केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) अपनी नई ऑन-स्क्रीन मार्किंग (ओएसएम) प्रणाली को संभालने वाली हैदराबाद की वेंडर कंपनी ‘कोएम्प्ट एडुटेक प्राइवेट लिमिटेड’ पर आर्थिक जुर्माना लगाने पर विचार कर रहा है। इस साल 12वीं कक्षा की बोर्ड परीक्षा के मूल्यांकन प्रक्रिया के दौरान हजारों धुंधली उत्तर पुस्तिकाओं और कॉपियों के आपस में बदलने के कई गंभीर मामले सामने आए हैं।
सूत्रों के मुताबिक, सीबीएसई ने अब तक 5,000 धुंधली उत्तर पुस्तिकाओं की पहचान की है। इसके अलावा 23 ऐसे मामले सामने आए हैं जहां छात्रों को किसी अन्य उम्मीदवार की उत्तर पुस्तिका की स्कैन की गई प्रतियां मिल गईं। यह पहली बार था जब सीबीएसई ने 12वीं कक्षा के नतीजों के लिए पूरी तरह से डिजिटल मूल्यांकन प्रणाली का इस्तेमाल किया था। इसमें 18 लाख से अधिक छात्रों की 98 लाख से ज्यादा उत्तर पुस्तिकाएं शामिल थीं।
आधिकारिक सूत्रों ने बताया कि सीबीएसई की एक समिति स्कैनिंग में हुई इन त्रुटियों की गंभीरता का आकलन करेगी। प्रभावित उत्तर पुस्तिकाओं की संख्या के आधार पर इस कंपनी पर जुर्माने की राशि तय की जाएगी। हाल ही में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता राहुल गांधी ने भी कोएम्प्ट के चयन पर सवाल उठाते हुए इसके दागदार अतीत का जिक्र किया था।
इस पर एक अधिकारी ने बचाव करते हुए कहा कि यह फर्म तेलंगाना, कर्नाटक और पश्चिम बंगाल सहित कई राज्यों में बड़े पैमाने पर डिजिटल मूल्यांकन का काम संभालती है और इसकी लागत भी कम थी। हालांकि, कोएम्प्ट के कामकाज पर पहले भी गंभीर सवाल उठ चुके हैं। साल 2019 में इस कंपनी को ‘ग्लोबारेना टेक्नोलॉजीज प्राइवेट लिमिटेड’ के नाम से जाना जाता था और तेलंगाना में डेटा प्रोसेसिंग में हुई बड़ी विफलता से इसका नाम जुड़ा था।
उस समय तेलंगाना स्टेट बोर्ड के इंटरमीडिएट या 12वीं कक्षा की परीक्षा देने वाले लगभग 9.74 लाख छात्रों में से 3 लाख से अधिक छात्र फेल हो गए थे। तेलंगाना बोर्ड ऑफ इंटरमीडिएट एजुकेशन (टीएसबीआईई) के नतीजे आने के एक हफ्ते के भीतर 18 छात्रों ने आत्महत्या कर ली थी। इसके बाद तत्कालीन बीआरएस सरकार ने ग्लोबारेना के साथ अपना अनुबंध रद्द कर दिया था।
तेलंगाना पैरेंट्स एसोसिएशन के अध्यक्ष एन नारायण ने तब सवाल उठाया था कि पढ़ाई में होशियार छात्रों को कुछ विषयों में 5 या 10 अंक कैसे मिले। परीक्षा देने के बावजूद सैकड़ों छात्रों को ‘अनुपस्थित’ कर दिया गया था और पुनर्मूल्यांकन पर एक छात्रा के तेलुगु में अंक शून्य से बढ़कर 99 हो गए थे। पूर्व टीएसबीआईई आयुक्त सैयद उमर जलील ने बताया कि बोर्ड द्वारा नियुक्त ग्लोबारेना ने ‘बिना परीक्षण और बिना प्रमाणित किए गए सॉफ्टवेयर’ का इस्तेमाल किया था।
विवाद बढ़ने के तुरंत बाद इस कंपनी ने अपना काम अपनी सहयोगी संस्था ‘कोएम्प्ट एडुटेक प्राइवेट लिमिटेड’ को सौंप दिया। तेलंगाना सरकार द्वारा गठित जांच दल ने अपनी रिपोर्ट में बताया था कि नतीजे घोषित करने के ‘दबाव’ के कारण ये गलतियां हुई होंगी। तीन सदस्यीय समिति ने कहा कि कई मूल्यांकनकर्ताओं की ड्यूटी दिसंबर 2018 में होने वाले विधानसभा चुनाव में भी लगाई गई थी, जिसके कारण उन्होंने जल्दबाजी में काम किया।
इस हड़बड़ाहट में किसी छात्र को 88 की जगह 08 तो किसी को 99 की जगह 00 अंक दे दिए गए। रिपोर्ट में ग्लोबारेना को ‘मामूली तकनीकी गलतियों’ के लिए जिम्मेदार ठहराया गया था। उस परीक्षा में फेल हुए 3.82 लाख छात्रों में से पुनर्मूल्यांकन के बाद केवल 1,183 छात्र ही पास हुए थे।
तत्कालीन तेलंगाना के शिक्षा मंत्री जी जगदीश रेड्डी ने बताया कि प्रक्रिया को सुव्यवस्थित करने के लिए ग्लोबारेना को काम सौंपा गया था। उन्होंने कहा कि कंपनी से गलतियां हुईं जिसका खामियाजा छात्रों को भुगतना पड़ा, इसलिए उनका दोबारा उपयोग नहीं किया गया। ब्लैकलिस्ट न करने के सवाल पर रेड्डी ने स्पष्ट किया कि कोर्ट में केस चलने के कारण उस समय कंपनी को ब्लैकलिस्ट नहीं किया जा सका।
वहीं, ग्लोबारेना और अब कोएम्प्ट के सीईओ वी एस एन राजू का कहना है कि जो हुआ वह कुछ मामूली तकनीकी खामियों का नतीजा था जिन्हें बाद में सुधार लिया गया था। उन्होंने किसी भी बड़ी गलती से इनकार किया। लेकिन इससे पहले 2010 में आंध्र प्रदेश की जवाहरलाल नेहरू टेक्नोलॉजिकल यूनिवर्सिटी-काकीनाडा (जेएनटीयू-के) ने ग्लोबारेना के खिलाफ 20 करोड़ रुपये के अनुबंध को लेकर धोखाधड़ी का मामला दर्ज कराया था। एफआईआर में घटिया सेवाएं देने और सर्विस टैक्स न चुकाने का आरोप लगाया गया था।
विश्वविद्यालय की सतर्कता शाखा ने भी बिना पूर्व अनुभव के अनुबंध देने पर सवाल उठाए थे और सभी भुगतान रोक दिए गए थे। कंपनी को कोर्ट से ‘नो अरेस्ट’ ऑर्डर मिल गया था और यह मामला अब भी चल रहा है। इसके बावजूद नवंबर 2023 में जेएनटीयू हैदराबाद ने उत्तर पुस्तिकाओं को डिजिटल करने और ऑनस्क्रीन मूल्यांकन प्रणाली के लिए मैग्नेटिक इन्फोटेक के साथ कोएम्प्ट एजुकेशन प्राइवेट लिमिटेड को शॉर्टलिस्ट किया था।
सीबीएसई ने पिछले साल जून में अपने शासी निकाय की बैठक में कोएम्प्ट के ओएसएम सिस्टम को मंजूरी दी थी। सदस्यों को बताया गया था कि डिजिटल मूल्यांकन से गलतियां कम होंगी। बैठक के मिनट्स के अनुसार, सदस्यों ने सुझाव दिया था कि ऑन-स्क्रीन मार्किंग को कुछ क्षेत्रीय कार्यालयों में पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर लागू करने के बाद ही पूरी तरह से अपनाया जाए।
हालांकि ऐसा नहीं किया गया और जनवरी में केवल पांच स्कूलों में इसका ड्राई रन हुआ। सूत्रों का कहना है कि बोर्ड लगभग एक साल से इस बदलाव पर काम कर रहा था। 12वीं की परीक्षा के लिए कोएम्प्ट ने 18 लाख से अधिक छात्रों की लगभग 1 करोड़ उत्तर पुस्तिकाओं को स्कैन और अपलोड किया था। मूल्यांकनकर्ताओं के पास मार्किंग के दौरान अस्पष्ट या धुंधले स्कैन को अस्वीकार करने का विकल्प था।
विवाद तब शुरू हुआ जब छात्रों ने अपनी कॉपियों की स्कैन की गई प्रतियां मांगीं और उनमें धुंधले पेज, गायब पन्ने या दूसरे छात्रों की कॉपियां मिलीं। इसके बाद पुनर्मूल्यांकन के लिए सीबीएसई की भुगतान प्रणाली भी ठप हो गई। किसी से ज्यादा तो किसी से कम पैसे कटने लगे। अधिकारियों ने 23 मई को बताया कि इस बार 8.56 लाख उत्तर पुस्तिकाओं के लिए 2.94 लाख आवेदन प्राप्त हुए, जो पिछले साल की तुलना में दोगुने से भी अधिक हैं।
इस बार 90% से अधिक अंक लाने वालों की संख्या कम रही, जिसके कारण संभवतः यह मांग बढ़ी। बोर्ड ने अपने बचाव में इसे ‘अभूतपूर्व ट्रैफिक’ और ‘अनधिकृत हस्तक्षेप के प्रयास’ का नाम दिया। निविदा प्रक्रिया के बारे में अधिकारियों ने बताया कि कोएम्प्ट ने सबसे कम बोली लगाई थी। सीबीएसई ने 40 पेज की कॉपी की स्कैनिंग और सॉफ्टवेयर के लिए 25 रुपये प्रति कॉपी का भुगतान किया, जबकि दूसरी कंपनी ने 60 रुपये की मांग की थी।
कॉपियों के आपस में बदलने की घटना संभवतः मूल्यांकन प्रक्रिया के मास्किंग चरण के दौरान हुई, जब गोपनीयता बनाए रखने के लिए रोल नंबर छिपाए जाते हैं। सूत्रों ने जोर देकर कहा कि ओएसएम तकनीक की बजाय यह समस्या पूरी तरह से कार्य के दौरान हुई मानवीय चूक का परिणाम है।
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