comScore खारे पानी और सीवेज से पैदा हो रही बिजली का चमत्कार: जापान ने शुरू किया दुनिया का अनोखा 'ऑस्मोटिक पावर प्लांट' - Vibes Of India

Gujarat News, Gujarati News, Latest Gujarati News, Gujarat Breaking News, Gujarat Samachar.

Latest Gujarati News, Breaking News in Gujarati, Gujarat Samachar, ગુજરાતી સમાચાર, Gujarati News Live, Gujarati News Channel, Gujarati News Today, National Gujarati News, International Gujarati News, Sports Gujarati News, Exclusive Gujarati News, Coronavirus Gujarati News, Entertainment Gujarati News, Business Gujarati News, Technology Gujarati News, Automobile Gujarati News, Elections 2022 Gujarati News, Viral Social News in Gujarati, Indian Politics News in Gujarati, Gujarati News Headlines, World News In Gujarati, Cricket News In Gujarati

Vibes Of India
Vibes Of India

खारे पानी और सीवेज से पैदा हो रही बिजली का चमत्कार: जापान ने शुरू किया दुनिया का अनोखा ‘ऑस्मोटिक पावर प्लांट’

| Updated: July 9, 2026 14:01

जापान ने फुकुओका में दुनिया का अनोखा 'ऑस्मोटिक पावर प्लांट' शुरू किया है, जो समुद्र के बेहद खारे पानी और सीवेज के साफ पानी को मिलाकर 24 घंटे 'ब्लू एनर्जी' (Blue Energy) पैदा कर रहा है। जानिए बिना प्रदूषण के बिजली बनाने वाली यह तकनीक कैसे काम करती है।

जापान ने एक ऐसा कारनामा कर दिखाया है जो विज्ञान की दुनिया में किसी चमत्कार से कम नहीं है। फुकुओका शहर में देश का पहला ऑस्मोटिक पावर प्लांट चालू कर दिया गया है। यह प्लांट समंदर के बेहद खारे पानी और सीवेज के साफ किए गए पानी को मिलाकर बिजली पैदा कर रहा है। आइए इस पूरी प्रक्रिया को आसान भाषा में समझते हैं जिसे दुनिया ‘ब्लू एनर्जी’ के नाम से जानती है।

हर सेकंड जब भी कोई नदी समुद्र से मिलती है, तो पानी के भीतर मौजूद एक विशाल ऊर्जा चुपचाप बह जाती है। ताजे पानी और खारे पानी के मिलने से पैदा होने वाली यह ऊर्जा अक्सर हमारी नजरों से छिप जाती है। लेकिन जापान ने अब इस खोती हुई ऊर्जा को पकड़ने और उसे इस्तेमाल करने का एक शानदार तरीका खोज निकाला है।

इस ऐतिहासिक पहल की शुरुआत 5 अगस्त 2025 को हुई। फुकुओका शहर के तटीय इलाके में स्थित उमिनोनाकामिची नाटा सीवॉटर डिसेलिनेशन सेंटर में इस ऑस्मोटिक पावर प्लांट को चालू किया गया। इस खास प्लांट को आमतौर पर ‘मामिजुपिया’ के नाम से जाना जाता है।

डेनमार्क में लगे एक छोटे से संयंत्र के बाद, यह दुनिया का केवल दूसरा ऐसा प्लांट है। सबसे दिलचस्प बात यह है कि यह पूरी तरह से उन दो चीजों पर चलता है जिन्हें ज्यादातर शहर बेकार समझकर फेंक देते हैं। इसमें जरूरत से ज्यादा खारा पानी और सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट से निकला साफ पानी शामिल है।

यह पूरा सिस्टम ऑस्मोसिस (परासरण) की वैज्ञानिक प्रक्रिया पर काम करता है। यह बिल्कुल वही प्राकृतिक प्रक्रिया है जिसकी मदद से पौधों की जड़ें मिट्टी से पानी खींचती हैं और हमारे शरीर की कोशिकाएं हाइड्रेटेड रहती हैं।

जब ताजे और खारे पानी के बीच एक पतली झिल्ली (सेमी-परमिएबल मेम्ब्रेन) लगा दी जाती है, तो पानी स्वाभाविक रूप से खारे हिस्से की तरफ बहने लगता है। यह झिल्ली केवल पानी को आर-पार जाने देती है और नमक को रोक लेती है, जिससे प्रकृति दोनों तरफ संतुलन बनाने की कोशिश करती है।

पानी के इस प्राकृतिक बहाव में गजब की ऊर्जा छिपी होती है। जब ताजा पानी और खारा पानी आपस में मिलते हैं, तो वे ‘फ्री एनर्जी’ छोड़ते हैं। यह उसी थर्मोडायनामिक सिद्धांत पर आधारित है जिससे हमारी आम बैटरियां काम करती हैं। चूंकि यह ऊर्जा पानी के खारेपन के अंतर से पैदा होती है, इसलिए इसे ‘सेलिनीटी ग्रेडिएंट एनर्जी’ या आसान शब्दों में ‘ब्लू एनर्जी’ कहा जाता है।

फुकुओका का मामिजुपिया प्लांट ‘प्रेशर-रिटार्डेड ऑस्मोसिस’ (पीआरओ) नामक एक खास तकनीक का इस्तेमाल करता है। इसमें पानी झिल्ली को पार करके खारे हिस्से में जाता है, जहां जानबूझकर भारी दबाव बनाए रखा जाता है। अंदर आने वाला यह ताजा पानी इस दबाव वाले प्रवाह की मात्रा को तेजी से बढ़ा देता है।

इसके बाद, इस तेज और दबाव वाले पानी को एक टरबाइन के जरिए धकेला जाता है। इससे जनरेटर घूमने लगता है और ठीक एक छोटे हाइड्रोइलेक्ट्रिक डैम की तरह बिजली पैदा होने लगती है। सबसे खास बात यह है कि ऊर्जा पैदा करने की इस पूरी प्रक्रिया में न तो कोई ईंधन जलाया जाता है और न ही हानिकारक कार्बन डाइऑक्साइड गैस का उत्सर्जन होता है।

फुकुओका की इस सफलता के पीछे एक बेहद चतुर सोच छिपी है। आम समुद्री पानी में करीब 3.5 प्रतिशत नमक होता है। चूंकि मामिजुपिया एक डिसेलिनेशन सेंटर है, जो 25 लाख लोगों के लिए समुद्र के खारे पानी को पीने लायक बनाता है, इसलिए इस प्रक्रिया में पीछे छूट जाने वाले पानी (ब्राइन) में नमक की मात्रा लगभग 8 प्रतिशत हो जाती है। यह सामान्य समुद्र के पानी से दोगुने से भी ज्यादा खारा होता है।

ताजे पानी के विकल्प के रूप में यह प्लांट पास के ही एक सीवेज सुविधा केंद्र से ट्रीट किए गए पानी का उपयोग करता है। विज्ञान का सीधा सा नियम है कि दोनों तरह के पानी के बीच नमक का अंतर जितना अधिक होगा, पानी का दबाव उतना ही तेज होगा और उसी अनुपात में ज्यादा बिजली का उत्पादन भी होगा।

सवाल उठता है कि क्या ऑस्मोटिक पावर भविष्य में सौर और पवन ऊर्जा की पूरी तरह जगह ले सकती है? फिलहाल इसका जवाब ‘नहीं’ है। अभी यह प्लांट एक साल में लगभग 8,80,000 किलोवाट-घंटे बिजली पैदा कर रहा है, जो करीब 300 जापानी घरों की जरूरतें पूरी करने के लिए काफी है।

लेकिन सौर और पवन ऊर्जा के विपरीत, यह मौसम या सूरज की रोशनी पर निर्भर नहीं है। यह प्लांट 90 प्रतिशत उपयोग दर के साथ दिन-रात, किसी भी मौसम में बिना रुके काम करता है।

हालांकि इस नई तकनीक के सामने कुछ व्यावहारिक चुनौतियां भी मौजूद हैं। झिल्ली की सतह पर अशुद्धियों का जमा होना (मेम्ब्रेन फाउलिंग), भारी शुरुआती लागत और पानी को पंप करने में होने वाला नुकसान इसके मुख्य रोड़े हैं।

इसके बावजूद, ऊर्जा शोधकर्ताओं का अनुमान है कि दुनिया भर की नदियों के मुहानों पर ऊर्जा का एक विशाल और अछूता भंडार मौजूद है। फुकुओका के इस पावर प्लांट ने पूरी दुनिया को यह साबित कर दिया है कि प्रयोगशाला से बाहर भी यह शानदार विचार पूरी तरह से काम कर सकता है।

यह भी पढ़ें-

राम मंदिर चंदा चोरी: ‘ड्राइवर को सौंपी तिजोरी की चाबी, तुरंत हो गिरफ्तारी’, कांग्रेस का पीएम मोदी पर सीधा हमला

एक से सगाई, दूसरे से गुपचुप शादी: केतन अग्रवाल मर्डर केस में सिया गोयल की ‘डबल लाइफ’ ने उड़ाए पुलिस के होश

Your email address will not be published. Required fields are marked *