अहमदाबाद: गुजरात के समुद्री तटों पर बिखरे रेत के छोटे-छोटे कणों ने अपने भीतर प्राचीन प्राकृतिक आपदाओं के गहरे राज छिपा रखे हैं। अब वैज्ञानिकों ने इन कणों का गहराई से अध्ययन कर कई चौंकाने वाले खुलासे किए हैं।
अहमदाबाद के एमजी साइंस इंस्टीट्यूट के शोधकर्ताओं ने ‘ऑप्टिकली स्टिमुलेटेड ल्यूमिनसेंस’ (OSL) नामक एक खास वैज्ञानिक तकनीक का इस्तेमाल किया है। इस तकनीक की मदद से उन्होंने गुजरात के तट पर लगभग 1,000 साल और 6,000 साल पहले आई कम से कम दो भयंकर सुनामी के पुख्ता संकेत खोज निकाले हैं।
इस महत्वपूर्ण शोध को “ऑप्टिकली स्टिमुलेटेड ल्यूमिनसेंस डेटिंग ऑफ होलोसीन सुनामी डिपॉजिट्स अलॉन्ग द गुजरात कोस्ट, इंडिया” शीर्षक के साथ प्रकाशित किया गया है। डॉ. दृष्टि गांधी और पारस सोलंकी द्वारा लिखे गए इस विस्तृत अध्ययन को प्रसिद्ध एल्सेवियर जर्नल ‘मरीन जियोलॉजी’ के नवीनतम अंक में जगह मिली है।
इस रिसर्च का मुख्य उद्देश्य यह जाँचना था कि क्या ओएसएल (OSL) तकनीक सुनामी से जमा हुए मलबे की सटीक पहचान करने और उसकी उम्र का पता लगाने में पूरी तरह कारगर है। इसके साथ ही, शोधकर्ताओं ने यह भी परखा कि कौन सी सांख्यिकीय विधियां इसके लिए सबसे बेहतरीन परिणाम दे सकती हैं।
ओएसएल तकनीक मुख्य रूप से यह पता लगाती है कि खनिजों के कण आखिरी बार सूरज की रोशनी के संपर्क में कब आए थे। सामान्य परिस्थितियों में रेत के कण नियमित रूप से धूप के संपर्क में आते रहते हैं, जिससे उनका समय चक्र प्राकृतिक रूप से ‘रीसेट’ होता रहता है।
हालाँकि, सुनामी जैसी विनाशकारी और तीव्र घटनाओं के दौरान भारी मात्रा में गाद और रेत बहुत तेजी से विस्थापित होकर जमीन के नीचे दब जाती है। इस अचानक हुए बदलाव के कारण इन कणों को रोशनी में आने का पूरा मौका नहीं मिल पाता है।
प्रयोगशाला के नियंत्रित माहौल में इन्हीं दबे हुए कणों का बारीकी से विश्लेषण किया जाता है। इसके जरिए वैज्ञानिक सदियों पुरानी हिंसक प्राकृतिक घटनाओं की एक स्पष्ट टाइमलाइन तैयार कर सकते हैं।
विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग के डब्लूओएसए (DST-WOSA) कार्यक्रम से जुड़ीं प्रोजेक्ट साइंटिस्ट डॉ. दृष्टि गांधी ने इस शोध के नतीजों पर विस्तार से बात की। उन्होंने स्पष्ट किया कि ये परिणाम ओएसएल को प्राचीन सुनामी के अवशेषों की पहचान करने और उनकी सटीक तारीख तय करने के लिए एक बेहद विश्वसनीय उपकरण साबित करते हैं।
इस वैज्ञानिक सफलता ने उन तटीय क्षेत्रों में प्राकृतिक आपदाओं के पुराने इतिहास को समझने की नई संभावनाएं खोल दी हैं। यह उन जगहों के लिए विशेष रूप से फायदेमंद है, जहां आपदाओं का कोई भी लिखित या यंत्रीकृत रिकॉर्ड मौजूद नहीं है।
एमजी साइंस इंस्टीट्यूट के भूविज्ञान विभाग के प्रमुख पारस सोलंकी ने इस शोध के व्यावहारिक और भविष्य के महत्व को समझाया। उन्होंने कहा कि गुजरात का तट पूरे भारत के सबसे अधिक आर्थिक रूप से सक्रिय समुद्री तटों में से एक माना जाता है।
सोलंकी के अनुसार, इस क्षेत्र में चक्रवातों के बारे में हमारी जानकारी तो बहुत स्पष्ट है, लेकिन सुनामी के खतरों को लेकर हमारी समझ अभी भी काफी पीछे छूट गई है।
उन्होंने जोर देकर कहा कि पुरानी सुनामी घटनाओं की आवृत्ति और उनकी पहुँच का सही अनुमान लगाना वक्त की सबसे बड़ी जरूरत है। मजबूत पूर्व चेतावनी प्रणाली विकसित करने और भविष्य के लिए सुरक्षित तटीय बुनियादी ढांचे के निर्माण की दिशा में यही पहला और सबसे महत्वपूर्ण कदम है।
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