भारतीय शेयर बाजार में सोमवार, 23 मार्च को भारी गिरावट का सिलसिला जारी रहा। सुबह के कारोबार में ही प्रमुख सूचकांक सेंसेक्स और निफ्टी 50 में 2 फीसदी से ज्यादा की बड़ी गिरावट दर्ज की गई।
सेंसेक्स लगभग 2,000 अंक या 2.6 प्रतिशत का गोता लगाकर 72,560 के स्तर पर आ गया। वहीं, निफ्टी 50 में भी 600 अंकों यानी 2.8 प्रतिशत से अधिक की गिरावट देखी गई और यह 22,476 के स्तर पर खिसक गया।
व्यापक बाजार में भी जमकर बिकवाली का माहौल रहा। बीएसई 150 मिडकैप और बीएसई 250 स्मॉलकैप इंडेक्स दोनों ही 4-4 फीसदी तक क्रैश हो गए।
कारोबार के पहले घंटे में ही निवेशकों को तगड़ा झटका लगा। बाजार में अचानक आई इस सुनामी से निवेशकों की करीब 15 लाख करोड़ रुपये की संपत्ति स्वाहा हो गई। शुक्रवार को बीएसई सूचीबद्ध कंपनियों का कुल बाजार पूंजीकरण 429 लाख करोड़ रुपये था, जो सोमवार को घटकर 414 लाख करोड़ रुपये रह गया।
शुक्रवार की अच्छी बढ़त के बाद घरेलू बाजार में अचानक इतनी भारी बिकवाली क्यों हो रही है? आइए इस बड़ी गिरावट के पीछे के पांच मुख्य कारणों को विस्तार से समझते हैं।
अमेरिका-ईरान के बीच गहराता युद्ध
बाजार में दहशत का सबसे बड़ा कारण अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ता तनाव है। मध्य पूर्व में हालात सुधरने के बजाय तेजी से बिगड़ रहे हैं।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने शनिवार को चेतावनी दी थी कि अगर 48 घंटे के भीतर होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) को नहीं खोला गया, तो वे ईरान के ऊर्जा बुनियादी ढांचे को पूरी तरह तबाह कर देंगे।
इसके जवाब में तेहरान ने भी साफ कर दिया है कि अगर अमेरिका उसके बिजली संयंत्रों को निशाना बनाता है, तो इस महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग को पूरी तरह से बंद कर दिया जाएगा।
स्थिति और भी गंभीर हो गई है। रॉयटर्स की एक रिपोर्ट के अनुसार, इजरायली सेना प्रमुख एयाल जमीर ने दावा किया है कि ईरान ने हिंद महासागर में स्थित डिएगो गार्सिया में अमेरिका-ब्रिटेन के सैन्य अड्डे पर 2,500 मील की मारक क्षमता वाली दो बैलिस्टिक मिसाइलें दागी हैं।
रुपये का ऐतिहासिक निचले स्तर पर पहुंचना
मध्य पूर्व में गहराते संकट और ऊर्जा की कीमतों में उछाल की आशंका से भारतीय रुपया भी पस्त हो गया है।
ब्लूमबर्ग के आंकड़ों के अनुसार, सोमवार को शुरुआती कारोबार में रुपया 18 पैसे टूटकर 93.8925 के रिकॉर्ड निचले स्तर पर आ गया। अमेरिका-ईरान युद्ध शुरू होने के बाद से कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों के बीच घरेलू मुद्रा में लगभग 3 प्रतिशत की गिरावट आ चुकी है।
रुपये की यह कमजोरी शेयर बाजार के लिए एक बड़ा नकारात्मक संकेत है। इससे विदेशी पूंजी की निकासी और तेज हो सकती है। साथ ही, महंगाई का दबाव भी बढ़ेगा जिसके चलते ब्याज दरों में इजाफा हो सकता है और इसका सीधा असर कॉरपोरेट कमाई पर पड़ेगा।
कच्चे तेल का बड़ा झटका
कच्चे तेल की आसमान छूती कीमतें अब भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए बड़ी चिंता का विषय बन गई हैं। युद्ध लंबा खिंचने के कारण ब्रेंट क्रूड 110 डॉलर प्रति बैरल के पार बना हुआ है। इससे भारत का चालू खाता घाटा बढ़ने और राजकोषीय स्थिति बिगड़ने की आशंका तेज हो गई है।
ब्रोकरेज फर्म मोतीलाल ओसवाल फाइनेंशियल सर्विसेज का कहना है कि भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का 80 फीसदी आयात करता है। ऐसे में महंगे कच्चे तेल का सीधा असर विकास, चालू खाता घाटा, महंगाई, रुपये और राजकोषीय संतुलन पर पड़ता है।
मोतीलाल ओसवाल की रिपोर्ट के मुताबिक, कच्चे तेल में 10 डॉलर प्रति बैरल की वृद्धि से जीडीपी विकास दर में 30 से 40 बेसिस पॉइंट की कमी आ सकती है। वित्त वर्ष 2026-27 के लिए 70 डॉलर प्रति बैरल के भाव पर 7.5 प्रतिशत की विकास दर का अनुमान था। लेकिन अगर कीमतें लगातार 90 डॉलर के ऊपर बनी रहती हैं, तो ग्रोथ 7 प्रतिशत से नीचे जा सकती है क्योंकि ऊर्जा पर निर्भर क्षेत्रों का मुनाफा घटेगा और मांग कमजोर होगी।
विदेशी निवेशकों (FPIs) की भारी बिकवाली
महंगे कच्चे तेल और गिरते रुपये के बीच विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPIs) ने पैसा निकालना तेज कर दिया है।
एनएसडीएल (NSDL) के आंकड़ों के मुताबिक, अमेरिका-ईरान-इजरायल युद्ध शुरू होने के बाद से विदेशी निवेशक अब तक 1 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा के भारतीय शेयर बेच चुके हैं। केवल मार्च महीने में 20 तारीख तक एफपीआई ने भारतीय बाजारों से 1,03,967 करोड़ रुपये निकाल लिए हैं।
जियोजित इन्वेस्टमेंट्स के मुख्य निवेश रणनीतिकार वीके विजयकुमार के अनुसार, पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ने से एफपीआई की बिकवाली और आक्रामक हुई है। वैश्विक बाजारों में कमजोरी, रुपये में लगातार आ रही गिरावट और महंगे क्रूड का अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाला असर निवेशकों की चिंता का मुख्य कारण है।
वैश्विक बाजारों में चौतरफा गिरावट
घरेलू कारणों के साथ-साथ वैश्विक बाजारों में आई भारी गिरावट ने भी भारतीय बाजार की कमर तोड़ दी है। अमेरिका-ईरान युद्ध को लेकर पूरी दुनिया के बाजारों में खौफ का माहौल है।
जापान का निक्केई और कोरिया का कोस्पी जैसे प्रमुख एशियाई बाजार 6 प्रतिशत तक क्रैश हो गए हैं। यह वैश्विक स्तर पर निवेशकों की घबराहट को दर्शाता है।
बाजार के जानकारों को डर है कि अगर यह युद्ध लंबा चला, तो ऊर्जा महंगी होने से वैश्विक महंगाई बेकाबू हो जाएगी। इसके चलते केंद्रीय बैंक सख्त मौद्रिक नीतियां अपनाएंगे, जिससे दुनिया भर के आर्थिक विकास की रफ्तार धीमी पड़ जाएगी।
एनरिच मनी के सीईओ पोनमुडी आर का कहना है कि वैश्विक संकेत बेहद कमजोर हैं और दुनिया भर के बाजारों में भारी पैनिक सेलिंग हो रही है। इस माहौल ने भारतीय शेयरों के लिए भी नकारात्मक स्थिति पैदा कर दी है, जिससे पूरे कारोबारी सत्र में उतार-चढ़ाव चरम पर रहने की संभावना है।
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