अहमदाबाद: गुजरात तेजी से साइबर अपराध की दुनिया में कुख्यात हो रहे ‘डिजिटल अरेस्ट’ फ्रॉड का केंद्र बनता जा रहा है। साल 2025 में इस तरह की ठगी के मामलों में आई अभूतपूर्व बाढ़ ने पुलिस और सुरक्षा एजेंसियों की नींद उड़ा दी है। राज्य पुलिस के आंकड़े गवाही दे रहे हैं कि कैसे अपराधी खुद को कानून प्रवर्तन एजेंसियों (Law Enforcement Agencies) का अधिकारी बताकर लोगों को उनके ही घरों में ‘वर्चुअल कैद’ में रखकर करोड़ों की वसूली कर रहे हैं। यह मुद्दा अब राज्य ही नहीं, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर चिंता का विषय बन गया है।
आंकड़े जो चौंका देंगे: हर दिन 23 लाख की ठगी
स्थिति की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि केवल 1 जनवरी से 30 नवंबर के बीच, गुजरात में डिजिटल अरेस्ट से जुड़ी 498 शिकायतें दर्ज की गईं। इन मामलों में पीड़ितों को कुल 76.9 करोड़ रुपये का भारी नुकसान उठाना पड़ा। अगर औसत निकालें, तो ठगों ने गुजरात में हर दिन लोगों की जेब से करीब 23 लाख रुपये उड़ाए और हर हफ्ते लगभग 10 नए मामले सामने आए।
राष्ट्रीय स्तर पर नजर डालें तो डिजिटल अरेस्ट स्कैम से होने वाला कुल नुकसान 3,000 करोड़ रुपये के करीब आंका जा रहा है, जो इसे इस साल का सबसे विनाशकारी साइबर अपराध बनाता है।
80 साल के बुजुर्ग और उनकी पत्नी की दर्दनाक आपबीती
अहमदाबाद का एक मामला इस अपराध की भयावहता को बयां करता है। यहां एक 80 वर्षीय सेवानिवृत्त बुजुर्ग और उनकी 78 वर्षीय पत्नी को ठगों ने दो सप्ताह से अधिक समय तक खौफ के साये में रखा। यह बुरा सपना जून की शुरुआत में तब शुरू हुआ जब बुजुर्ग के पास व्हाट्सएप पर एक कॉल आई। कॉल करने वाली महिला ने खुद को मुंबई के बांद्रा स्थित साइबर क्राइम ब्रांच का अधिकारी बताया।
दंपति पर अवैध गतिविधियों से जुड़े होने का झूठा आरोप मढ़ा गया। इसके बाद, कई अन्य ठगों ने अधिकारी बनकर वीडियो कॉल के जरिए उनकी लगातार “पूछताछ” की। फर्जी अदालती समन भेजे गए और जांच के नाम पर उनकी पूरी वित्तीय जानकारी ले ली गई। गिरफ्तारी के डर से दंपति को घर में नजरबंद रहने पर मजबूर किया गया। दबाव इतना बनाया गया कि उन्होंने अपनी फिक्स्ड डिपॉजिट (FD) तुड़वा दी और गोल्ड लोन तक ले लिया। अंततः, इस बुजुर्ग दंपति ने 86 लाख रुपये गंवा दिए।
डर का मनोवैज्ञानिक खेल और ‘मनी लॉन्ड्रिंग’ की धमकी
साइबर क्राइम अधिकारियों का कहना है कि डिजिटल अरेस्ट का पूरा पैटर्न पीड़ित को मनोवैज्ञानिक रूप से तोड़ने पर आधारित है। गुजरात में दर्ज मामलों में वित्तीय नुकसान के लिहाज से यह सबसे बड़ा फ्रॉड बनकर उभरा है। हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि शर्मिंदगी के कारण कई पीड़ित पुलिस के पास नहीं आते, इसलिए असली आंकड़ा इससे कहीं ज्यादा हो सकता है।
उपलब्ध शिकायतों के विश्लेषण से पता चलता है कि पीड़ितों की औसत उम्र 62 वर्ष है, जबकि शिकार बने लोगों की उम्र 29 से 80 वर्ष के बीच है।
व्यक्तिगत नुकसान की रकम 1.2 लाख रुपये से लेकर 19.2 करोड़ रुपये तक देखी गई है।
ठगी का यह खेल आमतौर पर 1 से 15 दिनों तक चलता है, लेकिन जांचकर्ताओं ने ऐसे मामले भी देखे हैं जहां यह सिलसिला दो महीने से ज्यादा समय तक चला।
अहमदाबाद साइबर सेल के अधिकारियों के मुताबिक, सबसे आम तरीका पीड़ितों को ‘मनी लॉन्ड्रिंग’ के केस में फंसाने की धमकी देना है। आधे से ज्यादा मामलों में यही पैंतरा अपनाया गया। पीड़ितों को बताया जाता है कि उनके दस्तावेजों का गलत इस्तेमाल कर फर्जी बैंक खाते खोले गए हैं, जिससे वे गंभीर अपराधों में शामिल हो गए हैं और उन्हें आजीवन कारावास हो सकता है। घबराहट पैदा करने के लिए ठग अक्सर CBI, क्राइम ब्रांच या साइबर सेल जैसे भारी-भरकम नामों का इस्तेमाल करते हैं।
मानसिक सेहत पर गहरा असर
इस अपराध का असर सिर्फ बैंक बैलेंस पर नहीं, बल्कि मानसिक स्वास्थ्य पर भी पड़ रहा है। ‘जीवन आस्था’ सुसाइड प्रिवेंशन हेल्पलाइन के समन्वयक प्रवीण वलेरा ने मीडिया को बताया कि इस साल डिजिटल धोखाधड़ी से जुड़े तनावपूर्ण कॉल्स की संख्या में भारी इजाफा हुआ है। पीड़ित अक्सर गहरे अपराधबोध (Guilt) और भावनात्मक तनाव से गुजरते हैं, भले ही उन्होंने पहले मीडिया में ऐसे स्कैम के बारे में सुन रखा हो।
जागरूकता ही सबसे बड़ा बचाव
वरिष्ठ अधिकारी इस बात पर जोर देते हैं कि जागरूकता ही इस खतरे से निपटने का सबसे मजबूत हथियार है। सीआईडी (क्राइम) के डीजीपी के.एल.एन. राव ने मीडिया को बताया कि हाल ही में ऐसे लोगों की संख्या बढ़ी है जो पैसे गंवाने से पहले ही पुलिस को स्कैम की कोशिश की सूचना दे रहे हैं। यह एक सकारात्मक संकेत है। इसके अलावा, बैंक भी अब असामान्य निकासी या संदिग्ध लेनदेन को फ्लैग करके हस्तक्षेप कर रहे हैं, जो इस बढ़ते साइबर खतरे के खिलाफ सुरक्षा की एक महत्वपूर्ण पंक्ति साबित हो रहा है।
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