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सूरत की ऐतिहासिक ‘मुगल सराय’ अब कहलाएगी ‘तापी भवन’, मुगलीसरा इलाके का नाम भी बदलकर हुआ ‘तापीपुरा’

| Updated: March 11, 2026 13:59

सूरत नगर निगम (SMC) का बड़ा फैसला: 17वीं सदी की ऐतिहासिक इमारत 'मुगल सराय' को मिला नया नाम, 6 साल पुरानी मांग हुई पूरी।

सूरत महानगर पालिका (एसएमसी) का मुख्यालय जिस 17वीं सदी की ऐतिहासिक ‘मुगल सराय’ इमारत में स्थित है, उसे अब ‘तापी भवन’ के नाम से जाना जाएगा। इसके साथ ही, जिस क्षेत्र में यह इमारत मौजूद है, उस मुगलीसरा इलाके का नाम भी बदलकर ‘तापीपुरा’ कर दिया गया है। आगामी शहरी स्थानीय निकाय चुनावों से पहले, मौजूदा निर्वाचित निकाय के कार्यकाल की आखिरी सामान्य बोर्ड बैठक में मंगलवार को भाजपा शासित नगर निगम द्वारा यह महत्वपूर्ण फैसला लिया गया।

नगर निगम की सर्वोच्च निर्णय लेने वाली संस्था यानी सामान्य बोर्ड में महापौर दक्षेश मावानी ने नाम बदलने का यह प्रस्ताव पेश किया था, जिसे बहुमत से आसानी से मंजूरी मिल गई। इस बड़े बदलाव की नींव साल 2018 में ही रख दी गई थी, जब भाजपा पार्षद विजय चौमाल ने तत्कालीन मेयर डॉ. जगदीश पटेल को एक अनुरोध पत्र भेजकर मुगल सराय का नाम ‘तापी भवन’ या सूरत के प्राचीन नाम पर ‘सूर्यपुर भवन’ करने की मांग उठाई थी।

अब यह फैसला लागू होने के बाद अपनी खुशी जाहिर करते हुए चौमाल ने कहा कि छह साल के लंबे इंतजार के बाद मुगल सराय का नाम बदलने का उनका सपना आखिरकार सच हो गया है।

सूरत नगर निगम की वेबसाइट पर मौजूद जानकारी के अनुसार, मुगल सराय मुख्य रूप से यात्रियों के ठहरने के लिए बनाया गया एक विश्राम गृह था। इसका निर्माण 1644 ईस्वी में मुगल सम्राट शाहजहां के शासनकाल के दौरान मुमताज महल के परिवार के मुख्य गार्ड इशाक बेग यज्दी द्वारा करवाया गया था।

अठारहवीं सदी में अंग्रेजों ने इस मजबूत इमारत का इस्तेमाल जेल के रूप में किया और फिर साल 1867 से यह मौजूदा नगर निगम के दफ्तर के रूप में उपयोग में लाई जाने लगी। इस ऐतिहासिक वास्तुकला में एक खुला केंद्रीय प्रांगण है, जिसके बीच में एक सजावटी फव्वारा और चारों ओर मेहराबदार प्रवेश द्वार वाले छोटे कमरे बने हुए हैं। किसी जमाने में ये कमरे यात्रियों के ठहरने के लिए इस्तेमाल होते थे, लेकिन आज इनमें निगम के विभिन्न कार्यालय चलते हैं।

इस सराय के इतिहास का गहराई से वर्णन करने वाले संगमरमर के पत्थरों पर अरबी भाषा में लिखे गए शिलालेख अब मुंबई के छत्रपति शिवाजी महाराज वास्तु संग्रहालय (पूर्व में प्रिंस ऑफ वेल्स म्यूजियम) में सुरक्षित रखे गए हैं। निगम की वेबसाइट बताती है कि इन शिलालेखों के मुताबिक, सर्वशक्तिमान अल्लाह के नाम पर बनाई गई इस सराय को उस दौर में ‘स्वर्ग’ माना जाता था।

इसका निर्माण खास तौर पर भारत के विभिन्न हिस्सों से समुद्री मार्ग के जरिए मक्का और मदीना जाने वाले हज यात्रियों को ठहराने के उद्देश्य से किया गया था। सराय के संचालन नियमों के तहत विद्वानों और मक्का-मदीना के यात्रियों से कोई किराया नहीं लिया जाता था। अन्य सामान्य यात्रियों से मिलने वाले किराये का उपयोग इमारत के रखरखाव और प्रशासनिक खर्चों के लिए किया जाता था, जबकि बची हुई रकम दान कर दी जाती थी। इसके अलावा, सैनिकों को इस सराय में रुकने की सख्त मनाही थी।

नाम बदलने के इस प्रस्ताव को औपचारिक रूप से मंजूरी मिलने के बाद, मेयर मावानी और भाजपा पार्षदों ने मुगल सराय के मुख्य द्वार पर आकर मिठाइयां बांटी और पटाखे फोड़कर जश्न मनाया। इस मौके पर मेयर मावानी ने कहा कि हिंदू धर्म में तापी नदी का विशेष महत्व है और स्थानीय लोगों के साथ-साथ निर्वाचित पार्षदों की ओर से भी इस इमारत का नाम बदलने की भारी मांग उठ रही थी।

उन्होंने बताया कि सोमवार को यह प्रस्ताव स्थायी समिति को सौंपा गया था और मंगलवार को सामान्य बोर्ड की बैठक में सभी पार्षदों ने इसे सर्वसम्मति से अपनी स्वीकृति दे दी।

इसके अलावा, पौराणिक कथाओं का हवाला देते हुए एसएमसी की एक विज्ञप्ति में कहा गया है कि तापी नदी को भगवान सूर्य की पुत्री और शनि देव की बहन माना जाता है, इसलिए स्थानीय लोग उन्हें ‘तापी माता’ के रूप में पूजते हैं। विज्ञप्ति के अनुसार, सूरत के तेज औद्योगिक विकास ने देश भर के लोगों को यहां आकर बसने के लिए आकर्षित किया है और ऐतिहासिक रूप से शहर का यह पूरा विकास काफी हद तक तापी नदी पर ही निर्भर रहा है।

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