अहमदाबाद: गुजरात के म्यूचुअल फंड बाजार में इन दिनों निवेशकों की एक नई लहर देखने को मिल रही है। वेल्थ मैनेजर्स के अनुसार, पारिवारिक संपत्ति विरासत में पाने वाले लोग और रिटायर्ड बुजुर्ग अब अपनी अचल संपत्ति (रियल एस्टेट) को बेचकर उससे मिलने वाले पैसे को पेशेवर रूप से प्रबंधित वित्तीय पोर्टफोलियो में लगा रहे हैं।
वित्तीय सलाहकारों का मानना है कि इस बड़े बदलाव के पीछे मुख्य वजह वरिष्ठ नागरिकों की नियमित आय, बेहतर लिक्विडिटी और उत्तराधिकार की आसान योजना की तलाश है। यह ट्रेंड खासकर उन परिवारों में ज्यादा देखा जा रहा है जिनके बच्चे विदेश या दूसरे शहरों में बस गए हैं, क्योंकि ऐसी स्थिति में भौतिक संपत्तियों का प्रबंधन करना काफी जटिल हो जाता है।
पेशे से कंपनी सचिव 59 वर्षीय उमेश वेद के लिए उत्तराधिकार की योजना बनाना ही इस बदलाव का सबसे बड़ा कारण था। उन्होंने बताया कि हाल ही में उन्होंने अपनी रियल एस्टेट संपत्तियों को समेट कर वित्तीय संपत्तियों में तब्दील किया है। शेयर और म्यूचुअल फंड में सक्रिय निवेशक होने के नाते उनका रुझान हमेशा इन विकल्पों की तरफ रहा है, क्योंकि इन्हें कानूनी वारिसों को ट्रांसफर करना भौतिक संपत्ति की तुलना में बहुत आसान है।
वेद आगे कहते हैं कि सोने या चांदी जैसी संपत्तियों के साथ हमेशा दुरुपयोग या विवाद का जोखिम बना रहता है। इसके विपरीत, वित्तीय संपत्तियां पूरी तरह से दस्तावेजी होती हैं और उनका हस्तांतरण बेहद सरल होता है।
वेल्थ मैनेजर्स के मुताबिक, एक और नया वर्ग उन लोगों का उभर रहा है जिन्हें विरासत में कई संपत्तियां मिलती हैं, लेकिन वे उन्हें अपने पास रखने के बजाय भुनाना पसंद करते हैं। ऐसे लोग प्रॉपर्टी में दोबारा निवेश करने या फिक्स्ड डिपॉजिट (एफडी) में पैसा रखने के बजाय म्यूचुअल फंड का रुख कर रहे हैं।
एक वित्तीय सलाहकार फर्म के निदेशक मुमुक्षु देसाई ने बताया कि 50 और 60 के दशक वाले लोग अब तेजी से अपनी संपत्तियों को समेकित (कंसोलिडेट) करना शुरू कर देते हैं। इसकी शुरुआत पांच या छह बैंक खातों को घटाकर दो करने जैसी साधारण चीजों से होती है और धीरे-धीरे यह प्रॉपर्टी जैसी बड़ी संपत्तियों तक पहुंच जाती है।
सलाहकारों का कहना है कि शेयर बाजारों में निवेशकों का बढ़ता भरोसा और पारंपरिक बचत साधनों से मिलने वाला कम रिटर्न इस बदलाव की गति को और तेज कर रहा है।
एक म्यूचुअल फंड डिस्ट्रीब्यूशन कंपनी के संस्थापक जयदेवसिंह चुडास्मा के अनुसार, राष्ट्रीय पेंशन प्रणाली (एनपीएस) के जरिए सरकार के इक्विटी एक्सपोजर ने शेयर बाजार और म्यूचुअल फंड में लोगों का विश्वास काफी बढ़ाया है। इसके अलावा फिक्स्ड डिपॉजिट की घटती ब्याज दरें भी इसका एक बड़ा कारण हैं।
पिछले साल एक प्रमुख तकनीकी कॉलेज के प्रिंसिपल पद से रिटायर हुए परेश रावल का अनुभव भी कुछ ऐसा ही है। पारंपरिक निवेश विकल्पों से घटते रिटर्न को देखकर उन्होंने अपना पूरा रिटायरमेंट फंड म्यूचुअल फंड में लगाने का फैसला किया। उनका कहना है कि बैंक जमा पर ब्याज दरें कम हो गई हैं और अन्य गारंटीकृत योजनाओं से मिलने वाला रिटर्न भी अब पहले जैसा नहीं रहा।
रावल ने इस बात पर भी जोर दिया कि पैसे की तरलता (लिक्विडिटी) उतनी ही महत्वपूर्ण है। रियल एस्टेट में एक बड़े निवेश की जरूरत होती है और जरूरत पड़ने पर इसे तुरंत बेचना आसान नहीं होता। वहीं, म्यूचुअल फंड में आपको जितनी रकम की जरूरत हो, आप केवल उतना ही निकाल सकते हैं और पैसा भी जल्दी मिल जाता है।
उद्यमी हार्दिक आचार्य ने बताया कि आजकल निवेशक टैक्स, रखरखाव के खर्च और लिक्विडिटी का हिसाब लगाने के बाद ही रिटर्न का मूल्यांकन कर रहे हैं। उनके मुताबिक, कई निवेशकों को लगता है कि रियल एस्टेट हमेशा बेहतर रिटर्न देता है, लेकिन जब आप होल्डिंग लागत और टैक्स को ध्यान में रखते हैं, तो डाइवर्सिफाइड वित्तीय संपत्तियां ज्यादा बेहतर और टैक्स-कुशल रिटर्न जेनरेट कर सकती हैं।
आचार्य ने यह भी जोड़ा कि संपन्न निवेशक अब धीरे-धीरे निजी इक्विटी (प्राइवेट इक्विटी) और स्टार्टअप जैसी वैकल्पिक संपत्तियों में भी अपना निवेश बढ़ा रहे हैं। यह स्पष्ट रूप से इस बात का संकेत है कि अब लोग केवल प्रॉपर्टी आधारित संपत्ति निर्माण की पारंपरिक सोच से बाहर निकल रहे हैं।
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