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ऊना कांड के 10 साल: मृत गाय के कारण कोड़े खाने वाले पीड़ितों की रोजी-रोटी अब शेरों ने छीनी

| Updated: July 11, 2026 14:02

2016 में मृत गाय की खाल उतारने पर बर्बरता का शिकार हुए ऊना कांड के पीड़ितों की मुश्किलें 10 साल बाद भी कम नहीं हुई हैं। अब शेरों ने उनकी रोजी-रोटी छीन ली है और सरकार के बड़े-बड़े वादे सिर्फ कागजों तक सिमट कर रह गए हैं।

अहमदाबाद: गुजरात के बहुचर्चित ऊना कांड को आज ठीक एक दशक पूरा हो गया है। लेकिन, इस अमानवीय घटना के पीड़ितों की जिंदगी आज भी अनिश्चितताओं के भंवर में फंसी हुई है। साल 2016 में शेर के शिकार बनी एक मृत गाय की खाल उतारने पर पांच दलित युवकों को बेरहमी से पीटा गया था।

उस खौफनाक घटना के बाद पीड़ितों ने अपना पुश्तैनी काम छोड़ दिया था। राजनेताओं से मिली आर्थिक मदद से उन्होंने चार गाएं खरीदीं और खेती-किसानी के जरिए अपने परिवार का पेट पालने लगे। लेकिन विडंबना देखिए, पिछले महीने शेरों के हमले में उनकी दो गायों की मौत हो गई, जिसने इस परिवार को एक बार फिर गहरे आर्थिक संकट में धकेल दिया है।

पीड़ित वशराम सरवैया ने अपनी पीड़ा बयां करते हुए कहा कि कोड़े खाने की उस घटना के बाद से उन्होंने मरे हुए जानवरों की खाल उतारने का काम पूरी तरह से बंद कर दिया है। अब वे लोग खेती और पशुपालन के सहारे अपना गुजर-बसर कर रहे थे।

वशराम ने बताया कि उनका 18 सदस्यों का बड़ा परिवार है और दो गायों के छिन जाने से उनकी आमदनी सीधे आधी रह गई है। उनके गांव में शेरों का आना-जाना एक आम बात है। उस मनहूस दिन भी एक शेर सीधे उनके घर के बाहर बने तबेले में घुस गया और दो गायों को अपना शिकार बना लिया। परिवार ने तुरंत इसकी सूचना गांव के मुखिया को दी, जिन्होंने नियम के अनुसार घटना का ब्योरा दर्ज कर लिया है।

गौरतलब है कि 11 जुलाई 2016 को गिर सोमनाथ जिले के मोटा समढियाला गांव के पास कथित गौरक्षकों के एक समूह ने पांच दलित युवकों को एक गाड़ी से बांधकर सरेआम कोड़े मारे थे। इस घटना के वीडियो सामने आने के बाद पूरे देश में बवाल मच गया था। इस बर्बरता ने पूरे गुजरात में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शनों को जन्म दिया और जातिगत हिंसा को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर एक तीखी बहस छेड़ दी थी।

पीड़ितों का कहना है कि उस हमले ने उन्हें वह पेशा छोड़ने पर मजबूर कर दिया, जिस पर उनका परिवार पीढ़ियों से निर्भर था। बाद में कांग्रेस नेता राहुल गांधी और बसपा प्रमुख मायावती से मिली आर्थिक मदद के जरिए उन्होंने चार गाएं खरीदीं और डेयरी का काम शुरू कर अपनी जिंदगी को नए सिरे से संवारने की कोशिश की।

लेकिन 10 साल बीत जाने के बाद भी उस दर्दनाक हमले के जख्म उनकी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बने हुए हैं। वशराम ने बताया कि उस जानलेवा हमले का उनके भाइयों के मानसिक स्वास्थ्य पर बहुत बुरा असर पड़ा। वह खुद मानसिक आघात से जूझ रहे हैं, उनका मनोरोग का इलाज चल रहा है और वे बिना सहारे के अपना जीवन नहीं जी सकते। परिवार के अन्य भाई भी उन शारीरिक और मानसिक घावों को सह रहे हैं, जिन्हें भरने में बहुत लंबा वक्त लग रहा है।

इस घटना के एक अन्य पीड़ित बालू सरवैया का कहना है कि वे आज भी ‘पूर्ण न्याय’ की आस लगाए बैठे हैं। उनका दर्द छलक उठा जब उन्होंने कहा कि सरकार ने पुनर्वास का जो वादा किया था, वह कभी पूरा नहीं हुआ और न ही उन्हें जिंदगी दोबारा खड़ी करने के लिए कोई ठोस मदद मिली। एक दशक बाद भी वे एक सामान्य जीवन जीने के लिए कड़ा संघर्ष कर रहे हैं।

सरकारी वादों की हकीकत बताते हुए वशराम ने याद दिलाया कि तत्कालीन मुख्यमंत्री आनंदीबेन पटेल ने गांव के दौरे पर उन्हें पांच एकड़ कृषि भूमि, आवासीय प्लॉट और सरकारी नौकरी देने की घोषणा की थी। हालांकि, 2018 में गुजरात सरकार ने विधानसभा में यह कहकर सबको चौंका दिया कि उन घोषणाओं का कोई लिखित रिकॉर्ड ही मौजूद नहीं है, जिससे उन वादों पर अमल करने का कोई आधिकारिक रास्ता ही नहीं बचा।

सरकारी उपेक्षा का आलम यहीं खत्म नहीं हुआ। पीड़ितों ने यह भी आरोप लगाया कि घटना के बाद एक राजनेता द्वारा उन्हें जो मदद का चेक सौंपा गया था, वह भी बैंक में बाउंस हो गया। आज एक दशक बाद, ये परिवार आर्थिक तंगी और कुदरत की मार के बीच सिर्फ कागजों तक सीमित रह गए न्याय की हकीकत बयां कर रहा है।

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