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सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी: “कुत्ते का दिमाग नहीं पढ़ सकते कि वो कब काटेगा, सावधानी ही बचाव है”

| Updated: January 7, 2026 17:55

सड़कों पर आवारा कुत्तों के आतंक पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, कहा- 'इलाज से बेहतर बचाव है, हम जानवर का दिमाग नहीं पढ़ सकते'

नई दिल्ली: आवारा कुत्तों की समस्या से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को बेहद अहम और कड़ी टिप्पणियाँ की हैं। शीर्ष अदालत की तीन जजों की पीठ ने सड़कों और सार्वजनिक स्थानों पर कुत्तों की मौजूदगी से जुड़ी सुरक्षा चिंताओं को उजागर किया। न्यायमूर्ति विक्रम नाथ, न्यायमूर्ति संदीप मेहता और न्यायमूर्ति एनवी अंजारिया की पीठ ने स्पष्ट कहा कि कोई भी इंसान किसी जानवर, विशेषकर कुत्ते का दिमाग नहीं पढ़ सकता कि वह कब “काटने के मूड में है या नहीं।”

अदालत ने जोर देकर कहा कि इस मामले में “इलाज से बेहतर बचाव है” (Prevention is better than cure)।

“सड़कों का कुत्तों से मुक्त होना जरूरी”

सुनवाई के दौरान पीठ ने कड़े शब्दों में कहा, “सड़कों को साफ और कुत्तों से मुक्त रखना आवश्यक है। हो सकता है कि वे काटे नहीं, लेकिन वे दुर्घटनाओं का कारण जरूर बनते हैं। आखिर सड़कों, स्कूलों और संस्थागत क्षेत्रों में कुत्तों की क्या जरूरत है?”

अदालत ने अधिकारियों से सवाल किया कि 2018 में एबीसी (एनिमल बर्थ कंट्रोल) नियमों को लागू करने के जो निर्देश दिए गए थे, उन पर अब तक क्या प्रगति हुई है?

पीठ ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा, “सिर्फ इसलिए कि सरकार अपना काम ठीक से नहीं कर रही है और नियमों को लागू नहीं कर पा रही, क्या आम आदमी को भुगतने के लिए छोड़ दिया जाना चाहिए?” मामले की अगली सुनवाई गुरुवार के लिए तय की गई है।

“सिर्फ कुत्तों की काउंसलिंग कराना बाकी रह गया है”

याचिकाकर्ताओं का प्रतिनिधित्व कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने तर्क दिया कि यदि कोई कुत्ता उग्र है और काटने की संभावना है, तो लोग केंद्र को फोन कर सकते हैं, जहाँ उसे ले जाकर नसबंदी के बाद वापस उसी क्षेत्र में छोड़ा जा सकता है।

इस पर अदालत ने व्यंग्यात्मक लहजे में टिप्पणी की, “अब बस एक ही चीज की कमी रह गई है, वह है कुत्तों की काउंसलिंग करना, ताकि उन्हें समझाया जा सके कि वापस छोड़े जाने पर वे किसी को न काटें।”

अदालत ने सिब्बल के तर्कों का जवाब देते हुए कहा कि समस्या केवल काटने की नहीं है, बल्कि जब कुत्ते चलती गाड़ियों के बीच दौड़ते हैं तो एक्सीडेंट का खतरा रहता है। जब सिब्बल ने कहा कि “कुत्ते सड़कों पर नहीं, कंपाउंड में होते हैं,” तो तीन जजों की पीठ ने उन्हें टोकते हुए कहा, “आपकी जानकारी पुरानी लगती है। सड़कों को कुत्तों से मुक्त करना ही होगा।”

केंद्र सरकार का पक्ष: “हम भी इंसान प्रेमी हैं”

सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने एक महत्वपूर्ण बिंदु उठाया। उन्होंने कहा कि रेजिडेंट्स वेलफेयर एसोसिएशन (RWA) को यह तय करने का अधिकार होना चाहिए कि गेटेड सोसायटियों में कुत्तों को अनुमति दी जाए या नहीं।

तुषार मेहता ने एक उदाहरण देते हुए कहा, “हम सभी जानवरों से प्यार करते हैं, लेकिन हम इंसानों से भी प्यार करते हैं। कल को कोई व्यक्ति भैंस लेकर आ जाए और कहे कि उसे उसका दूध पीना है, तो क्या इसकी अनुमति दी जानी चाहिए? इससे दूसरों को असुविधा होगी।”

पिछले आदेशों पर एक नजर

बढ़ते डॉग बाइट (कुत्तों के काटने) के मामलों के बीच, सुप्रीम कोर्ट ने पिछले साल 7 नवंबर को एक आदेश जारी किया था। इसमें शैक्षणिक संस्थानों, अस्पतालों, बस स्टैंडों, खेल परिसरों और रेलवे स्टेशनों से आवारा कुत्तों को हटाने और उन्हें निर्दिष्ट आश्रयों (Shelters) में भेजने का निर्देश दिया गया था।

अदालत, जो स्वत: संज्ञान लेकर इस मामले की निगरानी कर रही है, ने साफ कहा था कि इन कुत्तों को पकड़कर वापस उसी जगह नहीं छोड़ा जाना चाहिए।

अदालत ने नगर निगम के अधिकारियों को यह सुनिश्चित करने के लिए नियमित निरीक्षण करने का निर्देश दिया था कि संस्थागत क्षेत्रों में कोई आवारा कुत्ता न रहे। कोर्ट ने इसे प्रशासनिक उदासीनता और “प्रणालीगत विफलता” करार दिया था।

दिल्ली पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला

जुलाई में, शीर्ष अदालत ने फैसला सुनाया था कि दिल्ली और आसपास के क्षेत्रों में रेबीज और डॉग बाइट के बढ़ते मामलों को देखते हुए सभी आवारा कुत्तों को आवासीय इलाकों से हटाकर आश्रयों में शिफ्ट किया जाना चाहिए। कोर्ट ने चेतावनी दी थी कि जो भी व्यक्ति या संस्था अधिकारियों के काम में बाधा डालेगी, उस पर सख्त कार्रवाई होगी।

एक अन्य सुनवाई में यह भी निर्देश दिया गया था कि नसबंदी और टीकाकरण के बाद जानवरों को उसी क्षेत्र में वापस छोड़ा जाएगा। हालांकि, न्यायमूर्ति विक्रम नाथ, न्यायमूर्ति संदीप मेहता और न्यायमूर्ति एनवी अंजारिया की पीठ ने स्पष्ट किया कि यह नियम उन कुत्तों पर लागू नहीं होगा जो रेबीज से संक्रमित हैं या आक्रामक व्यवहार प्रदर्शित कर रहे हैं।

इसके अलावा, अदालत ने नगर निगम को कुत्तों के लिए एक समर्पित फीडिंग स्पेस (खाना खिलाने की जगह) बनाने का निर्देश दिया है और स्पष्ट किया है कि सार्वजनिक स्थानों पर कहीं भी खाना खिलाने की अनुमति नहीं होगी; उल्लंघन करने पर सख्त कार्रवाई की जाएगी।

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