बाल संरक्षण कानूनों की सर्वोच्चता को बरकरार रखते हुए इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक बेहद अहम फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि विवाह की कानूनी उम्र देश के सभी नागरिकों पर समान रूप से लागू होती है, चाहे उनका धर्म कोई भी हो। कोर्ट के मुताबिक, मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरिया) के तहत यौवन (प्यूबर्टी) को शादी की उम्र मानने का नियम बाल विवाह निषेध अधिनियम (पीसीएमए) और पॉक्सो एक्ट जैसे केंद्रीय कानूनों की जगह नहीं ले सकता।
यह महत्वपूर्ण टिप्पणी जस्टिस जेजे मुनीर और जस्टिस अचल सचदेव की खंडपीठ ने एक जुलाई को की। अदालत दरअसल 19 लोगों द्वारा दायर की गई एक याचिका को खारिज कर रही थी। इन लोगों ने बुलंदशहर में अपने खिलाफ दर्ज एफआईआर को रद्द करने की मांग की थी। इन पर आरोप था कि इन्होंने एक 16 वर्षीय मुस्लिम लड़की की शादी रुकवाने पहुंची पुलिस और चाइल्ड लाइन की टीम पर हमला किया और उनके काम में बाधा डाली।
याचिकाकर्ताओं ने अदालत में दलील दी थी कि मुसलमानों पर लागू होने वाले शरिया कानून के तहत एक लड़की यौवन प्राप्त करने के बाद शादी के योग्य हो जाती है। इसे आमतौर पर 15 वर्ष की आयु माना जाता है। उनका तर्क था कि बाल विवाह निषेध अधिनियम, 2006 का प्रभाव मुस्लिम विवाह को नियंत्रित करने वाले पर्सनल लॉ पर नहीं पड़ना चाहिए।
अदालत ने इस तर्क को सिरे से खारिज कर दिया। खंडपीठ ने कहा कि यौवन को विवाह की उम्र मानने वाला मुस्लिम पर्सनल लॉ स्पष्ट रूप से पीसीएमए और पॉक्सो अधिनियम के प्रावधानों के विपरीत है। कोर्ट ने टिप्पणी की कि ये दोनों कानून सार्वजनिक स्वास्थ्य और राष्ट्रीय नीति पर आधारित हैं। इनके पीछे एक वैज्ञानिक समझ है जिसे विधायी रूप से निषेधात्मक कानूनों में बदला गया है, और कोई भी व्यक्ति इससे बच नहीं सकता।
बेंच ने आगे समझाया कि 18 साल से कम उम्र में शादी की अनुमति देने से पॉक्सो एक्ट के साथ सीधा टकराव पैदा होगा। चूंकि वैवाहिक संबंध शादी की संस्था से आंतरिक रूप से जुड़े हुए हैं, इसलिए यदि इस उम्र से पहले विवाह की इजाजत दी जाती है, तो यह स्पष्ट तौर पर पॉक्सो अधिनियम का उल्लंघन माना जाएगा।
इस मुद्दे पर विभिन्न उच्च न्यायालयों की अलग-अलग रायों का संज्ञान लेते हुए इलाहाबाद हाई कोर्ट ने अपना रुख साफ किया। खंडपीठ ने कहा कि वह केरल हाई कोर्ट के उस तर्क से पूरी तरह सहमत है जिसमें कहा गया था कि कोई भी पर्सनल लॉ बाल विवाह के खिलाफ बने वैधानिक प्रतिबंधों को खत्म नहीं कर सकता।
मामले के तथ्यों पर गौर करते हुए कोर्ट ने पाया कि नाबालिग लड़की के माता-पिता और समुदाय के लोगों ने कानून का उल्लंघन करके उसकी शादी कराने की एक दृढ़ कोशिश की थी। अदालत ने पॉक्सो एक्ट के तहत संभावित अपराध को रोकने के लिए समय पर हस्तक्षेप करने वाली पुलिस और चाइल्ड लाइन टीम की जमकर सराहना की।
न्यायालय ने इस बात पर जोर दिया कि रेस्क्यू टीम पूरी ईमानदारी के साथ अपनी ड्यूटी निभा रही थी, जब उन्हें आरोपियों के भारी विरोध का सामना करना पड़ा। एफआईआर में दर्ज आरोपों का हवाला देते हुए बेंच ने कहा कि सरकारी अधिकारियों को गालियां दी गईं, धमकाया गया और उन्हें याचिकाकर्ताओं की आक्रामकता से खुद को बचाने के लिए मजबूर होना पड़ा।
अदालत ने सख्त लहजे में कहा कि पीड़िता को जबरन अधिकारियों की देखभाल और हिरासत से छीन लिया गया था, जिसके बाद अंततः उसे दोबारा बचाया जा सका। यह प्रथम दृष्टया एक सरकारी कर्मचारी के काम में बाधा डालने का साफ मामला बनता है। इस पूरे मामले में सामने आए अन्य अपराधों की भी गहन जांच की आवश्यकता है।
इस चरण में आपराधिक कार्यवाही में दखल देने से साफ इनकार करते हुए हाई कोर्ट ने याचिका को खारिज कर दिया और पुलिस को मामले की जांच जारी रखने की अनुमति दे दी।
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