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‘डार्क प्रिंस’ से प्रधानमंत्री की कुर्सी तक: तारिक रहमान की जीत के बाद भारत-बांग्लादेश संबंधों में क्या आएगा नया मोड़?

| Updated: February 13, 2026 16:41

17 साल का वनवास और 'डार्क प्रिंस' का ठप्पा पीछे छोड़ अब सत्ता के शिखर पर तारिक; पीएम मोदी ने बढ़ाया दोस्ती का हाथ, लेकिन क्या तीस्ता जल समझौते और शेख हसीना की वापसी पर बनेगी बात?

कभी बांग्लादेश की राजनीति में ‘डार्क प्रिंस’ कहे जाने वाले और देश के सबसे शक्तिशाली राजनीतिक परिवार के वारिस तारिक रहमान के लिए शुक्रवार का दिन ऐतिहासिक रहा। उनकी पार्टी, बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) ने चुनावों में भारी जीत हासिल की है।

इस चुनाव पर भारत की पैनी नजर थी, और दिलचस्प बात यह है कि नतीजों की आधिकारिक घोषणा से पहले ही भारत ने तारिक को बधाई दे दी। यह कदम स्पष्ट संकेत देता है कि 2024 में शेख हसीना के सत्ता से बेदखल होने के बाद भारत अपने पड़ोसी के साथ संबंधों को पटरी पर लाने के लिए कितना उत्सुक है।

भारत के नजरिए से देखें तो, वैचारिक रूप से कट्टर जमात-ए-इस्लामी की तुलना में तारिक की बीएनपी हमेशा से एक अधिक उदार और लोकतांत्रिक विकल्प रही है।

तारिक रहमान के अगले प्रधानमंत्री बनने की प्रबल संभावनाओं के बीच, बड़ा सवाल यह है कि क्या इससे भारत के साथ रिश्तों में एक ‘रीसेट’ (नयी शुरुआत) देखने को मिलेगा? क्या बीएनपी और भारत के बीच का कड़वा इतिहास भविष्य पर हावी होगा? आइए, उन कारकों पर नजर डालते हैं जो यह तय करेंगे कि आने वाले वर्षों में भारत-बांग्लादेश मैत्री एक्सप्रेस का सफर कितना सुहाना होगा।

तारिक रहमान की वापसी और उनका ‘बांग्लादेश फर्स्ट’ का नारा

पिछले साल दिसंबर में लंदन से 17 साल के लंबे निर्वासन के बाद वतन लौटने पर तारिक रहमान, जिन्हें बांग्लादेश में ‘तारिक जिया’ के नाम से भी जाना जाता है, का रुख काफी सकारात्मक रहा है। उन्होंने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के ‘अमेरिका फर्स्ट’ की तर्ज पर ‘बांग्लादेश फर्स्ट’ (सबसे पहले बांग्लादेश) का एजेंडा पेश किया है।

महत्वपूर्ण बात यह है कि उन्होंने भारत, चीन और पाकिस्तान जैसी क्षेत्रीय शक्तियों से समान दूरी बनाए रखने का वादा किया है। मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाले अंतरिम प्रशासन के दौरान पाकिस्तान और चीन के प्रति झुकाव को देखते हुए, तारिक का यह संतुलित रुख भारत के लिए राहत की खबर है।

तारिक रहमान का भारत के लिए क्या मतलब है?

तारिक रहमान ऐसे समय में सत्ता संभाल रहे हैं जब भारत के साथ संबंध दो अलग-अलग पटरियों पर चल रहे हैं। एक तरफ, तारिक को यह बखूबी पता है कि अपनी भौगोलिक स्थिति के कारण भारत उनके लिए अपरिहार्य है। दोनों देश 4,000 किलोमीटर लंबी सीमा साझा करते हैं और व्यापार, बिजली व कनेक्टिविटी के जरिए एक-दूसरे से गहरे जुड़े हैं।

दूसरी तरफ, 2024 में छात्र आंदोलन के बाद शेख हसीना के भारत जाने के बाद से बांग्लादेश में, खासकर ‘जेन जी’ (Gen Z) के बीच, भारत के प्रति संदेह का माहौल है। हसीना के प्रत्यर्पण की बार-बार की गई मांगों पर भारत की सुस्ती ने भी इस अविश्वास को बढ़ाया है।

ऐसे में, भारत के साथ रिश्तों की मरम्मत करना तारिक के लिए प्राथमिकता होगी। भारत ने भी अपनी कूटनीतिक सक्रियता बढ़ा दी है, जो शायद इस बात का संकेत है कि नई दिल्ली ने समय रहते हवा का रुख भांप लिया था।

अतीत की कड़वाहट और नई शुरुआत की उम्मीद

पिछले साल, जब तारिक की मां और पूर्व प्रधानमंत्री खालिदा जिया स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रही थीं, तब भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सार्वजनिक रूप से चिंता व्यक्त की थी और मदद की पेशकश की थी। बीएनपी ने भी इसके लिए आभार जताया था।

कुछ दिनों बाद, जब खालिदा जिया का निधन हुआ, तो विदेश मंत्री एस. जयशंकर 2024 की अशांति के बाद ढाका जाने वाले पहले भारतीय नेता बने। उन्होंने तारिक रहमान से मुलाकात की और उन्हें पीएम मोदी का एक व्यक्तिगत पत्र भी सौंपा।

शुक्रवार को, पीएम मोदी तारिक को बधाई देने वाले पहले नेताओं में शामिल थे। उन्होंने ट्वीट किया, “मैं हमारे बहुआयामी संबंधों को मजबूत करने के लिए आपके साथ काम करने के लिए उत्सुक हूं।” यह संदेश स्पष्ट करता है कि दोनों पक्ष कड़वे अतीत को पीछे छोड़कर आगे बढ़ना चाहते हैं।

तारिक ने भारत के बारे में क्या कहा?

भारत के लिए राहत की बात यह है कि निर्वासन से लौटने वाले तारिक रहमान की छवि अब काफी बदल चुकी है। अपने माता-पिता की छाया से बाहर निकलकर उन्होंने अपना खुद का एजेंडा तय किया है। उन्होंने स्पष्ट किया, “न दिल्ली, न पिंडी, सबसे पहले बांग्लादेश,” यानी बीएनपी न तो खुले तौर पर भारत को लुभाएगी और न ही पाकिस्तान को।

कट्टरपंथी नेता शरीफ उस्मान हादी की हत्या के बाद बांग्लादेश में जो भारत विरोधी भावनाएं भड़की थीं, तारिक ने अपने पहले संबोधन में उसे हवा देने से परहेज किया। उस दौर में हिंदुओं पर हमले बढ़े थे और गारमेंट वर्कर दीपू चंद्र दास की बेरहमी से हत्या (लिंचिंग) ने पूरी दुनिया को झकझोर दिया था। 45 दिनों में करीब 15 हिंदुओं की जान गई थी।

इसके विपरीत, तारिक ने समावेशी स्वर अपनाया और सभी के लिए “सुरक्षित बांग्लादेश” बनाने का वादा किया। उन्होंने कहा, “धर्म व्यक्तिगत है, लेकिन राज्य सबका है।” उनके इस बयान ने यह भरोसा जगाया है कि 8% हिंदू आबादी पर होने वाले हमलों पर अब लगाम लगेगी।

हालांकि, दोस्ती का हाथ बढ़ाते हुए भी तारिक सीमा पर होने वाली हत्याओं और तीस्ता नदी जल बंटवारे जैसे मुद्दों पर दृढ़ हैं। बीएनपी प्रमुख ने तीस्ता और पद्मा नदियों के पानी में उचित हिस्सेदारी और सीमा पर हत्याओं को रोकने का वादा किया है।

‘डार्क प्रिंस’ और हवा भवन का काला अतीत

हालांकि, यह याद रखना जरूरी है कि भले ही तारिक अब ढाका में सत्ता के केंद्र में होंगे, लेकिन एक समय था जब वे ‘हवा भवन’ का केंद्र थे, जहां भारत विरोधी साजिशें रची जाती थीं।

दिलचस्प बात यह है कि बीएनपी का पिछला शासनकाल (2001-2006), जब अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में बीजेपी सरकार थी, भारत-बांग्लादेश संबंधों के सबसे बुरे दौर में से एक था। उस समय जमात-ए-इस्लामी, जिसे पाकिस्तान का प्रॉक्सी माना जाता है, बीएनपी की सहयोगी थी। भारत ने उस दौरान ढाका पर पूर्वोत्तर के उग्रवादियों को पनाह देने और पाक-आधारित आतंकी समूहों की अनदेखी करने का आरोप लगाया था।

उस समय तारिक के पास कोई औपचारिक पद नहीं था, लेकिन उन्हें पर्दे के पीछे का सबसे शक्तिशाली व्यक्ति माना जाता था। वह प्रधानमंत्री आवास से मात्र 6 किलोमीटर दूर स्थित ‘हवा भवन’ से काम करते थे, जो सत्ता का एक समानांतर केंद्र बन गया था। दिसंबर 2005 में, एक अमेरिकी राजनयिक केबल ने उन्हें “द डार्क प्रिंस” कहा था।

इसके अलावा, भारत ने तारिक पर 2004 के कुख्यात चटगांव हथियार मामले के पीछे होने का आरोप भी लगाया था, जो पूर्वोत्तर में अशांति फैलाने के लिए उल्फा (ULFA) के साथ रची गई एक साजिश थी।

2007 में तारिक को गिरफ्तार किया गया, बाद में उन्होंने हिरासत में प्रताड़ना का दावा किया और 2008 में इलाज के लिए यूके चले गए। 5 अगस्त, 2024 को शेख हसीना के तख्तापलट के बाद, तारिक को अवामी लीग सुप्रीमो पर हुए 2004 के ग्रेनेड हमले सहित सभी मामलों से बरी कर दिया गया।

तारिक रहमान 2.0: आगे की राह

करीब 16 साल सत्ता से बाहर रहने के बावजूद, बीएनपी और तारिक ने खुद को राजनीतिक रूप से जीवित रखा। पिछले दिसंबर में उनके स्वागत में उमड़ी भारी भीड़ इसका प्रमाण है।

तारिक के हालिया बयानों ने एक बदले हुए नेता की छवि पेश की है—एक ऐसा नेता जो अब व्यावहारिक और सुधार-केंद्रित है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि ‘तारिक रहमान 2.0’ भारत के साथ संबंधों और शेख हसीना के प्रत्यर्पण जैसे जटिल मुद्दों को कैसे सुलझाते हैं।

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