सुप्रीम कोर्ट द्वारा वकीलों को याचिकाओं के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) पर आंख मूंदकर निर्भर न रहने की चेतावनी देने के ठीक एक हफ्ते बाद, गुजरात हाईकोर्ट ने भी एक ‘चिंताजनक ट्रेंड’ (Worrying trend) की ओर इशारा किया है। अदालत ने पाया है कि अर्ध-न्यायिक (quasi-judicial) आदेशों में AI द्वारा उत्पन्न किए गए ऐसे केस और फैसलों का हवाला दिया जा रहा है, जो असल में संदिग्ध हैं।
‘मरहबा ओवरसीज प्राइवेट लिमिटेड’ (Marhaba Overseas Pvt Ltd) से जुड़े एक मामले में अदालत ने पाया कि GST आदेश में दिए गए कई फैसलों की सत्यता की पुष्टि ही नहीं की जा सकी। हद तो तब हो गई जब कुछ फैसलों को गलत अदालतों के नाम से पेश कर दिया गया।
सुप्रीम कोर्ट में भी उठ चुका है मुद्दा
गौरतलब है कि हाल ही में सुप्रीम कोर्ट के सामने भी ऐसा ही एक मुद्दा आया था, जहां AI की मदद से तैयार की गई याचिकाओं में उन फैसलों को मिसाल के तौर पर पेश किया गया था, जिनका कोई अस्तित्व ही नहीं था। ऐसे ही एक ताज़ा मामले ने अब गुजरात हाईकोर्ट को यह विचार करने पर मजबूर कर दिया है कि अर्ध-न्यायिक अधिकारियों द्वारा अपने आदेशों में न्यायिक उदाहरण (judicial precedents) देते समय कुछ ‘ठोस मानदंड’ तय किए जाने चाहिए।
क्या है पूरा मामला?
यह विवाद ‘मरहबा ओवरसीज प्राइवेट लिमिटेड’ के खिलाफ शुरू हुई कार्यवाही से जुड़ा है। कंपनी को 29 जून, 2025 को सेंट्रल गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स (GST) और सेंट्रल एक्साइज के एडिशनल कमिश्नर द्वारा GST पोर्टल पर एक नोटिस जारी किया गया था।
कंपनी द्वारा अपना बचाव पेश किए जाने के बाद, कमिश्नर ने 26 सितंबर, 2025 को उनके खिलाफ आदेश पारित कर दिया।
हाईकोर्ट में वकीलों की दलील
इस आदेश को चुनौती देते हुए कंपनी ने सीनियर एडवोकेट सौरभ सोपारकर और एडवोकेट पार्थ भट्ट के माध्यम से हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
सुनवाई के दौरान वकीलों ने अदालत को बताया कि एडिशनल कमिश्नर के आदेश में जिन कई फैसलों का जिक्र किया गया है, उन्हें काफी खोजने के बावजूद नहीं पाया जा सका।
आदेश में कुछ फैसलों को गुजरात हाईकोर्ट का बताया गया था, जबकि हकीकत में वे सुप्रीम कोर्ट या किसी अन्य अदालत के फैसले थे। वकीलों ने हाईकोर्ट से आग्रह किया कि अर्ध-न्यायिक अधिकारियों के लिए दिशानिर्देश तय होने चाहिए, ताकि वे AI द्वारा बनाए गए उन फैसलों का आंख मूंदकर इस्तेमाल न करें जो या तो वजूद में ही नहीं हैं, या करदाता (assessee) द्वारा उठाए गए मुद्दों पर लागू नहीं होते।
अदालत की कड़ी टिप्पणी: “तर्क त्रुटिपूर्ण और भ्रामक हैं”
इस मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस ए.एस. सुपेहिया और जस्टिस प्रणव त्रिवेदी की पीठ ने कहा कि वकीलों की यह दलील “स्वीकार करने योग्य” है। अदालत ने इस स्थिति को ‘एक चिंताजनक ट्रेंड’ करार दिया।
पीठ ने अपनी टिप्पणी में कहा, “प्रतिवादी कमिश्नर ने बचाव पक्ष की दलीलों को खारिज करते हुए जिन फैसलों/हवालों पर भरोसा किया है, उनके आधार पर दिए गए तर्क और निष्कर्ष पूरी तरह से त्रुटिपूर्ण और भ्रामक (flawed and deceptive) हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि कमिश्नर ने असली फैसलों को पढ़े बिना ही AI-जनित उद्धरणों और केस कानूनों का पालन किया है।”
हाईकोर्ट ने आगे स्पष्ट किया कि यह एक ऐसा मामला है जहां अर्ध-न्यायिक अधिकारियों के लिए हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते समय कुछ नियम या दिशा-निर्देश तय करने की सख्त जरूरत है।
इस मामले की अगली सुनवाई 13 मार्च के लिए तय की गई है, जिसमें GST के वकील को इस गंभीर मुद्दे पर अदालत के सामने अपना पक्ष रखने का निर्देश दिया गया है।
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