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गुजरात: बबेसिया संक्रमण से 5 शेरों की मौत के बीच 12 वन्यजीव पशु चिकित्सकों का सामूहिक इस्तीफा

| Updated: May 28, 2026 13:17

बबेसिया संक्रमण से 5 शेरों की मौत के बीच वन विभाग में हड़कंप; GPSC के भर्ती नियमों में वन्यजीव अनुभव को दरकिनार करने से नाराज 12 डॉक्टरों ने छोड़ा काम।

राजकोट/अहमदाबाद: गुजरात में बबेसिया संक्रमण के कारण दो शावकों सहित पांच शेरों की दुखद मौत हो गई है। ऐसे गंभीर समय में राज्य के वन्यजीव प्रबंधन को एक बड़ा झटका लगा है। गिर और सक्करबाग चिड़ियाघर में तैनात 12 अनुबंधित पशु चिकित्सकों (वेटरनरी डॉक्टर) ने एक साथ सामूहिक इस्तीफा दे दिया है। इन डॉक्टरों ने गुजरात लोक सेवा आयोग (जीपीएससी) के भर्ती नियमों के विरोध में यह कदम उठाया है।

पशु चिकित्सकों ने अपने संयुक्त इस्तीफे में स्पष्ट किया है कि जीपीएससी के नए नियम वन्यजीवों के इलाज के विशेष अनुभव को नजरअंदाज करते हैं। यह इस्तीफा ऐसे नाजुक मोड़ पर आया है जब राज्य शेरों में फैले एक खतरनाक वायरस से जूझ रहा है। गुजरात स्टेट लायन कंजर्वेशन सोसाइटी और सक्करबाग जू मैनेजमेंट एडवाइजरी सोसाइटी के साथ काम कर रहे इन डॉक्टरों ने पिछले हफ्ते ही अपना एक महीने का नोटिस सौंप दिया था।

यह पूरा विवाद जीपीएससी द्वारा 18 स्थायी क्लास-2 पशु चिकित्सा अधिकारियों के पदों के लिए निकाले गए विज्ञापन से शुरू हुआ है। प्रदर्शनकारी डॉक्टरों का कहना है कि ये भर्ती नियम पूरी तरह से पशुपालन विभाग की नकल हैं। इनमें जंगली जानवरों के इलाज के जटिल अनुभव को कोई तरजीह नहीं दी गई है।

प्रधान मुख्य वन संरक्षक (वन्यजीव) जयपाल सिंह ने भी इस्तीफा मिलने की पुष्टि की है। उन्होंने बताया कि डॉक्टर भर्ती प्रक्रिया में वन्यजीव अनुभव को महत्व देने की मांग कर रहे हैं। फिलहाल यह मामला सरकार के पास लंबित है और इस पर अंतिम निर्णय लिया जाना बाकी है।

डॉक्टरों का तर्क है कि वन्यजीव स्वास्थ्य देखभाल के लिए विशेष कौशल की आवश्यकता होती है। यह मवेशियों के इलाज से बिल्कुल अलग है। खासकर आपातकालीन बचाव, बीमारी नियंत्रण और मानव-पशु संघर्ष को प्रबंधित करने में वन्यजीव अनुभव की बहुत जरूरत होती है।

वर्तमान में इन 12 अनुबंधित डॉक्टरों में से अधिकांश गिर और उसके आसपास के विस्तृत क्षेत्रों में तैनात हैं। इनके अलावा दो अन्य डॉक्टर पशुपालन विभाग से प्रतिनियुक्ति पर वन विभाग के साथ काम कर रहे हैं।

वेलावदार में तैनात डॉक्टर यश बरैया के अनुसार, राज्य की वन्यजीव स्वास्थ्य देखभाल काफी हद तक इन्हीं डॉक्टरों पर निर्भर है। ये 12 अधिकारी लगभग 891 एशियाई शेरों के साथ-साथ फ्लोरिकन और जंगली गधे जैसी कई प्रजातियों के बचाव अभियान और पोस्टमार्टम जैसी अहम जिम्मेदारियां संभालते हैं। उन्होंने जोर देकर कहा कि मवेशियों और जंगली जानवरों का इलाज करना दो अलग-अलग चीजें हैं।

इस्तीफा देने से पहले इन अधिकारियों ने प्रशासन से भर्ती नियमों में संशोधन करने की गुहार लगाई थी। उनकी मांग थी कि कम से कम एक साल के वन्यजीव या चिड़ियाघर के अनुभव वाले उम्मीदवारों को प्राथमिकता दी जाए। उन्होंने इस बात का भी हवाला दिया कि गांधीनगर में गीर (GEER) फाउंडेशन की भर्ती में पहले ऐसी ही प्राथमिकता दी गई थी।

वन बल के प्रमुख, मुख्य वन संरक्षक (वन्यजीव सर्कल, जूनागढ़) और प्रमुख सचिव को कई बार ज्ञापन सौंपे गए, लेकिन समस्या का कोई हल नहीं निकला। डॉक्टरों ने अपने पत्र में लिखा है कि कोई संतोषजनक समाधान न मिलने के कारण वे अनुबंध की शर्तों के अनुसार 15 मई, 2026 से प्रभावी एक महीने के नोटिस के साथ अपना संयुक्त इस्तीफा सौंप रहे हैं।

यह प्रशासनिक संकट ऐसे समय में गहरा गया है जब वन विभाग शेरों में फैले वायरस को रोकने के लिए संघर्ष कर रहा है, जहाँ पिछले 10 दिनों में ही पांच शेरों की जान जा चुकी है। पालीताना के वाडल में तैनात डॉक्टर धवल सावलिया ने निराशा जताते हुए कहा कि उन्होंने गांधीनगर में उच्च अधिकारियों से मुलाकात कर अपनी बात रखी थी, लेकिन वहां से उन्हें केवल नकारात्मक प्रतिक्रिया ही मिली।

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