चाहे संकट यूक्रेन में हो या ईरान में, ऐसा लगता है कि हर वैश्विक उथल-पुथल की कीमत भारत को चुकानी पड़ती है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के ताजा फैसले ने एक बार फिर नई दिल्ली को मुश्किल में डाल दिया है। मंगलवार को ट्रंप ने ईरान के साथ व्यापार करने वाले देशों पर 25% टैरिफ (आयात शुल्क) लगाने का ऐलान किया है। इस फैसले ने भारत को सीधे अमेरिका के निशाने पर ला खड़ा किया है।
हैरानी की बात यह है कि यह फैसला ऐसे समय आया है, जब कुछ ही घंटों पहले भारत में अमेरिका के नामित राजदूत सर्जियो गोर (Sergio Gor) ने भारत को अमेरिका का “सबसे अहम साझेदार” बताया था। लेकिन उनके बॉस, डोनाल्ड ट्रंप ने अपनी पुरानी शैली में ईरान के साथ व्यापार करने वाले देशों पर शिकंजा कस दिया।
चूंकि भारत, ईरान के शीर्ष पांच व्यापारिक साझेदारों में से एक है, इसलिए इस फैसले का सीधा और गहरा असर भारत पर पड़ना तय है। आशंका है कि अमेरिका में भारतीय सामानों पर अब कुल टैरिफ बढ़कर 75% तक पहुंच सकता है।
ईरान पर शिकंजा, भारत पर दबाव
ईरान इस वक्त अपने सबसे बड़े सरकार विरोधी प्रदर्शनों का सामना कर रहा है। ऐसे में ट्रंप ने ईरान पर दबाव और बढ़ा दिया है। उन्होंने साफ कहा कि जो भी देश ईरान के साथ कारोबार करेगा, उसे अमेरिका के साथ व्यापार में “तत्काल” 25% टैरिफ का सामना करना होगा। ट्रंप ने जोर देकर कहा, “यह आदेश अंतिम और निर्णायक है।”
75% टैरिफ का गणित: भारत के लिए दोहरी मार
भारत के लिए चिंता की बात यह है कि अमेरिका के साथ कोई ट्रेड डील (व्यापार समझौता) न होने के कारण भारतीय सामान पहले ही 50% की उच्चतम टैरिफ दर झेल रहे हैं।
इसमें 25% रेसिप्रोकल ड्यूटी (पारस्परिक शुल्क) शामिल है। इसके अलावा, रूसी तेल की निरंतर खरीद को लेकर ट्रंप ने भारत पर पहले ही 25% का अतिरिक्त दंडात्मक शुल्क लगा रखा है। अब ईरान से जुड़े इस नए 25% शुल्क के बाद, अमेरिका में भारतीय आयात पर कुल टैरिफ 75% तक पहुंच जाएगा।
मुसीबत यहीं खत्म नहीं होती। एक अमेरिकी बिल का भी खतरा मंडरा रहा है, जिसमें प्रतिबंधों के बावजूद रूसी तेल खरीदने वाले देशों पर 500% टैरिफ लगाने का प्रस्ताव है। ट्रंप ने इस बिल को मंजूरी दे दी है, जो सीधे तौर पर भारत, चीन और ब्राजील जैसे देशों को लक्षित करता है।
टाइमिंग पर उठे सवाल: क्या यह कोई चाल है?
भले ही चीन, ईरान का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार हो, लेकिन ट्रंप के इस कदम का समय (टाइमिंग) भारत के लिए संदेह पैदा करता है। यह घोषणा उस वक्त हुई, जब भारतीय और अमेरिकी अधिकारी लंबे समय से अटकी पड़ी ट्रेड डील पर बातचीत के लिए बैठने ही वाले थे। विशेषज्ञों का एक वर्ग इसे अमेरिका की दबाव बनाने की रणनीति (pressure tactic) मान रहा है, ताकि भारत को ट्रेड डील पर अमेरिकी शर्तों के लिए झुकाया जा सके।
अमेरिकी वाणिज्य सचिव हॉवर्ड लुलनिक (Howard Lutnick) के हालिया खुलासे बताते हैं कि ट्रंप के साथ डील करना कितना मुश्किल हो सकता है। लुलनिक ने पिछले हफ्ते खुलासा किया था कि भारत और अमेरिका के बीच ट्रेड डील नीतिगत मुद्दों के कारण नहीं, बल्कि इसलिए अटकी क्योंकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ट्रंप को सीधे फोन करके डील पक्की करने से इनकार कर दिया था।
व्यापार के आंकड़े और गिरता ग्राफ
ईरान के साथ भारत के पुराने रणनीतिक और व्यापारिक रिश्ते रहे हैं। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, वर्ष 2024-2025 में ईरान और भारत का कुल व्यापार 1.68 बिलियन डॉलर (14,000 करोड़ रुपये) रहा। इसमें भारत ने 1.24 बिलियन डॉलर (10,000 करोड़ रुपये) का निर्यात किया, जबकि आयात 440 मिलियन डॉलर (3,700 करोड़ रुपये) का रहा।
हालांकि, 2019 में ट्रंप के पिछले प्रतिबंधों के कारण जब नई दिल्ली ने ईरानी तेल का आयात रोका था, तब से व्यापार में भारी गिरावट आई है। 2019 के बाद से अब तक व्यापार में 87% की कमी आई है। यह 2019 के 17.6 बिलियन डॉलर (लगभग 1.5 लाख करोड़ रुपये) से गिरकर 2024 में 2.3 बिलियन डॉलर (19,100 करोड़ रुपये) पर आ गया।
बासमती चावल और चाबहार पोर्ट पर संकट?
भारत, ईरान को मुख्य रूप से बासमती चावल, कार्बनिक रसायन, चाय, चीनी, दवाएं और फल निर्यात करता है। ईरान भारतीय बासमती चावल का एक बड़ा खरीदार रहा है, इसलिए नए टैरिफ से बासमती निर्यात बुरी तरह प्रभावित हो सकता है।
अगर अमेरिकी टैरिफ का डर बना रहा, तो अमेरिकी बाजार तक अपनी पहुंच बचाने के लिए भारतीय कंपनियां ईरान के साथ कारोबार कम कर सकती हैं।
वहीं, भारत-ईरान संबंधों की धुरी माने जाने वाले चाबहार पोर्ट पर फिलहाल इस नए टैरिफ का असर पड़ने की संभावना कम है। भारत वहां शाहिद बेहेष्टि टर्मिनल विकसित कर रहा है। पिछले साल भारत को चाबहार पोर्ट के लिए अमेरिकी प्रतिबंधों से छह महीने की छूट मिली थी, जो 29 अप्रैल को समाप्त हो रही है। इससे पहले सितंबर 2025 में यह छूट वापस ले ली गई थी।
चाबहार पोर्ट भारत के लिए रणनीतिक रूप से बेहद अहम है। यह पाकिस्तान को दरकिनार करते हुए अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक पहुंचने का भारत का रास्ता है। साथ ही, यह पाकिस्तान के ग्वादर पोर्ट का जवाब भी है, जहां चीन ने भारी निवेश किया है।
कुल मिलाकर, अमेरिका की तरफ से आ रहे ये संकेत भारत के लिए चिंताजनक हैं। एक तरफ दोस्ती की बातें और दूसरी तरफ टैरिफ की मार— इससे दोनों देशों के रिश्तों में खटास आने का खतरा बढ़ गया है।
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