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ऊना कांड: नौ साल का लंबा इंतजार और एक खोखला न्याय

| Updated: March 18, 2026 18:11

9 साल के लंबे संघर्ष के बाद आया फैसला पीड़ितों के लिए बना निराशा का कारण; 41 में से 35 आरोपी बरी, 'गुजरात मॉडल' और न्याय व्यवस्था की जमीनी हकीकत पर उठे गंभीर सवाल।

दशकों से गुजरात को आर्थिक विकास और सुशासन के ‘गुजरात मॉडल’ के रूप में पेश किया जाता रहा है। लेकिन साल 2016 में हुए ऊना कांड ने इस नैरेटिव को पूरी तरह से झकझोर कर रख दिया था। इस घटना ने आर्थिक प्रगति और सामाजिक न्याय के बीच की खाई को उजागर किया।

इसने लंबे समय से दबाए गए जातीय तनावों को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मीडिया के सामने ला दिया। ऊना एक तरह से सामाजिक समानता के बिना होने वाले विकास की सीमाओं का प्रतीक बन गया। अब नौ साल बाद आए फैसले को देखकर लगता है कि गुजरात में दलितों की सरेआम पिटाई के उस खौफनाक मंजर के बाद भी जमीनी हकीकत कुछ खास नहीं बदली है।

फैसले का दिन और पीड़ितों की निराशा

पीड़ित परिवार ने न्याय के लिए नौ साल तक लंबी कानूनी लड़ाई लड़ी। वेरावल की एक सत्र अदालत के न्यायाधीश जिग्नेश पंड्या ने मंगलवार को इस मामले में सजा का ऐलान किया। यह फैसला वशराम सरवैया के लिए किसी बड़े झटके से कम नहीं था।

वशराम उन चार दलित युवकों में से एक हैं, जिन्हें 2016 में कथित गोरक्षकों ने पीटा था, कपड़े उतारे थे और ऊना शहर में घुमाया था। सोमवार को अदालत ने 41 आरोपियों में से केवल पांच को ही दोषी ठहराया। बाकी 35 लोगों को बरी कर दिया गया, जिनमें तीन पुलिसकर्मी भी शामिल हैं।

इस फैसले से पीड़ित परिवार को गहरी निराशा हुई है। वशराम ने इस निर्णय को दुखद बताया और कहा कि वे इससे संतुष्ट नहीं हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि वे इस फैसले को हाई कोर्ट और जरूरत पड़ने पर सुप्रीम कोर्ट में भी चुनौती देंगे। उनके पिता बालू ने भी बेटे की बात का समर्थन करते हुए न्याय के लिए अपनी लड़ाई जारी रखने का संकल्प लिया।

गुजरात की अदालत ने दोषी पाए गए पांचों लोगों को अधिकतम पांच साल की कैद और 5,000 रुपये के जुर्माने की सजा सुनाई है। इन दोषियों में रमेश जाधव, राकेश जोशी, नागजीभाई वणिया, प्रमोदगिरी गोस्वामी और बलवंतगिरी गोस्वामी शामिल हैं।

2016 का वह खौफनाक दिन

यह बर्बर घटना 11 जुलाई 2016 की है। वशराम और उनके रिश्तेदार ऊना तहसील के मोटा समधियाला गांव के पास एक मृत गाय की खाल उतार रहे थे। उस गाय का शिकार एक शेर ने किया था। मृत जानवरों की खाल उतारना उनके समुदाय का पारंपरिक पेशा रहा है। तभी वहां एक भीड़ आ गई और बर्बरता का नंगा नाच शुरू हुआ।

दलित युवकों को आधा नग्न कर दिया गया, एक गाड़ी से बांधा गया और लकड़ी, लोहे के पाइप तथा प्लास्टिक की छड़ों से बुरी तरह पीटा गया। इसके बाद उन्हें पूरे शहर में घुमाया गया और उनके मोबाइल फोन भी छीन लिए गए।

बेटों पर हमले की खबर सुनकर पिता बालू उन्हें बचाने मौके पर पहुंचे, लेकिन उन्हें भी बेरहमी से पीटा गया। परिवार के चार सदस्यों, जिनमें वशराम, बेचर, अशोक और रमेश शामिल थे, को एक एसयूवी में जबरन डालकर अलग-अलग जगहों पर प्रताड़ित किया गया। बाद में उन्हें पुलिस के हवाले कर दिया गया, जहां से एक रिश्तेदार उन्हें अस्पताल लेकर गया। इस पूरी घटना का किसी ने वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर डाल दिया, जिसने पूरे देश को हिलाकर रख दिया।

यह घटना गुजरात के सामाजिक इतिहास का एक अहम मोड़ साबित हुई। इसने राज्य में गहरी जड़ें जमा चुकी जातीय हिंसा को उजागर कर दिया। इस कांड के बाद देश भर में विरोध प्रदर्शन हुए। जिग्नेश मेवाणी जैसे कई सामाजिक कार्यकर्ता और राजनेता इसी आंदोलन से उभरकर सामने आए।

उस समय बहुजन समाज पार्टी की प्रमुख मायावती से लेकर राहुल गांधी और तत्कालीन मुख्यमंत्री आनंदीबेन पटेल ने भी पीड़ितों के गांव का दौरा किया था। सीआईडी क्राइम ने इस मामले की जांच की और साजिश रचने के आरोप में 41 लोगों के खिलाफ चार्जशीट दायर की।

कानूनी खामियां और न्याय का मजाक

फैसले के तहत तीन पुलिस अधिकारियों को भी बरी कर दिया गया है। इन पर आरोपियों की मदद करने, ड्यूटी में लापरवाही बरतने और सरकारी रिकॉर्ड से छेड़छाड़ करने के आरोप थे। एक चौथे पुलिस अधिकारी, पूर्व इंस्पेक्टर निर्मलसिंह झाला की मुकदमे के दौरान मौत हो गई थी। बचाव पक्ष के वकील वी.सी. मावधिया का तर्क था कि अभियोजन पक्ष यह साबित करने में विफल रहा कि किसने क्या अपराध किया है। इसी वजह से बड़ी संख्या में आरोपी बरी हो गए।

चूंकि सजा की अधिकतम अवधि पांच साल है और दोषी पहले ही इतना समय जेल में बिता चुके हैं, इसलिए वे जल्द ही रिहा हो सकते हैं। यह फैसला पीड़ितों के लिए एक बड़े विश्वासघात जैसा है। गिरफ्तार किए गए 43 लोगों में से 38 का छूट जाना न्याय व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करता है। मुकदमे के दौरान कुल आरोपियों में से 21 को गुजरात हाई कोर्ट से जमानत मिल गई थी।

हैरानी की बात यह रही कि जमानत पर बाहर आए आरोपी कई बार गवाहों को अपनी ही गाड़ी में अदालत लाते थे, जिससे गवाहों पर सीधा दबाव पड़ा। दूसरी तरफ, सरकारी वकील के पास अपना कोई दफ्तर तक नहीं था और उन्हें हर हफ्ते अदालत पहुंचने के लिए 100 किलोमीटर का सफर तय करना पड़ता था।

सरकार ने 2016 में पीड़ित परिवार को जमीन और नौकरी देने का वादा किया था, जो आज तक पूरा नहीं हुआ। हालात इतने बदतर हो गए कि नवंबर 2018 में वशराम सरवैया ने राष्ट्रपति को पत्र लिखकर इच्छा मृत्यु तक की मांग कर डाली थी।

चिंताजनक आंकड़े और जमीनी हकीकत

दलितों के खिलाफ होने वाले अपराधों में सजा की दर के आंकड़े व्यवस्था की नाकामी को दर्शाते हैं। साल 2018 से 2021 के बीच अनुसूचित जाति के खिलाफ अत्याचार के मामलों में गुजरात की दोषसिद्धि दर मात्र 3.065 प्रतिशत रही, जो राष्ट्रीय औसत से बहुत कम है। इस अवधि में दर्ज हुए 5,369 मामलों में से केवल 32 ही साबित हो सके।

हत्या और बलात्कार जैसे गंभीर मामलों में भी कम से कम 1,012 मुकदमों में आरोपी बरी हो गए। वर्ष 2022 में गुजरात में दलितों के खिलाफ अत्याचार के 1,425 मामले दर्ज किए गए, यानी हर दिन चार मामले। इसके बावजूद राज्य में सजा की दर देश में सबसे कम, केवल 5.8 प्रतिशत रही।

ग्रामीण गुजरात में दलितों की आकांक्षाओं और जीवनशैली को आज भी सहजता से स्वीकार नहीं किया जाता है। इसका ताजा उदाहरण 17 जुलाई 2024 को साबरकांठा जिले में देखने को मिला। वहां 24 वर्षीय दलित ऑटो ड्राइवर अजय परमार को केवल इसलिए पीटा गया क्योंकि उसकी इंस्टाग्राम प्रोफाइल पिक्चर में उसने पारंपरिक साफा और धूप का चश्मा पहना था।

इससे पहले 2012 में ऊना तालुका के ही अनोखलाली गांव में लालजी नाम के एक दलित युवक को 11 सवर्णों ने जिंदा जला दिया था। लालजी चश्मा पहनता था, मोटरसाइकिल चलाता था और एक सवर्ण लड़की से प्रेम करता था। उसकी मौत के बाद उसके पूरे परिवार को धमकियों के कारण गांव छोड़ना पड़ा था।

‘वाइब्रेंट गुजरात’ की चकाचौंध के बीच कई दलितों का जीवन आज भी सामाजिक रूप से अदृश्य और दबे हुए रहने पर निर्भर है। ऊना कांड का यह फैसला बेहद निराशाजनक है और इसे ऊपरी अदालत में चुनौती दी जाएगी। गुजरात के विकास का दावा तब तक अधूरा रहेगा, जब तक दलितों को केवल कागजों पर ही नहीं, बल्कि असल जिंदगी में भी पूरी तरह सशक्त और सुरक्षित नहीं किया जाता।

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