“दूसरों के अमेरिकन ड्रीम की तरह ही मेरा भी एक ‘इंडियन ड्रीम’ था।” इन्हीं शब्दों के साथ 32 वर्षीय फ्रांसीसी लेखक और डॉक्यूमेंट्री फिल्ममेकर वैलेन्टिन हेनॉल्ट (Valentin Hénault) अपनी नई किताब की शुरुआत करते हैं। वह 2023 के अपने उस अनुभव को याद करते हैं, जब वह अपने सपनों के देश की यात्रा पर निकले थे— लेकिन जल्द ही उनका यह सफर एक भयानक सपने में बदल गया।
भारत में 15 जनवरी 2026 को उनकी किताब लॉन्च हुई है, जिसका शीर्षक है- ‘J’avais un rêve indien. Dans l’enfer de la prison de Gorakhpur’। इसका अंग्रेजी अनुवाद “I Had an Indian Dream: In the Hell of Gorakhpur Prison” (मेरा एक भारतीय सपना था: गोरखपुर जेल के नरक में) है।
एक विशेष बातचीत में हेनॉल्ट ने बताया, “यह मेरी निजी कहानी है— वह एक महीना जो मैंने गोरखपुर जेल में बिताया। इसके साथ ही यह वहां मिले अन्य कैदियों की भी कहानी है।”
हेनॉल्ट 2023 में बिहार, झारखंड और विशेष रूप से उत्तर प्रदेश जैसे उत्तरी राज्यों में दलित महिलाओं के जीवन और उनके संघर्षों पर एक डॉक्यूमेंट्री प्रोजेक्ट के सिलसिले में भारत आए थे। वह एक बिजनेस वीजा पर थे और उनका उद्देश्य जाति-आधारित भेदभाव और दलित समुदायों पर होने वाले अत्याचारों से जुड़ी कहानियों पर रिसर्च करना और उन्हें फिल्माना था। लेकिन, गोरखपुर दौरे के दौरान उत्तर प्रदेश पुलिस ने उन्हें कथित तौर पर एक विरोध प्रदर्शन का हिस्सा बनने और अपने वीजा नियमों के उल्लंघन के आरोप में गिरफ्तार कर लिया।
फ्रेंच भाषा में उपलब्ध और लगभग 16 अध्यायों में बंटी यह किताब सलाखों के पीछे के जीवन की कई परतों को उधेड़ती है। यह सर्वाइवल (अस्तित्व बचाए रखने) के लिए कैदियों के संघर्ष और जेल के भीतर की कठोर जातिगत सच्चाई का दस्तावेजीकरण करती है।
हेनॉल्ट बताते हैं, “यह सर्वाइवल की एक कहानी है— कि कैसे बेहद कठिन परिस्थितियों में भी आप खुद को मजबूत बनाए रखने और जिंदा रहने की कोशिश करते हैं।”
2023 में आखिर क्या हुआ था?
अपने कमरे में हाथ में कॉफी का मग लिए बैठे हेनॉल्ट ने उस कड़वे अनुभव और अपनी गिरफ्तारी के ठीक उस पल को याद किया, जिसने उनकी भारत यात्रा को एक खौफनाक परीक्षा में बदल दिया।
बिहार और झारखंड जाने के बाद वह गोरखपुर पहुंचे थे। उनकी गिरफ्तारी का दिन एक सामान्य दिन की तरह ही शुरू हुआ था। उन्होंने 10 अक्टूबर 2023 को गोरखपुर में भूमिहीन दलितों, ओबीसी और मुसलमानों के भूमि अधिकारों पर केंद्रित ‘अंबेडकर जनमोर्चा’ (घेरा डालो, डेरा डालो प्रदर्शन) में हिस्सा लिया था।
वह बताते हैं, “मैं बस वहां मौजूद था। मैं कुछ भी फिल्मा नहीं रहा था। लगभग दस मिनट बाद, पुलिस ने देखा कि भीड़ में एक गोरा आदमी है, और उन्होंने आकर मुझे घेर लिया।”
उसी रात अधिकारी उनके होटल आए, उन्हें गिरफ्तार किया और सीधे पुलिस स्टेशन भेज दिया।
भले ही आधिकारिक तौर पर उन पर बिजनेस वीजा के उल्लंघन का आरोप लगाया गया था, लेकिन हेनॉल्ट का मानना है कि इसका असली मकसद राजनीतिक था।
उन्होंने कहा, “मुझे लगता है कि इस गिरफ्तारी का असली मकसद मीडिया में थोड़ी सुर्खियां बटोरना था कि कैसे गोरखपुर की एक ‘वीर’ पुलिस फोर्स ने एक खतरनाक विदेशी को पकड़ लिया। उनके पास वास्तव में मेरी गिरफ्तारी का कोई कानूनी आधार नहीं था।”
हेनॉल्ट पर ‘विदेशी संलिप्तता’ और विरोध प्रदर्शन को फंड करने जैसे आरोप भी लगाए गए थे। हालांकि, अवैध फंडिंग का कोई पुख्ता सबूत नहीं मिला और बाद में उन्हें रिहा कर दिया गया। अंततः 2024 में उन्हें फ्रांस लौटने की अनुमति मिल गई।
हेनॉल्ट ने स्पष्ट किया, “चार्जशीट में कहा गया था कि मैंने एनजीओ को अवैध रूप से वित्तपोषित करके अपने वीजा की शर्तों का उल्लंघन किया है। जबकि मैं किसी भी चीज़ की फंडिंग नहीं कर रहा था।”
स्थानीय मीडिया से लेकर राष्ट्रीय समाचार एजेंसियों तक उनकी गिरफ्तारी की खूब चर्चा हुई। पीटीआई (PTI) ने सुर्खी दी, “वीजा नियमों के उल्लंघन में गोरखपुर में फ्रांसीसी नागरिक गिरफ्तार।”
कई हिंदी अखबारों ने भी चटपटी सुर्खियां बनाईं जैसे- “यूपी में गजब! बिजनेस वीजा पर आया फ्रेंच नागरिक, भीड़ में छुपकर कर रहा था ये काम; पूर्व आईजी सहित सात गिरफ्तार”, और “झारखंड तक अनुमति, गोरखपुर में घूम रहा था विदेशी नागरिक”। 2024 में जब उन्हें स्वदेश लौटने की अनुमति मिली, तब द वायर (The Wire) ने भी उनके इस एक साल के लंबे संघर्ष के अंत पर एक रिपोर्ट प्रकाशित की थी।
उत्तर प्रदेश के गोरखपुर स्थित कैंट पुलिस स्टेशन में 11 नवंबर 2023 को दर्ज एफआईआर के अनुसार, “वह कथित तौर पर गोरखपुर जिले में उन गतिविधियों में भाग ले रहे थे जिनकी उनके बिजनेस वीजा के तहत अनुमति नहीं थी, जो विदेशी अधिनियम, 1946 (Foreigners Act, 1946) की धारा 14B के तहत एक अपराध है।”
गोरखपुर जेल के अंदर के चौंकाने वाले हालात
गोरखपुर जेल के अंदर जाते ही वहां की कठोर परिस्थितियों ने उन्हें झकझोर कर रख दिया।
अपनी पहली रात को याद करते हुए वह कहते हैं, “वहां बिल्कुल भी जगह नहीं थी। एक ही बैरक में 300 लोग थे। मेरे पास सोने या करवट लेने तक की जगह नहीं थी।” वह अजनबियों से सटकर एक करवट पर सोए थे।
बुनियादी ढांचे की कमी से भी ज्यादा जिस चीज ने उन्हें भावनात्मक रूप से तोड़ा, वह था लोगों को अपनी आंखों के सामने मरते हुए देखना। उन्होंने कहा, “मैंने जेल में लोगों को मरते देखा है। गार्ड दरवाजा नहीं खोलते थे। यह बेहद चौंकाने वाला था।”
इन सबके बीच, एक विदेशी होने के कारण उनके साथ तुलनात्मक रूप से थोड़ा बेहतर व्यवहार किया गया, लेकिन उन्होंने इस असमानता को महसूस किया। उन्होंने इसे अपना “व्हाइट प्रिविलेज” (श्वेत विशेषाधिकार) बताया, जो उनके लिए काफी निराशाजनक था।
जेल के भीतर स्पष्ट जातिगत पदानुक्रम
महज 20 साल की उम्र में फाइनेंस में मास्टर डिग्री हासिल करने वाले हेनॉल्ट ने डॉक्यूमेंट्री फिल्में बनाने के लिए सब कुछ छोड़ दिया था।
जेल संस्मरण लिखने से पहले, उन्होंने कई स्वतंत्र फिल्मों पर काम किया था। उनकी पहली शॉर्ट डॉक्यूमेंट्री L’Homme du sous-sol (2019) पेरिस के एक अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह (Cinéma du Réel) में चुनी गई थी। इसके बाद Michel et la vague jaune (2020), एक ब्लैक-एंड-व्हाइट फिक्शनल शॉर्ट फिल्म La Désertion (2022), और उनकी पहली फीचर डॉक्यूमेंट्री Les Repentis (2023) आई।
गोरखपुर के अनुभव ने हेनॉल्ट को शारीरिक रूप से कमजोर कर दिया, लेकिन मानसिक तनाव उससे भी ज्यादा भयानक था। उन्होंने इसे “मानसिक प्रताड़ना” करार दिया। कैदियों को नहीं पता होता कि वे बिना सुनवाई या कोर्ट में पेशी के कब तक जेल में रहेंगे।
हेनॉल्ट ने गोरखपुर जेल में जो सबसे पहली चीज नोटिस की, वह थी जाति और धर्म के आधार पर भेदभाव। उन्होंने बताया, “एक बैरक ऐसा था जहां वे सभी मुसलमानों को एक ही जगह रखते थे।” भेदभाव पूरी तरह से स्पष्ट था।
उन्होंने बताया कि उच्च जाति के लोगों (ब्राह्मणों) ने बेहतर और मध्य क्षेत्रों पर कब्जा कर रखा था, जबकि शौचालयों के पास के अंधेरे हिस्से में निचली जातियों के दर्जनों लोग रहने को मजबूर थे।
हेनॉल्ट अंग्रेजी जानने वाले कैदियों से बातचीत करते थे। लेकिन भारत में दो महीने से अधिक समय बिताने के कारण उन्होंने थोड़ी हिंदी भी सीख ली थी। वह मुस्कुराते हुए कहते हैं, “थोड़ा-थोड़ा हिंदी आता।”
‘मैं आज भी भारत से प्यार करता हूं’
जेल में हालात को देखने के बाद, हेनॉल्ट ने जगह, भोजन या आराम की तलाश नहीं की, बल्कि उन्हें एक पेन और कागज की जरूरत थी।
“पहले दिन से ही मैंने एक पेन और कागज हासिल करने की कोशिश की, ताकि मैं जो कुछ भी देख रहा हूं, उसे लिख सकूं। इससे मुझे जेल में अपने अस्तित्व का मतलब खोजने में मदद मिली। लिखना मेरे लिए एक तरह का प्रतिरोध (Resistance) था।”
उनकी यह किताब भारत में काफी ध्यान आकर्षित कर रही है। एक तरफ लोग इसके अनुवाद की मांग कर रहे हैं, तो दूसरी तरफ इस बात पर चर्चा हो रही है कि कैसे एक बाहरी व्यक्ति भारतीय व्यवस्था को आईना दिखा रहा है।
लेखक के अनुसार, फ्रांसीसी पाठक इस किताब को पढ़ने के बाद सदमे में थे। भारत की एक सामंजस्यपूर्ण और आध्यात्मिक देश वाली जो छवि उनके दिमाग में थी, वह टूट गई। उन्होंने कहा, “उन्हें नहीं पता था कि भारत एक इतना भ्रष्ट राज्य था और यहां जाति व्यवस्था अभी भी इतनी हावी है।”
फिर भी, हेनॉल्ट के विचार पूरी तरह से निंदात्मक नहीं हैं। वह कहते हैं, “मैं अब भी भारत से प्यार करता हूं।” बस इस अनुभव ने उनके देश को देखने के नजरिए को बदल दिया है।
उन्होंने अपनी बात खत्म करते हुए कहा, “अब मेरे पास भारत को देखने का एक अधिक राजनीतिक और कम एग्जॉटिक दृष्टिकोण है।” उनका रोमांटिसिज़्म अब खत्म हो गया है और उसकी जगह स्पष्टता ने ले ली है। “इसका मतलब है कि मैंने एक भ्रम तोड़ दिया है। अब मैं अधिक स्पष्ट रूप से देख पा रहा हूं कि भारत असल में क्या है।”
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