अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन ने बुधवार को 16 प्रमुख व्यापारिक साझेदार देशों की अत्यधिक औद्योगिक क्षमता की जांच शुरू कर दी है। यह कड़ा कदम ऐसे समय में उठाया गया है जब पिछले महीने ही अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने ट्रंप के मुख्य टैरिफ कार्यक्रम को खारिज कर दिया था। अब इस नई जांच के जरिए प्रशासन एक बार फिर से टैरिफ का दबाव बनाने की रणनीति पर काम कर रहा है।
अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि (यूएसटीआर) जेमिसन ग्रीर ने इस मामले पर जानकारी देते हुए कहा कि धारा 301 के तहत अनुचित व्यापार प्रथाओं की इस जांच के परिणामस्वरूप इस गर्मी तक चीन, यूरोपीय संघ, भारत, जापान, दक्षिण कोरिया और मैक्सिको जैसे देशों पर नए टैरिफ लगाए जा सकते हैं। इस जांच के दायरे में आने वाली अन्य अर्थव्यवस्थाओं में ताइवान, वियतनाम, थाईलैंड, मलेशिया, कंबोडिया, सिंगापुर, इंडोनेशिया, बांग्लादेश, स्विट्जरलैंड और नॉर्वे शामिल हैं। दिलचस्प बात यह है कि अमेरिका के दूसरे सबसे बड़े व्यापारिक साझेदार कनाडा को इस जांच सूची से बाहर रखा गया है।
एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान पत्रकारों से बात करते हुए ग्रीर ने स्पष्ट किया कि यह जांच मुख्य रूप से उन अर्थव्यवस्थाओं पर केंद्रित होगी जहां लगातार व्यापार अधिशेष या अप्रयुक्त क्षमता के माध्यम से विभिन्न विनिर्माण क्षेत्रों में संरचनात्मक अतिरिक्त क्षमता प्रदर्शित करने के सबूत मिलते हैं। अतिरिक्त औद्योगिक क्षमता पर ध्यान केंद्रित करते हुए इस जांच में कई अहम पहलुओं को परखा जाएगा।
इनमें बड़े चालू खाते के अधिशेष, सरकारी सब्सिडी, घरेलू मजदूरी को जानबूझकर कम रखना, राज्य के स्वामित्व वाले उद्यमों की गैर-वाणिज्यिक गतिविधियां, अपर्याप्त पर्यावरण और श्रम मानक, रियायती ऋण और मुद्रा प्रथाएं शामिल हैं।
यह पूरी जांच प्रक्रिया 20 फरवरी को अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले के बाद शुरू हुई है, जिसमें राष्ट्रीय आपातकाल कानून के तहत लगाए गए ट्रंप के वैश्विक टैरिफ को अवैध करार दिया गया था। उस अदालत के फैसले के तुरंत बाद, राष्ट्रपति ट्रंप ने 1974 के व्यापार अधिनियम की धारा 122 के तहत 150 दिनों के लिए 10 प्रतिशत का अस्थायी टैरिफ लागू कर दिया था।
ग्रीर को उम्मीद है कि वे इन अस्थायी टैरिफ की समय सीमा जुलाई में समाप्त होने से पहले ही प्रस्तावित उपायों के साथ धारा 301 की जांच पूरी कर लेंगे। इस प्रक्रिया को तेजी से आगे बढ़ाया जाएगा, जिसमें 15 अप्रैल तक सार्वजनिक टिप्पणियां स्वीकार की जाएंगी और लगभग 5 मई के आसपास सुनवाई तय की गई है।
इसके साथ ही, जबरन श्रम से बने उत्पादों के आयात पर भी प्रशासन की पैनी नजर है। ग्रीर ने बताया कि प्रशासन गुरुवार को धारा 301 के तहत एक और जांच शुरू करेगा, जिसका मकसद जबरन मजदूरी से तैयार हुए सामानों के अमेरिकी आयात पर पूर्ण प्रतिबंध लगाना है।
इस जांच के दायरे में 60 से अधिक देशों के शामिल होने की संभावना है। अमेरिका ने पहले ही पूर्व राष्ट्रपति जो बाइडेन द्वारा हस्ताक्षरित उइगर फोर्स्ड लेबर प्रोटेक्शन एक्ट के तहत चीन के शिनजियांग क्षेत्र से आने वाले सौर पैनलों और अन्य उत्पादों पर सख्त प्रतिबंध लगा रखे हैं। अब इस नई जांच से ऐसे कदम अन्य देशों तक भी विस्तारित किए जा सकते हैं।
वाशिंगटन ने चीनी अधिकारियों पर शिनजियांग में जातीय उइगरों और अन्य मुस्लिम अल्पसंख्यकों के लिए विशेष श्रम शिविर स्थापित करने का गंभीर आरोप लगाया है, हालांकि बीजिंग हमेशा से इन दावों को नकारता रहा है। यह जांच ऐसे महत्वपूर्ण समय में हो रही है जब ट्रेजरी सचिव स्कॉट बेसेंट के नेतृत्व में अमेरिकी अधिकारी इस सप्ताह पेरिस में अपने चीनी समकक्षों से मिलने की तैयारी कर रहे हैं।
इसके बाद इसी महीने बीजिंग में डोनाल्ड ट्रंप और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच एक बड़ी बैठक होने की भी संभावना है। आपको बता दें कि ट्रंप ने अपने पहले कार्यकाल के दौरान भी कई चीनी आयातों पर लगभग 25 प्रतिशत टैरिफ लगाने के लिए धारा 301 जांच का इस्तेमाल किया था, जिसे अदालती चुनौतियों के सामने ज्यादा मजबूत कानूनी हथियार माना जाता है।

ईरान ने अमेरिका और इजरायल के साथ युद्ध समाप्त करने के लिए रखीं तीन शर्तें
एक अन्य प्रमुख अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रम में, तेहरान ने अमेरिका और इजरायल के साथ चल रहे मौजूदा युद्ध को समाप्त करने के लिए तीन अहम शर्तें सामने रखी हैं। ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन ने स्पष्ट किया है कि किसी भी शांति समाधान के लिए ईरान के वैध अधिकारों को मान्यता देना और इस बात की गारंटी देना आवश्यक है कि देश को भविष्य में किसी बाहरी हमले का सामना नहीं करना पड़ेगा।
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक पोस्ट साझा करते हुए, राष्ट्रपति पेजेशकियन ने युद्ध के दौरान हुए भारी नुकसान के लिए मुआवजे की भी मांग की। उन्होंने लिखा कि रूस और पाकिस्तान के शीर्ष नेताओं से बात करते हुए उन्होंने क्षेत्र में शांति के प्रति ईरान की प्रतिबद्धता को दोहराया है। उनके अनुसार, जायोनी शासन और अमेरिका द्वारा भड़काए गए इस विनाशकारी युद्ध को खत्म करने का एकमात्र तरीका ईरान के अधिकारों को स्वीकार करना, हर्जाने का भुगतान करना और भविष्य के किसी भी आक्रमण के खिलाफ सख्त अंतरराष्ट्रीय गारंटी सुनिश्चित करना है।

ईरानी राष्ट्रपति का यह युद्धविराम का प्रस्ताव ऐसे तनावपूर्ण समय में आया है जब सशस्त्र बलों के प्रवक्ता अबोलफज़ल शेकरची ने एक सरकारी टीवी चैनल को बताया कि अगर वाशिंगटन ने ईरानी बंदरगाह सुविधाओं पर कोई भी हमला किया, तो फारस की खाड़ी का कोई भी बंदरगाह या आर्थिक केंद्र ईरान के निशाने से बाहर नहीं होगा।
उन्होंने कड़ी चेतावनी दी कि अगर उनके बंदरगाहों को खतरा होता है, तो क्षेत्र के सभी बंदरगाह उनके वैध लक्ष्य बन जाएंगे और सशस्त्र बल अब तक किए गए ऑपरेशनों की तुलना में कहीं अधिक भारी सैन्य कार्रवाई करेंगे। इसके साथ ही उन्होंने सभी क्षेत्रीय देशों से अमेरिकियों को अपनी भूमि से बेदखल करने का आह्वान भी किया।
युद्ध के संबंध में इजरायल के भीतर चल रहे आकलन की बात करें तो, प्रमुख समाचार एजेंसियों की रिपोर्ट के अनुसार इजरायली अधिकारियों ने अपनी बंद कमरे की चर्चाओं में यह बात स्वीकार की है कि इस बात की कोई निश्चितता नहीं है कि ईरान के खिलाफ युद्ध से वहां की सरकार गिर ही जाएगी। भारी बमबारी के बावजूद ईरान के भीतर किसी बड़े नागरिक विद्रोह के कोई संकेत नहीं मिले हैं।
हालांकि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सार्वजनिक तौर पर यह टिप्पणी की थी कि युद्ध बहुत जल्द समाप्त हो सकता है, लेकिन इजरायल का अपना आकलन यह है कि वाशिंगटन फिलहाल इस संघर्ष को पूरी तरह से रोकने का निर्देश देने के करीब बिल्कुल नहीं है।
अमेरिका और इजरायल के बेहद सघन बमबारी अभियानों में ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई के साथ-साथ कई शीर्ष वरिष्ठ सैन्य कमांडर मारे गए हैं। इसके अलावा कई निर्दोष नागरिकों की भी जान गई है और सार्वजनिक इमारतें व घर तबाह हुए हैं, जिससे आम ईरानियों में भारी गुस्सा पनप रहा है।
तेहरान और अन्य प्रमुख शहरों में लगातार हो रहे मिसाइल हमलों और विरोध करने वालों के खिलाफ ईरानी अधिकारियों की घातक कार्रवाई की धमकियों के बीच, जो लोग सड़कों पर उतरकर विरोध कर सकते थे, वे भी युद्ध खत्म होने तक बाहर निकलने से डर रहे हैं। फिर भी, ईरान के लिए आगे की दीर्घकालिक चुनौतियां पहले से कहीं अधिक गंभीर नजर आ रही हैं।
लगातार कड़े होते अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों ने अर्थव्यवस्था की कमर तोड़ दी है और उस आबादी के लिए बेहतर समय की कोई उम्मीद नहीं बची है, जिनके जनवरी में हुए विरोध प्रदर्शनों को बेरहमी से कुचल दिया गया था और जिसमें हजारों लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी थी।
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