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मेडिकल शिक्षा का मज़ाक या मजबूरी? 800 में से सिर्फ 9 नंबर लाने वाले डॉक्टर को मिली पीजी सीट

| Updated: February 18, 2026 13:30

800 में से मिले सिर्फ 9 अंक, फिर भी बन गए स्पेशलिस्ट डॉक्टर! खाली सीटें भरने के लिए मेरिट से हुए इस समझौते ने मेडिकल सिस्टम और मरीजों की सुरक्षा पर खड़े किए गंभीर सवाल।

चेन्नई: क्या आप ऐसे डॉक्टर से इलाज कराना चाहेंगे जिसने अपनी विशेषज्ञता (Postgraduate) की परीक्षा में 800 में से केवल 9 अंक हासिल किए हों? यह सवाल सुनने में जितना अजीब लगता है, हकीकत उससे कहीं ज्यादा डरावनी है। चिकित्सा शिक्षा की गुणवत्ता और मेरिट के साथ हो रहे खिलवाड़ का ताज़ा उदाहरण हाल ही में स्टेट सेलेक्शन कमेटी द्वारा आयोजित काउंसलिंग के तीसरे दौर में देखने को मिला।

यहाँ एक डॉक्टर, जिसने NEET PG की प्रवेश परीक्षा में 800 में से महज 9 अंक प्राप्त किए थे, उसे मैनेजमेंट कोटे के तहत एक निजी मेडिकल कॉलेज में पोस्टग्रेजुएट सीट आवंटित कर दी गई।

यह घटना 2025-2026 सत्र के लिए मेडिकल शिक्षा के गिरते स्तर और सिस्टम की लाचारी को उजागर करती है। यह सिर्फ एक सीट भरने का मामला नहीं है, बल्कि भविष्य की स्वास्थ्य व्यवस्था पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न है।

मेरिट का गिरता स्तर: चिंताजनक आंकड़े

अधिकारियों के अनुसार, यदि सरकारी कोटे के तहत सीट पाने वाले 1,902 डॉक्टर और मैनेजमेंट कोटे के 643 छात्र अपनी आवंटित सीटें नहीं लेते हैं, तो अगले दौर में कट-ऑफ और भी नीचे जा सकती है। यह स्थिति तब है जब इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (IMA) और कई वरिष्ठ डॉक्टर पहले ही चेतावनी दे चुके हैं कि इस तरह के दाखिले चिकित्सा शिक्षा में एक गलत और खतरनाक परंपरा की शुरुआत कर रहे हैं।

गौरतलब है कि एमबीबीएस पूरा कर चुके छात्र NEET PG में अपनी योग्यता के आधार पर पीजी कोर्स में प्रवेश लेते हैं। यह 3.3 घंटे की कंप्यूटर-आधारित परीक्षा होती है जिसमें 200 बहुविकल्पीय प्रश्न होते हैं। प्रत्येक प्रश्न 4 अंक का होता है और गलत उत्तर देने पर -1 की नेगेटिव मार्किंग होती है।

सीटें भरने की होड़ में गुणवत्ता से समझौता

सिस्टम की विफलता देखिए कि 9,000 से अधिक खाली पीजी सीटों को भरने की जल्दबाजी में नेशनल बोर्ड ऑफ एग्जामिनेशन इन मेडिकल साइंसेज (NBE) ने योग्यता के मानकों को ही धराशायी कर दिया। 2025-26 के शैक्षणिक सत्र के लिए कट-ऑफ को घटाकर 800 में से 103 कर दिया गया। हद तो तब हो गई जब SC, ST और OBC उम्मीदवारों के लिए क्वालीफाइंग स्कोर -40 (माइनस 40) निर्धारित किया गया।

इस कदम की चौतरफा आलोचना हुई, खासकर तब जब केंद्र की मेडिकल काउंसलिंग कमेटी ने ऑल इंडिया कोटे के तहत सरकारी मेडिकल कॉलेजों और डीम्ड यूनिवर्सिटीज में नेगेटिव स्कोर (शून्य से कम अंक) लाने वाले डॉक्टरों को भी सीटें बांट दीं।

सरकारी और मैनेजमेंट कोटे का हाल

ताजा काउंसलिंग के नतीजों ने इस गिरावट की और भी भयावह तस्वीर पेश की है:

  • सरकारी कोटा: चेन्नई के श्री मुथुकुमारन मेडिकल कॉलेज में महज 42 अंक पाने वाले छात्र को ‘एमडी कम्युनिटी मेडिसिन’ में प्रवेश मिल गया। वहीं, समयपुरम स्थित श्रीनिवासन मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल में 71 अंक वाले छात्र को ‘एमडी फॉरेंसिक मेडिसिन’ की सीट मिली।
  • सर्विस कोटा: सरकारी अस्पतालों में कार्यरत डॉक्टरों के लिए आरक्षित सीटों पर भी स्थिति अलग नहीं थी। चेन्नई के ईएसआई मेडिकल कॉलेज में ‘एमएस ऑर्थोपेडिक्स’ के लिए कट-ऑफ 87 अंक रही। सर्विस कोटे में सात ऐसे छात्र थे जिन्हें 100 से कम अंक होने के बावजूद पीजी सीटें आवंटित की गईं।

मैनेजमेंट कोटा: मेरिट की रसातल

मैनेजमेंट कोटे में स्थिति और भी दयनीय नजर आई, जहाँ मेरिट पूरी तरह से बेमानी हो गई:

  • पेराम्बलुर के धनलक्ष्मी श्रीनिवासन मेडिकल कॉलेज में ‘एमडी फार्माकोलॉजी’ की सीट उस उम्मीदवार को मिली जिसके 800 में से सिर्फ 9 अंक थे।
  • इसी कॉलेज में ‘एमडी कम्युनिटी मेडिसिन’ की सीट 25 अंक वाले उम्मीदवार की झोली में गई।

आंकड़े बताते हैं कि कम से कम 21 ऐसे डॉक्टर हैं जिन्होंने 100 से कम स्कोर किया और फिर भी उन्हें पीजी सीटें आवंटित कर दी गईं।

यह सिस्टम की हार है!

जब 9 अंक या माइनस स्कोर वाला व्यक्ति विशेषज्ञ डॉक्टर बनने की राह पर हो, तो यह उस सिस्टम की विफलता है जिसे देश की स्वास्थ्य सुरक्षा का जिम्मा उठाना था। सीटें खाली रह जाना चिंता का विषय हो सकता है, लेकिन उन्हें भरने के लिए योग्यता के पैमाने को इस हद तक गिरा देना, न केवल मेहनती छात्रों के साथ अन्याय है, बल्कि भविष्य के मरीजों की जान के साथ भी खिलवाड़ है।

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