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खामेनेई की हत्या पर मोदी सरकार की ‘चुप्पी’ कर्तव्यहीनता है: सोनिया गांधी का विदेश नीति पर कड़ा प्रहार

| Updated: March 3, 2026 13:25

ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला खामेनेई की हत्या पर भारत की खामोशी को सोनिया गांधी ने 'कर्तव्यहीनता' करार दिया है। कांग्रेस नेता ने मोदी सरकार की विदेश नीति और वैश्विक रुख पर उठाए कई गंभीर सवाल।

नई दिल्ली: कांग्रेस संसदीय दल की अध्यक्ष सोनिया गांधी ने मंगलवार (3 मार्च, 2026) को केंद्र की मोदी सरकार पर तीखा हमला बोला है। ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की लक्षित हत्या (Targeted Assassination) पर भारत सरकार की खामोशी को उन्होंने ‘तटस्थता’ नहीं, बल्कि ‘कर्तव्य से भागना’ (Abdication) करार दिया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह रवैया भारत की विदेश नीति की दिशा और साख पर गहरे सवालिया निशान लगाता है।

एक प्रमुख समाचार पत्र में छपे अपने विस्तृत लेख में, कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष ने मांग की है कि जब संसद के बजट सत्र का दूसरा चरण शुरू हो, तो अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के चरमराने और सरकार की इस “परेशान करने वाली खामोशी” पर बिना किसी टालमटोल के खुली बहस होनी चाहिए।

लेख की कुछ प्रमुख बातें:

नैतिक शक्ति की आवश्यकता: आज हमें अपनी उस नैतिक शक्ति को फिर से पहचानने और उसे पूरी स्पष्टता व प्रतिबद्धता के साथ दुनिया के सामने रखने की सख्त जरूरत है।

अंतरराष्ट्रीय संबंधों में दरार: 1 मार्च को ईरान ने पुष्टि की कि उसके सर्वोच्च नेता, अयातुल्ला सैयद अली हुसैनी खामेनेई की एक दिन पहले अमेरिका और इजरायल द्वारा किए गए हमलों में हत्या कर दी गई है। जारी कूटनीतिक बातचीत के बीच किसी देश के सेवारत राष्ट्राध्यक्ष की हत्या आधुनिक अंतरराष्ट्रीय संबंधों में एक गंभीर दरार है।

नई दिल्ली का मौन: इस झकझोर देने वाली घटना से परे, भारत सरकार की खामोशी समान रूप से चौंकाने वाली है। भारत ने न तो इस हत्या की निंदा की है और न ही ईरान की संप्रभुता के उल्लंघन पर कोई आपत्ति जताई है।

‘कूटनीति और संवाद’ की रटी-रटाई बातें

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के शुरुआती बयानों की आलोचना करते हुए श्रीमती गांधी ने लिखा, “शुरुआत में, अमेरिका और इजरायल के इस भारी हमले को पूरी तरह नजरअंदाज करते हुए, प्रधानमंत्री ने केवल यूएई पर ईरान के जवाबी हमले की निंदा की। उन्होंने उन घटनाओं के क्रम को सिरे से गायब कर दिया जो इससे पहले हुई थीं।”

उन्होंने आगे कहा कि बाद में पीएम मोदी ने अपनी ‘गहरी चिंता’ व्यक्त की और ‘संवाद व कूटनीति’ का राग अलापा—जबकि इजरायल और अमेरिका द्वारा बिना किसी उकसावे के किए गए बड़े हमलों से ठीक पहले यही कूटनीतिक प्रक्रिया तो चल रही थी।

सोनिया गांधी का तर्क है कि जब किसी विदेशी नेता की लक्षित हत्या पर हमारा देश संप्रभुता या अंतरराष्ट्रीय कानून के बचाव में खड़ा नहीं होता और निष्पक्षता को त्याग देता है, तो हमारी विदेश नीति संदेह के घेरे में आ जाती है। उन्होंने जोर देकर कहा कि इस विशेष मामले में चुप रहना बिल्कुल भी तटस्थता नहीं है।

अंतरराष्ट्रीय कानूनों का खुला उल्लंघन

कांग्रेस नेता ने ध्यान दिलाया कि यह हत्या बिना किसी औपचारिक युद्ध की घोषणा के की गई।

यूएन चार्टर का उल्लंघन: संयुक्त राष्ट्र चार्टर का अनुच्छेद 2 (4) किसी भी राज्य की क्षेत्रीय अखंडता या राजनीतिक स्वतंत्रता के खिलाफ बल प्रयोग को रोकता है। एक सेवारत राष्ट्राध्यक्ष की हत्या सीधे तौर पर इन सिद्धांतों की धज्जियां उड़ाती है।

लोकतंत्र की जिम्मेदारी: उन्होंने चेतावनी दी कि यदि दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र ऐसे कृत्यों पर कोई सैद्धांतिक आपत्ति दर्ज नहीं कराता है, तो अंतरराष्ट्रीय नियमों के पतन को ‘सामान्य’ मानना और भी आसान हो जाएगा।

इजरायल से निकटता और वैश्विक आक्रोश

इस घटना की टाइमिंग (समय) को लेकर भी सोनिया गांधी ने गंभीर चिंता जाहिर की है। उन्होंने कहा, “बेचैनी इस बात से और बढ़ जाती है कि हत्या से बमुश्किल 48 घंटे पहले ही प्रधानमंत्री अपनी इजरायल यात्रा से लौटे थे। वहां उन्होंने बेंजामिन नेतन्याहू की सरकार को अपना बिना शर्त समर्थन दोहराया, वह भी तब जब गाजा संघर्ष में महिलाओं और बच्चों सहित बड़े पैमाने पर हो रही नागरिकों की मौतों पर पूरी दुनिया में आक्रोश है।”

ऐसे समय में जब ग्लोबल साउथ के अधिकांश देश, प्रमुख शक्तियां और ब्रिक्स (BRICS) में भारत के सहयोगी जैसे रूस और चीन इस घटना से दूरी बनाए हुए हैं, तब बिना किसी नैतिक स्पष्टता के भारत का यह राजनीतिक समर्थन एक बेहद परेशान करने वाला बदलाव है। उन्होंने दावा किया कि भारत का यह रुख इस त्रासदी को मौन समर्थन देने का संकेत दे रहा है।

कांग्रेस का स्पष्ट स्टैंड और संविधान का अनुच्छेद 51

सोनिया गांधी ने स्पष्ट किया कि कांग्रेस पार्टी ने ईरानी धरती पर हुई बमबारी और लक्षित हत्याओं की कड़े शब्दों में निंदा की है और इसे गंभीर वैश्विक परिणामों वाली एक खतरनाक वृद्धि बताया है।

“हमने ईरानी लोगों और दुनिया भर के शिया समुदायों के प्रति अपनी संवेदना व्यक्त की है,” उन्होंने कहा।

श्रीमती गांधी ने याद दिलाया कि भारत की विदेश नीति हमेशा विवादों के शांतिपूर्ण समाधान पर आधारित रही है, जैसा कि भारत के संविधान के अनुच्छेद 51 में वर्णित है। संप्रभु समानता, गैर-हस्तक्षेप और शांति जैसे सिद्धांत भारत की कूटनीतिक पहचान का अभिन्न अंग रहे हैं। इसलिए, वर्तमान चुप्पी हमारे घोषित सिद्धांतों के एकदम विपरीत है।

वाजपेयी युग की याद और ‘वसुधैव कुटुंबकम’

पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की विदेश नीति का उदाहरण देते हुए उन्होंने वर्तमान सरकार को आईना दिखाया। सोनिया गांधी ने कहा कि मौजूदा सरकार को यह याद रखना चाहिए कि अप्रैल 2001 में तत्कालीन प्रधानमंत्री वाजपेयी ने तेहरान की अपनी आधिकारिक यात्रा के दौरान ईरान के साथ भारत के गहरे सभ्यतागत संबंधों की गर्मजोशी से पुष्टि की थी।

उन्होंने तंज कसा, “वाजपेयी जी द्वारा उन पुराने संबंधों की स्वीकार्यता का हमारी वर्तमान सरकार के लिए कोई महत्व नहीं रह गया है।”

ग्लोबल साउथ के नेतृत्व पर सवाल

उन्होंने यह भी पूछा कि अगर भारत आज किसी देश की क्षेत्रीय अखंडता के सिद्धांत की रक्षा करने में हिचकिचाता है, तो कल ग्लोबल साउथ के देश उस पर कैसे भरोसा करेंगे?

भारत लंबे समय से ‘वसुधैव कुटुंबकम’ (दुनिया एक परिवार है) के आदर्श को मानता आया है। सोनिया गांधी के अनुसार, यह सभ्यतागत लोकाचार केवल दिखावटी कूटनीति का कोई नारा नहीं है; इसका अर्थ न्याय, संयम और संवाद के प्रति अडिग रहना है, भले ही ऐसा करना कितना ही असुविधाजनक क्यों न हो।

दुनिया की अंतरात्मा के रक्षक की भूमिका

लेख के अंत में सोनिया गांधी ने कहा कि पश्चिम एशिया में बढ़ती अस्थिरता और अंतरराष्ट्रीय नियमों का टूटना कोई मामूली बात नहीं है; ये सीधे तौर पर भारत के रणनीतिक हितों से जुड़े हैं। भारत ने हमेशा दुनिया की अंतरात्मा के रक्षक के रूप में काम करने का प्रयास किया है, जो संप्रभुता और अहिंसा के लिए बोलने की हिम्मत पर बना था।

गौरतलब है कि शनिवार के शुरुआती घंटों में इजरायल और अमेरिका द्वारा किए गए एक बड़े हमले में खामेनेई की मौत हो गई थी। इसके साथ ही, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरानी जनता से अपने भाग्य की बागडोर खुद संभालने और 1979 से देश पर शासन कर रहे इस्लामी नेतृत्व के खिलाफ खड़े होने का आह्वान किया था।

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