नई दिल्ली: केंद्र सरकार अक्सर अपनी कल्याणकारी योजनाओं और सोशल सेक्टर (सामाजिक क्षेत्र) के प्रति अपनी प्रतिबद्धता के दावे करती है, लेकिन बजट के दस्तावेज कुछ और ही कहानी बयां कर रहे हैं। 2026-27 के केंद्रीय बजट दस्तावेजों ने यह खुलासा किया है कि मोदी सरकार ने वित्तीय वर्ष 2025-26 में सामाजिक योजनाओं के लिए जितना पैसा देने का वादा किया था, वास्तव में उतना खर्च ही नहीं किया।
सबसे चौंकाने वाला आंकड़ा ‘जल जीवन मिशन’ का है। इस मिशन के तहत 67,000 करोड़ रुपये खर्च किए जाने थे, लेकिन संशोधित अनुमान (Revised Estimates) बताते हैं कि सरकार ने इस योजना पर केवल 17,000 करोड़ रुपये ही खर्च किए। यह वही योजना है जिसका उद्देश्य करोड़ों लोगों के जीवन को बदलना था।
बजट में किए गए वादों की हकीकत
जब 2025-26 का केंद्रीय बजट पेश किया गया था, तब भी इसकी आलोचना हुई थी कि इसमें सामाजिक क्षेत्र पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया है और प्रमुख कल्याणकारी योजनाओं को कम फंड दिया गया है। अब, 2026-27 के बजट दस्तावेजों से यह साफ हो गया है कि सरकार ने उन कम आवंटित राशियों को भी पूरा खर्च नहीं किया।
द वायर ने 20 सामाजिक क्षेत्र की योजनाओं के आंकड़ों का विश्लेषण किया ताकि यह देखा जा सके कि क्या सरकार वास्तव में अपनी बातों पर खरी उतर रही है। विश्लेषण के नतीजे काफी चिंताजनक हैं।
सिर्फ दो योजनाओं में बढ़ा खर्च, मनरेगा पर सस्पेंस
वित्तीय वर्ष 2025-26 के संशोधित अनुमान केवल दो योजनाओं के लिए बजट अनुमानों से अधिक हैं:
- पीएम गरीब कल्याण अन्न योजना
- MGNREGA (मनरेगा)
यह बात इसलिए भी हैरान करने वाली है क्योंकि इनमें से एक—MGNREGA—को वास्तव में बंद कर दिया गया है। हालांकि सरकार ने पिछले रोजगार गारंटी कानून को बदलने के लिए लाए गए विधेयक के लिए एक बड़ा बजट अलग रखा है (‘VB G RAM G Scheme’ के लिए 95,692 करोड़ रुपये), लेकिन सामाजिक कार्यकर्ताओं ने चिंता जताई है कि नई योजना कुछ बहुत ही महत्वपूर्ण मायनों में अलग है।
उदाहरण के लिए, यह योजना ‘सार्वभौमिक’ (Universal) होने के बजाय केंद्र सरकार को उन क्षेत्रों को ‘अधिसूचित’ (Notify) करने की शक्ति देती है जहां इसे लागू किया जाएगा। विपक्षी शासित राज्यों के साथ मोदी सरकार के तनावपूर्ण संबंधों को देखते हुए, यह आश्चर्य की बात नहीं है कि इससे गंभीर चिंताएं पैदा हुई हैं।
सामाजिक क्षेत्र का खर्च
कई विशेषज्ञों ने बार-बार यह बात दोहराई है कि नरेंद्र मोदी शासन ने सामाजिक क्षेत्र को प्राथमिकता नहीं दी है और इस प्रमुख क्षेत्र में खर्च या तो स्थिर हो गया है या कम हो रहा है। रविवार को पेश किए गए 2026-27 के केंद्रीय बजट ने इस आशंका को और गहरा कर दिया है कि यह रुझान न केवल जारी रहेगा, बल्कि और भी खराब हो सकता है।
विश्लेषण की गई योजनाओं में से केवल एक, ‘पीएम-किसान’ (PM-Kisan), के मामले में बजट अनुमान और संशोधित अनुमान बिल्कुल मेल खाते हैं। बाकी 17 योजनाओं के लिए, केंद्र सरकार ने वह राशि नहीं भेजी जो उसने भेजने का वादा किया था। कई मामलों में तो वादे और हकीकत के बीच का अंतर बहुत बड़ा है।
जल जीवन मिशन: 50 हजार करोड़ का अंतर
बुनियादी ढांचे के संकट पर नजर रखने वालों के लिए ये आंकड़े चौंकाने वाले हैं। खुद प्रधानमंत्री मोदी ने 2019 में सभी ग्रामीण भारतीयों को सुरक्षित नल का पानी उपलब्ध कराने के लिए ‘जल जीवन मिशन’ की शुरुआत की थी।
- वादा (बजट अनुमान): 67,000 करोड़ रुपये
- हकीकत (संशोधित अनुमान): 17,000 करोड़ रुपये
इंदौर में हाल की घटनाओं ने यह साबित कर दिया है कि सुरक्षित नल के पानी तक पहुंच कितनी महत्वपूर्ण है, फिर भी ऐसा लगता है कि सरकार ने इसे प्राथमिकता सूची में नीचे धकेल दिया है।
आवास योजनाओं में भी सरकार ने हाथ खींचे
केंद्र सरकार की आवास योजनाओं—ग्रामीण और शहरी दोनों—पर खर्च भी वादों पर खरा नहीं उतरा। यह तब है जब मोदी सरकार ने 2024 में PMAY-Urban का “2.0” संस्करण लॉन्च किया था। आंकड़ों पर नजर डालें तो पता चलता है कि बजट अनुमानों की तुलना में संशोधित अनुमानों में भारी कमी आई है:
- PMAY-Urban: 19,794 करोड़ रुपये कम खर्च हुए।
- PMAY-Urban 2.0: 3,200 करोड़ रुपये कम खर्च हुए।
- PMAY-Rural: 22,332 करोड़ रुपये कम खर्च हुए।

विशेषज्ञों की राय: राज्य उठा रहे हैं भार
केंद्र सरकार द्वारा सामाजिक योजनाओं पर वादे के मुताबिक खर्च न करने की बात विशेषज्ञों की नजर से नहीं बची है। अर्थशास्त्री जयति घोष और सी.पी. चंद्रशेखर ने हाल ही में बताया कि पिछले दशकों में भारत में सामाजिक खर्च में जो वृद्धि देखी गई है, वह मुख्य रूप से राज्य सरकारों द्वारा संचालित है, जबकि केंद्र सरकार से उन्हें मिलने वाले फंड (Transfers) के हिस्से में कमी आई है।
मोदी सरकार भले ही यह दावा करने के लिए उत्सुक हो कि वह कल्याणकारी खर्च को गंभीरता से लेती है, लेकिन बजट के आंकड़े इस दावे का समर्थन करते नहीं दिखते।
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