हाल ही में हुए वैश्विक स्तर के इंडिया एआई इम्पैक्ट एक्सपो (India AI Impact Expo) में गलगोटिया यूनिवर्सिटी (Galgotias University) से जुड़े विवाद ने प्रदर्शकों (exhibitors) को स्टॉल देने की प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। इस एक्सपो का मुख्य उद्देश्य दुनिया के सामने भारत की तकनीकी उपलब्धियों को पेश करना था।
इलेक्ट्रॉनिक्स और आईटी मंत्रालय (MeitY) के तहत काम करने वाली स्वायत्त संस्था, सॉफ्टवेयर टेक्नोलॉजी पार्क्स ऑफ इंडिया (STPI) की देखरेख में प्रदर्शनी के लिए ‘पहले आओ, पहले पाओ’ (first-come, first-served) के आधार पर जगह दी गई थी। हैरानी की बात यह रही कि संस्थानों द्वारा क्या प्रदर्शित किया जाएगा, इसकी कोई औपचारिक जांच (formal vetting) नहीं की गई थी।
आईआईटी संस्थानों से भी बड़ा स्टॉल
एक निजी संस्थान होने के बावजूद, गलगोटिया यूनिवर्सिटी को भारत मंडपम (Bharat Mandapam) के हॉल 6 में 155 वर्ग मीटर का एक बड़ा बूथ आवंटित किया गया था। यह आवंटित जगह उसी हॉल में मौजूद चार आईआईटी (IITs) और एक शोध संस्थान को मिली कुल जगह से 15% से भी अधिक थी। आयोजकों के अनुसार, स्टॉल का आवंटन पूरी तरह से मांग के आधार पर किया गया था।
एक्सपो आयोजकों से प्राप्त फ्लोर प्लान के आंकड़े बताते हैं कि चार आईआईटी और एक रिसर्च इंस्टीट्यूशन को मिलाकर कुल 130 वर्ग मीटर जगह मिली थी। इसका विवरण इस प्रकार है:
- आईआईटी बॉम्बे: 35 वर्ग मीटर
- आईआईटी चेन्नई: 35 वर्ग मीटर
- आईआईटी खड़गपुर: 24 वर्ग मीटर
- आईआईटी गांधीनगर: 18 वर्ग मीटर
- ऐरावत रिसर्च फाउंडेशन (आईआईटी कानपुर): 18 वर्ग मीटर
इन प्रमुख संस्थानों ने प्रदर्शनी में एआई-सक्षम बाढ़ चेतावनी प्रणाली, स्पीच सिंथेसिस और कचरा पृथक्करण (waste segregation) जैसी महत्वपूर्ण तकनीकें पेश की थीं।
भुगतान और अधिकारियों का पक्ष
इस प्रदर्शनी में जगह के हिसाब से शुल्क लिया गया था। शैक्षणिक संस्थानों के लिए 9,000 रुपये प्रति वर्ग मीटर की दर तय की गई थी। इसके अनुसार, अकेले गलगोटिया यूनिवर्सिटी ने सरकार को लगभग 14 लाख रुपये (टैक्स और बिजली कनेक्शन शुल्क को छोड़कर) का भुगतान किया था।
प्रदर्शकों के चयन से जुड़े एक अधिकारी ने बताया, “हमारा मानना था कि प्रदर्शक खुद जिम्मेदारी से काम लेंगे और ऐसी किसी चीज़ का प्रदर्शन नहीं करेंगे जिस पर उनका अपना मालिकाना हक न हो। इस एक्सपो को अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुसार तैयार किया गया था और हम यह तय नहीं करना चाहते थे कि प्रदर्शक क्या दिखाएं और क्या नहीं।”
कैसे शुरू हुआ विवाद?
यह पूरा विवाद बुधवार को तब शुरू हुआ जब गलगोटिया के बूथ पर एक प्रोफेसर ने चीन की कंपनी ‘यूनिट्री रोबोटिक्स’ (Unitree Robotics) द्वारा बनाए गए बाजार में उपलब्ध ‘यूनिट्री गो2’ (Unitree Go2) रोबोट को विश्वविद्यालय द्वारा विकसित उत्पाद के रूप में पेश कर दिया। इस झूठे दावे के बाद हुए कड़े विरोध के कारण अधिकारियों ने संस्थान को अपना स्टॉल खाली करने (evict) का निर्देश दिया, और अंततः विश्वविद्यालय को सार्वजनिक रूप से माफी मांगनी पड़ी।
इस पूरे आयोजन को स्थापित करने और जगह किराए पर देने की जिम्मेदारी एसटीपीआई की थी। इस मामले पर इलेक्ट्रॉनिक्स और आईटी मंत्रालय (MeitY) तथा गलगोटिया यूनिवर्सिटी से जवाब मांगे गए थे, लेकिन खबर प्रकाशित होने तक उनकी तरफ से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई थी।
मंत्रालय की सख्त प्रतिक्रिया
इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के सचिव, एस कृष्णन ने स्पष्ट किया कि सरकार चाहती थी कि इस शिखर सम्मेलन में केवल वास्तविक और मूल (original) काम ही दिखाया जाए। उन्होंने कहा, “हम चाहते हैं कि असल काम का ही प्रदर्शन हो। हम ऐसी कोई विवादास्पद एजेंसी नहीं चाहते जिसने जनता को गुमराह किया हो।”
कृष्णन ने आगे जोड़ा, “यह प्रदर्शनी तकनीकी प्रदर्शन के लिए है।” उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि हालांकि ऐसी प्रदर्शनियों में कोई औपचारिक प्रमाणन (certification) प्रक्रिया शामिल नहीं होती है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि इसका इस्तेमाल भ्रामक दावों को बढ़ावा देने के लिए किया जाए।
वहीं, इंडियाएआई मिशन (IndiaAI Mission) के मुख्य कार्यकारी अधिकारी, अभिषेक सिंह ने कहा कि इस तरह तथ्यों को गलत तरीके से पेश करना उन शर्तों का सीधा उल्लंघन है, जिन पर प्रदर्शकों ने एक्सपो में भाग लेते समय सहमति व्यक्त की थी।
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