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‘गद्दी सिर्फ बड़े बेटे की, लेकिन संपत्ति पर सबका हक’, सुप्रीम कोर्ट ने 49 साल पुराने कपूरथला रियासत विवाद पर सुनाया फैसला

| Updated: May 29, 2026 14:00

49 साल पुराने कपूरथला रियासत विवाद का अंत; शीर्ष अदालत ने साफ किया कि राजा की 'गद्दी' बड़े बेटे की हो सकती है, लेकिन निजी संपत्ति का बंटवारा उत्तराधिकार कानून के तहत सभी वारिसों में होगा।

सुप्रीम कोर्ट ने राजघरानों की संपत्ति के बंटवारे को लेकर एक बेहद अहम फैसला सुनाया है। शीर्ष अदालत ने साफ किया है कि किसी भी पूर्व महाराजा की ‘गद्दी’ पर उत्तराधिकार का अधिकार (जेष्ठाधिकार का नियम) केवल शाही सिंहासन तक ही सीमित है।

इसका सीधा अर्थ यह है कि गद्दी का वारिस भले ही परिवार का सबसे बड़ा पुरुष वंशज हो, लेकिन शाही संपत्तियों का बंटवारा हिंदू या मुस्लिम उत्तराधिकार कानून के तहत सभी कानूनी वारिसों के बीच समान रूप से किया जाना चाहिए।

जस्टिस पंकज मिथल और जस्टिस एसवीएन भट्टी की पीठ ने यह महत्वपूर्ण ऐतिहासिक टिप्पणी की है। इस फैसले के साथ ही सर्वोच्च न्यायालय ने पंजाब के कपूरथला के महाराजा परमजीत सिंह के वंशजों के बीच पिछले 49 सालों से चली आ रही कानूनी लड़ाई का हमेशा के लिए अंत कर दिया है।

अदालत ने अपने आदेश में स्पष्ट रूप से सबसे बड़े बेटे को निर्देश दिया है कि वह हिंदू उत्तराधिकार कानून के प्रावधानों के अनुसार अन्य कानूनी वारिसों के साथ संपत्ति साझा करे।

सुप्रीम कोर्ट ने अपने इस आदेश के जरिए उच्च न्यायालय (हाई कोर्ट) के उस पुराने फैसले को सिरे से खारिज कर दिया है, जिसमें कहा गया था कि संपत्तियों के उत्तराधिकार में भी बड़े बेटे का ही एकाधिकार होगा। पीठ ने स्पष्ट किया कि राजा की गद्दी का उत्तराधिकार जेष्ठाधिकार के अनुसार हो सकता है, लेकिन किसी भी शासक की अपनी निजी और व्यक्तिगत संपत्तियों के मामले में यह नियम बिल्कुल भी लागू नहीं होता।

अदालत ने सुनवाई के दौरान भारत सरकार के साथ महाराजा द्वारा किए गए विलय समझौते (मर्जर एग्रीमेंट) का भी विस्तार से जिक्र किया। जजों ने कहा कि उस ऐतिहासिक समझौते ने जेष्ठाधिकार के नियम को केवल राजशाही सिंहासन के उत्तराधिकार के संबंध में ही सुरक्षित रखा था। उस समझौते में महाराजा की निजी संपत्तियों के उत्तराधिकार को लेकर किसी भी तरह की कोई गारंटी नहीं दी गई थी।

सर्वोच्च न्यायालय ने इस बात पर खास जोर दिया कि विलय समझौते पर हस्ताक्षर करने के बाद शासकों ने अपनी संप्रभुता पूरी तरह त्याग दी थी और उन्होंने आम नागरिकों का दर्जा स्वीकार कर लिया था। हालांकि, संविधान में उनके लिए कुछ अधिकार और विशेषाधिकार जरूर निर्धारित किए गए थे, लेकिन उनके पास अपने किसी क्षेत्र या प्रजा पर कोई संप्रभुता बाकी नहीं रह गई थी।

पीठ ने बेहद स्पष्ट शब्दों में कहा कि भले ही ऐसे व्यक्ति को ‘शासक’ के रूप में परिभाषित किया जाता हो, लेकिन वास्तव में उनके पास न तो कोई राज्य है और न ही वे किसी प्रजा पर शासन करते हैं। वे केवल भारत के एक नागरिक हैं जिन्हें कुछ विशेषाधिकार मिले हैं क्योंकि उनके पूर्वजों ने भारत डोमिनियन को अपना क्षेत्र, शक्तियां और संप्रभुता सौंप दी थी।

कोर्ट ने ऐसे शासकों को ‘बिना प्रजा के राजा’ करार दिया। इसी अहम चर्चा के आधार पर अदालत ने हाई कोर्ट की सिंगल जज और डिवीजन बेंच के उस फैसले को पूरी तरह अवैध और कानून की नजर में अस्थिर माना, जो निजी संपत्ति पर भी सिर्फ जेष्ठाधिकार के नियम को सही ठहराता था।

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