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एक्सपोर्ट सर्टिफिकेट के नाम पर रिश्वत का बड़ा रैकेट बेनकाब, लोन की EMI चुकाने के लिए खाते में आती थी घूस

| Updated: July 14, 2026 15:42

वडोदरा की एक्सपोर्ट इंस्पेक्शन एजेंसी (EIA) में बड़े भ्रष्टाचार का भंडाफोड़। व्हाट्सएप से तय होती थी रिश्वत की रकम, परिवार के खातों के जरिए सीधे EMI चुकाने के लिए मंगाया जाता था पैसा।

अहमदाबाद: निर्यात (एक्सपोर्ट) संबंधी क्लीयरेंस और जरूरी सर्टिफिकेट के नाम पर चल रहे एक बड़े रिश्वत कांड का पर्दाफाश हुआ है। केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) ने वडोदरा स्थित एक्सपोर्ट इंस्पेक्शन एजेंसी (EIA) के एक वरिष्ठ अधिकारी को इस मामले में अपने रडार पर लिया है।

जांच एजेंसी का आरोप है कि ईआईए के एक डिप्टी डायरेक्टर, कुछ कंसल्टेंट्स और निजी व्यक्तियों ने मिलकर ‘सर्टिफिकेट ऑफ ओरिजिन’ जारी करने के लिए एक पूरा अवैध नेटवर्क तैयार कर रखा था। एफआईआर के मुताबिक, यह रिश्वत बैंक खातों के जरिए घुमा-फिराकर पहुंचाई जाती थी। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि घूस की रकम अधिकारी के बैंक खाते में ठीक उसी दिन ट्रांसफर होती थी, जिस दिन उनके लोन की किश्त (EMI) कटनी होती थी।

सीबीआई ने इस पूरे भ्रष्टाचार के मामले में जून के पहले सप्ताह में एफआईआर दर्ज की है। इसमें ईआईए के वडोदरा उप-कार्यालय के डिप्टी डायरेक्टर (टेक्निकल) प्रकाश बडीगेर, रुद्रा एक्जिम वर्ल्ड के प्रोपराइटर मितुल नरेश जानी और कंसलटेंट मेहुल शाह को मुख्य तौर पर नामजद किया गया है। इनके अलावा कई अन्य कंसल्टेंट्स, निजी व्यक्तियों और ईआईए के अज्ञात अधिकारियों को भी आरोपी बनाया गया है।

खुफिया जानकारी के आधार पर सीबीआई को पता चला था कि प्रकाश बडीगेर एक्सपोर्ट कंसल्टेंट्स से क्लीयरेंस और सर्टिफिकेट ऑफ ओरिजिन जारी करने के एवज में मोटी रकम की मांग कर रहे थे। ये सर्टिफिकेट अंतरराष्ट्रीय व्यापार में बेहद महत्वपूर्ण होते हैं, क्योंकि इनकी मदद से निर्यातकों को विदेशी व्यापार समझौतों के तहत टैरिफ में भारी छूट का लाभ मिलता है।

जांच में यह बात भी सामने आई है कि अधिकारी ने कंसल्टेंट्स से बातचीत के लिए एक खास व्हाट्सएप नंबर दे रखा था। इसी नंबर पर इम्पोर्ट एक्सपोर्ट कोड (IEC) और सर्टिफिकेट की पूरी डिटेल मंगवाई जाती थी। इस जानकारी के आधार पर ही बडीगेर यह सटीक हिसाब लगाते थे कि किस सर्टिफिकेट को पास करने के लिए कितनी रिश्वत वसूलनी है।

रिश्वत का यह पैसा कभी भी सीधे अधिकारी के पास नहीं जाता था। आरोप है कि यह रकम पहले मितुल जानी द्वारा संचालित बैंक खातों में जमा की जाती थी। इसके बाद इसे बडीगेर और उनके परिवार के सदस्यों के खातों में ट्रांसफर किया जाता था। सीबीआई को एसबीआई (SBI) खाते के ऐसे कई पुख्ता रिकॉर्ड मिले हैं, जहां बैंक में पैसा आने की तारीख और बडीगेर की लोन किश्त की तारीख बिल्कुल एक समान पाई गई।

घूसखोरी के आंकड़ों की बात करें तो अगस्त 2024 से फरवरी 2025 के बीच बडीगेर को जानी के जरिए 4.07 लाख रुपये मिले। वहीं, उनकी पत्नी और बच्चों के खातों में भी 2 लाख रुपये से अधिक की रकम भेजी गई। इसके अलावा, अगस्त 2024 से अप्रैल 2025 के बीच इसी नेटवर्क के जरिए बडीगेर को 5.38 लाख रुपये की अतिरिक्त घूस मिलने का भी आरोप है।

एफआईआर में उन कई अन्य कंसल्टेंट्स और निर्यातकों के नाम भी स्पष्ट रूप से शामिल हैं, जिन्होंने कथित तौर पर जानी के खाते में पैसे भेजे थे। इनमें मितेश त्रिवेदी, सोहाग ठाकर, शुभम तंवर, प्रीतम सावंत, योगेश पारकर, रजनी मल्हार, महेंद्र दुर्गावले और शैलेंद्र करंजे के नाम प्रमुख हैं।

एजेंसी के अनुसार, इस पूरे खेल में मेहुल शाह का काम नकद भुगतान को संभालना और एक्सपोर्ट सर्टिफिकेट की एवज में ईआईए अधिकारियों के साथ तालमेल बिठाना था। मामला दर्ज करने से पहले सीबीआई ने भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम (Prevention of Corruption Act) के तहत सक्षम प्राधिकारी से विधिवत मंजूरी प्राप्त कर ली थी। इस मामले में आपराधिक साजिश और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की कई गंभीर धाराओं के तहत केस दर्ज किया गया है।

सीबीआई के सूत्रों के मुताबिक, जांचकर्ता अब इस बात की भी गहनता से जांच कर रहे हैं कि क्या अधिकारियों ने बिना उचित वेरिफिकेशन के ही ये सर्टिफिकेट जारी कर दिए थे। अगर यह सच साबित होता है, तो इसका सीधा मतलब है कि निर्यातकों ने बिना जरूरी जांच-पड़ताल के ही अपना माल विदेशों में भेज दिया, जिसमें ऐसे कंसाइनमेंट भी शामिल हो सकते हैं जिन्हें भेजने की सख्त मनाही थी।

अब एजेंसी इस मामले की तह तक जाने के लिए बैंक लेनदेन, व्हाट्सएप चैट्स, डिजिटल रिकॉर्ड्स और इस पूरे घूसखोरी रैकेट में शामिल ईआईए अधिकारियों, निर्यातकों व बिचौलियों की भूमिका की बारीकी से जांच करेगी।

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