाद कर दी है।
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