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फर्जी कोर्ट, नकली जज और करोड़ों की लूट: मुंबई पुलिस ने गुजरात से खोज निकाला डिजिटल अरेस्ट स्कैम का मोहरा

| Updated: December 29, 2025 19:17

मुंबई: साइबर अपराधी अब ठगी के लिए बेहद शातिर और हैरान करने वाले तरीके अपना रहे हैं। मुंबई के पश्चिमी उपनगर से ‘डिजिटल अरेस्ट’ का एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसने पुलिस को भी चौंका दिया है। यहाँ 68 वर्षीय एक बुजुर्ग महिला को जाल में फंसाने के लिए ठगों ने एक फर्जी वर्चुअल कोर्ट (Virtual Court) का सेट तैयार किया, जिसमें एक व्यक्ति ने खुद को “जस्टिस चंद्रचूड़” बताकर सुनवाई की। इस सुनियोजित साजिश के तहत महिला से कुल 3.75 करोड़ रुपये की ठगी की गई।

आमतौर पर ऐसे मामलों में ठग पुलिस की वर्दी पहनकर डराते हैं, लेकिन इस बार उन्होंने पैंतरा बदलते हुए पीड़िता से उनके जीवन पर एक “निबंध” (Essay) भी लिखवाया। हालांकि इस गिरोह के मुख्य सरगना अभी भी फरार हैं, लेकिन वेस्ट साइबर पुलिस ने गुजरात से 46 वर्षीय जितेंद्र बियानी को गिरफ्तार करने में सफलता पाई है। जांच में पता चला है कि ठगी गई रकम का एक बड़ा हिस्सा बियानी के बैंक खाते में ट्रांसफर किया गया था।

पुलिस का कहना है कि मुख्य कॉल करने वाले अपराधी अक्सर देश के बाहर से नेटवर्क चलाते हैं, जिससे उन तक पहुंचना भारतीय एजेंसियों के लिए चुनौतीपूर्ण हो जाता है।

कैसे बुना गया ठगी का जाल?

बुजुर्ग महिला की यह परीक्षा 18 अगस्त को शुरू हुई, जब उन्हें “कोलाबा पुलिस स्टेशन” के नाम से एक कॉल आया। कॉलर ने दावा किया कि महिला का बैंक खाता 6 करोड़ रुपये के मनी लॉन्ड्रिंग मामले से जुड़ा है। जब पीड़िता ने बताया कि उनका ऐसा कोई खाता नहीं है, तो ठग ने उन्हें एक फर्जी “केस नंबर” थमा दिया और मामले से जुड़े दस्तावेज भेज दिए। अपनी बेगुनाही साबित करने के लिए महिला को जबरदस्त मानसिक दबाव में डाल दिया गया।

उन्हें स्पष्ट निर्देश दिए गए कि वे केस की जानकारी किसी से साझा न करें, वरना उन्हें गिरफ्तार कर लिया जाएगा। खौफजदा महिला ने ठगों के निर्देशानुसार अपनी बैंक डीटेल्स उन्हें सौंप दीं। उन्हें बताया गया कि उनका केस अब सीबीआई (CBI) को सौंपा जा रहा है और उन्हें “24 घंटे डिजिटल निगरानी” (Digital Surveillance) में रखा गया है।

निबंध लेखन और फर्जी ‘जस्टिस’ की एंट्री

इसी दौरान, खुद को अधिकारी बताने वाले एसके जायसवाल ने मामले की कमान संभाली। उसने महिला के चरित्र मूल्यांकन (Character Evaluation) के नाम पर उन्हें अपने जीवन के बारे में दो से तीन पेज का निबंध लिखने को कहा। जायसवाल ने नाटक करते हुए कहा कि वह महिला की मासूमियत से आश्वस्त है और उन्हें जल्द जमानत मिल जाएगी। इसके बाद, उसने महिला की पेशी “जस्टिस चंद्रचूड़” के सामने तय करवाई और हिदायत दी कि वे जज के हर सवाल का सच-सच जवाब दें।

वीडियो कॉल पर सुनवाई शुरू हुई, जहाँ जजों वाली पोशाक में एक व्यक्ति “जस्टिस चंद्रचूड़” बनकर बैठा था। उसने मनी लॉन्ड्रिंग केस को लेकर सवाल-जवाब किए और जब महिला ने खुद को निर्दोष बताया, तो उसने उनकी “जमानत याचिका खारिज” कर दी। जांच के नाम पर महिला को अपनी सारी संपत्ति और म्यूचुअल फंड्स को भुनाने (Redeem) और जमा करने का आदेश दिया गया।

अगस्त से अक्टूबर के बीच, महिला ने कथित ऑडिट के लिए ठगों को 3.75 करोड़ रुपये ट्रांसफर कर दिए। जब काफी समय बीतने के बाद भी पैसा वापस नहीं मिला, तो उन्हें ठगी का एहसास हुआ और उन्होंने पुलिस से संपर्क किया।

ज्वाइंट कमिश्नर लखमी गौतम, डीसीपी पुरुषोत्तम कराड और सीनियर इंस्पेक्टर सुवर्णा शिंदे की निगरानी में इंस्पेक्टर मंगेश मजगर और पीएसआई पूनम जाधव की टीम ने कार्रवाई करते हुए सूरत से जितेंद्र बियानी (46) को दबोच लिया। बियानी ने ठगी की रकम में से 1.7 करोड़ रुपये प्राप्त किए थे।

रिटायर्ड टीचर को भी बनाया शिकार

डिजिटल अरेस्ट के एक अन्य मामले में, वेस्ट साइबर पुलिस ने एक रिटायर्ड शिक्षिका से 20 लाख रुपये ठगने के आरोप में गुजरात के गांधीनगर से गौरव बालोत (25) को गिरफ्तार किया है। शिक्षिका को बताया गया था कि संदिग्ध गतिविधियों के चलते उन्हें 90 दिनों की “डिजिटल हिरासत” में भेजा गया है। उन्हें हर घंटे फोन पर अपनी उपस्थिति दर्ज करानी होती थी।

एक “क्लीयरेंस लेटर” पाने के लिए टीचर से उनके सारे निवेश की जानकारी मांगी गई और पैसे एक “सीक्रेट सुपरविजन अकाउंट” में जमा करने को कहा गया। 20 लाख रुपये देने के बाद भी जब लेटर नहीं मिला, तो उन्हें ठगे जाने का पता चला। जांच में सामने आया कि गौरव बालोत ने ठगी गई रकम में से 5.3 लाख रुपये प्राप्त किए थे, जिसे उसने एटीएम से निकालकर अपने साथी को दिया। इस काम के लिए उसे 10,000 रुपये का कमीशन मिला था।

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