विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (FDI) को हमेशा से अर्थव्यवस्था के लिए सबसे भरोसेमंद पूंजी माना जाता रहा है। यह वह पैसा है जिससे फैक्ट्रियां बनती हैं, नई तकनीक आती है और जो लंबे समय तक देश में टिकता है। इसके उलट, विदेशी पोर्टफोलियो निवेश (FPI) को बाजार का रुख बदलते ही तुरंत निकल जाने वाला साधन माना जाता था।
लेकिन अब यह पूरी तस्वीर बदल चुकी है। भारत का शुद्ध (नेट) एफडीआई अब सिमट कर बेहद कम रह गया है। इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि मजबूत आवक के बावजूद, विदेशी निवेशक तेजी से अपना पैसा वापस निकाल रहे हैं। आखिर अचानक ऐसा क्या बदल गया?
आंकड़ों पर नजर डालें तो सच्चाई बिल्कुल साफ हो जाती है। वित्तीय वर्ष 2025-26 के पहले नौ महीनों में देश के भीतर केवल 3 अरब डॉलर का शुद्ध एफडीआई आया। वहीं, इससे पिछले साल 2024-25 में यह आंकड़ा महज 1 अरब डॉलर था। उस दौरान भारत में 81 अरब डॉलर का विदेशी निवेश आया जरूर था, लेकिन उसी अवधि में 80 अरब डॉलर देश से बाहर भी चले गए थे।
इस भारी निकासी के पीछे साल 2021 के बाद शेयर बाजार में आया जबरदस्त उछाल एक बड़ा कारण है। इस तेजी का फायदा उठाते हुए कई विदेशी कंपनियों ने खुद को भारतीय बाजारों में लिस्ट कराया।
लिस्टिंग के बाद जुटाई गई भारी भरकम रकम को कंपनियों ने मुनाफे की वापसी (रिपेट्रिएशन) और विनिवेश के तौर पर अपने मूल देश में भेज दिया। जब भारतीय कंपनियां विदेशों में निवेश करती हैं, तब भी इसी तरह पूंजी बाहर जाती है।
हालांकि, राहत की बात यह है कि साल 2023-24 के बाद से भारत में आने वाले कुल (ग्रॉस) एफडीआई में कोई कमी नहीं आई है, बल्कि इसमें बढ़ोतरी ही देखी गई है। देश से पैसा बाहर जाने की सबसे बड़ी वजह भारतीय कंपनियों का विदेशों में निवेश करना नहीं है।
इसका मुख्य कारण विदेशी निवेशकों द्वारा मुनाफा कमाकर, अपनी हिस्सेदारी बेचकर या बाजार से बाहर निकलकर अपनी पूंजी वापस ले जाना है। सिर्फ अप्रैल से दिसंबर 2025 के बीच ही निवेशकों ने 44.6 अरब डॉलर की भारी रकम भारतीय बाजार से वापस निकाली है।
अगर निवेश के क्षेत्रों की बात करें, तो विदेशी निवेशक मुख्य रूप से भारत के सेवा क्षेत्र, सॉफ्टवेयर, मैन्युफैक्चरिंग और ट्रेडिंग में अपना पैसा लगा रहे हैं। दूसरी तरफ, विदेशों में निवेश करने वाली भारतीय कंपनियां फाइनेंस, बिजनेस सर्विसेज, मैन्युफैक्चरिंग और व्यापार के क्षेत्र को चुन रही हैं।
यह साफ दिखाता है कि देश में आने वाला और बाहर जाने वाला, दोनों ही तरह का निवेश अलग-अलग संभावनाओं की तलाश में है।
आज भी एफडीआई का एक बहुत बड़ा हिस्सा सिंगापुर और मॉरीशस के रास्ते ही भारत आ रहा है। ये दोनों केवल निवेश के स्रोत वाले देश नहीं हैं, बल्कि टैक्स, संधियों और कॉर्पोरेट ढांचे की वजह से दुनिया भर की कंपनियों के लिए प्रमुख ग्लोबल रूटिंग हब बन चुके हैं।
एफडीआई को लेकर एक और अहम बात यह है कि यह निवेश पूरे देश में समान रूप से नहीं फैला है। भारत में आने वाले कुल विदेशी निवेश का 80 प्रतिशत से ज्यादा हिस्सा केवल पांच राज्यों में ही सिमटा हुआ है।
इनमें महाराष्ट्र, कर्नाटक, गुजरात, तमिलनाडु और हरियाणा शामिल हैं। विदेशी निवेशकों द्वारा इन राज्यों को प्राथमिकता देने की मुख्य वजह यहां का बेहतर बुनियादी ढांचा, मजबूत कारोबारी माहौल और निवेशकों का इन जगहों से अच्छी तरह परिचित होना है।









