अहमदाबाद: शहर के जाने-माने एंडोक्राइनोलॉजिस्ट डॉ. विवेक आर्य के क्लिनिक में बैठा 18 साल का एक मरीज वजन घटाने की एक बेहद दिलचस्प और प्रेरणादायक कहानी बयां करता है। जब यह किशोर पहली बार डॉक्टर के क्लिनिक में आया था, तब उसका वजन 120 किलो था। 5 फीट 5 इंच के कद वाले इस लड़के का बॉडी मास इंडेक्स (BMI) 40 के करीब पहुँच गया था, जो गंभीर रूप से मोटापे (morbidly obese) की श्रेणी में आता है। लेकिन आज उसका वजन घटकर 85 किलो रह गया है।
डॉ. आर्य इस ट्रांसफॉर्मेशन के बारे में बताते हैं, “परिवार ने शुरुआत में डाइट कंट्रोल करने की कोशिश की और लड़के से रोज फुटबॉल जैसी फिजिकल एक्टिविटी में शामिल होने को कहा। लेकिन जब किसी भी चीज से कोई फायदा नहीं हुआ, तो उन्होंने मेडिकल सलाह लेने का फैसला किया।”
डॉक्टर ने बताया कि मरीज को ग्लूकागन-लाइक पेप्टाइड (GLP)-1 ट्रीटमेंट पर रखा गया, जिसकी मदद से उसका हर महीने लगभग 3 किलो वजन कम हुआ। इसके साथ ही, उसे काउंसलिंग और लाइफस्टाइल मॉडिफिकेशन प्रोग्राम का हिस्सा भी बनाया गया। वजन कम होने से न सिर्फ उसका आत्मविश्वास काफी बढ़ा है, बल्कि वह पहले से कहीं ज्यादा एक्टिव भी हो गया है।
वर्ल्ड ओबेसिटी डे और युवाओं पर इसका प्रभाव
यह मामला किशोरों में मोटापे के तेजी से बढ़ते गंभीर संकट को उजागर करता है। हर साल 3 मार्च को मनाए जाने वाले ‘वर्ल्ड ओबेसिटी डे’ (World Obesity Day) के मौके पर यह विषय और भी प्रासंगिक हो जाता है। इस साल की थीम है— “8 billion reasons to act on obesity” (मोटापे पर कार्रवाई करने के 8 अरब कारण)।
यह थीम हर उस व्यक्ति की निजी यात्रा और उस प्रेरणा को दर्शाती है, जो बढ़े हुए वजन से छुटकारा पाने के लिए संघर्ष कर रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह थीम विशेष रूप से उन युवाओं और किशोरों पर पूरी तरह फिट बैठती है, जो इस समस्या के सबसे संवेदनशील शिकार बन रहे हैं।
भविष्य की बीमारियों का बड़ा खतरा
किशोरों में मोटापे की यह चिंता केवल उनके मौजूदा स्वास्थ्य तक सीमित नहीं है। भविष्य में उन्हें कम उम्र में ही लाइफस्टाइल से जुड़ी बीमारियां, स्लीप एपनिया (नींद के दौरान सांस रुकना) और सांस फूलने जैसी गंभीर समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है।
शहर के एक अन्य एंडोक्राइनोलॉजिस्ट, डॉ. संजीव फाटक भी इस बात की पुष्टि करते हैं कि मोटापे के इलाज के लिए मेडिकल मदद मांगने वाले बच्चों और किशोरों की संख्या लगातार बढ़ रही है।
डॉ. फाटक कहते हैं, “मोटापा अक्सर टीनएजर्स के लिए एक बड़ी बाधा बन जाता है। पहले 18 साल से कम उम्र के ज्यादातर मरीजों को केवल जीवनशैली में सुधार करके ही मैनेज कर लिया जाता था। लेकिन अब सुस्त लाइफस्टाइल, स्क्रीन पर ज्यादा समय बिताना, प्रोसेस्ड फूड का बढ़ता सेवन और शारीरिक गतिविधियों की कमी जैसे कई कारणों ने मिलकर एक ऐसी स्थिति पैदा कर दी है, जहां कई मामलों में दवा का सहारा लेने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता।”
हालांकि, डॉ. फाटक यह भी जोड़ते हैं कि सफलता की कहानियां तब भी सामने आती हैं जब अनुशासित टीनएजर्स केवल सही डाइट और एक्सरसाइज के दम पर अपना वजन कम करने में कामयाब होते हैं।
क्या है GLP-1 ट्रीटमेंट?
विशेषज्ञ समझाते हैं कि GLP-1 दरअसल एक हार्मोन है जो शरीर में ब्लड शुगर को कंट्रोल करता है, पेट भरे होने का एहसास (satiety) कराता है और पेट खाली होने की प्रक्रिया को धीमा करता है। जब इसे दवा के रूप में दिया जाता है (जो बाजार में कई अलग-अलग ब्रांड नामों से उपलब्ध है), तो यह भूख को कम करके इसी प्राकृतिक हार्मोनल फंक्शन की नकल करता है।
यह दवा कुछ खास क्लिनिकल मापदंडों के आधार पर बच्चों के (paediatric) उपयोग के लिए अप्रूव्ड है। अब इसका इस्तेमाल 14 और 15 साल तक के युवा मरीजों में मोटापे को कंट्रोल करने के लिए भी किया जा रहा है।
आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 के चौंकाने वाले आंकड़े
हाल ही में आए ‘आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26’ ने मोटापे को देश की प्रमुख स्वास्थ्य चुनौतियों में से एक के रूप में चिह्नित किया है। रिपोर्ट के आंकड़े स्थिति की गंभीरता को बयां करते हैं:
- मोटापे में वृद्धि (2005 बनाम 2019): ओवरवेट और मोटापे से ग्रस्त पुरुषों की संख्या 2005 के 9% से बढ़कर 2019 में 22.9% हो गई है। वहीं, महिलाओं में यह आंकड़ा 13% से बढ़कर 24% तक पहुँच गया है।
- अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड (UPF) की खपत: रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि 2005 से 2019 के बीच भारत में अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड की खपत 0.9 बिलियन अमेरिकी डॉलर से छलांग लगाकर भारी-भरकम 37.9 बिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुँच गई है।
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