गुजरात इस समय हाल के वर्षों की सबसे भीषण गर्मी का सामना कर रहा है। राज्य के कई हिस्सों में तापमान 44 डिग्री सेल्सियस को पार कर गया है। अहमदाबाद और राजकोट जैसे बड़े शहर लंबे समय से लू की चपेट में हैं। मौसम विज्ञानियों ने चेतावनी दी है कि यह 2026 में भारत में आने वाले एक बहुत बड़े जलवायु संकट की महज एक शुरुआत हो सकती है।
भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के ताज़ा आंकड़ों के अनुसार, 44.5 डिग्री सेल्सियस के साथ सुरेंद्रनगर गुजरात का सबसे गर्म स्थान बन गया है। इसके बाद राजकोट में 43.5 डिग्री, अमरेली में 43.3 डिग्री और अहमदाबाद में 43.1 डिग्री सेल्सियस तापमान दर्ज किया गया है।
वडोदरा का पारा 42.6 डिग्री तक पहुंच गया। तटीय नमी के बावजूद सूरत में तापमान 41.9 डिग्री दर्ज किया गया, जो सामान्य मौसमी स्तर से लगभग 6.2 डिग्री सेल्सियस अधिक है।
पूरा भीतरी गुजरात एक तरह से आग की भट्टी में तब्दील हो चुका है। भुज, डीसा, गांधीनगर, भावनगर, जूनागढ़ और डांग जैसे इलाकों में शुष्क हवाओं और साफ आसमान के कारण तापमान खतरनाक 40 डिग्री के आंकड़े को पार कर गया है या उसके बेहद करीब है। केवल तटीय क्षेत्रों जैसे द्वारका, वेरावल और पोरबंदर में समुद्री प्रभाव के कारण थोड़ी राहत मिली है, हालांकि वहां भी उमस बरकरार है।
अब मौसमी नहीं, संरचनात्मक हो गई है गुजरात की गर्मी
वैज्ञानिकों के लिए सबसे बड़ी चिंता का विषय यह है कि गुजरात की इस भीषण गर्मी को अब केवल गर्मियों की एक आम घटना नहीं माना जा रहा है। पिछले एक दशक में राज्य ने लंबी लू, अत्यधिक गर्मी की जल्दी शुरुआत और रात के बढ़ते तापमान का सामना किया है।
इसके साथ ही शहरों में उमस का तनाव, 43 डिग्री से अधिक तापमान वाले दिनों की बढ़ती संख्या और सूर्यास्त के बाद भी गर्मी से राहत न मिलने जैसी स्थितियां एक स्थायी जलवायु पैटर्न बनती जा रही हैं।
अहमदाबाद, जिसे कभी केवल असाधारण गर्मियों में ही खतरनाक रूप से गर्म माना जाता था, अब लगभग हर साल गंभीर लू का सामना करता है। यह शहर 2010 की जानलेवा हीटवेव के बाद पूरे देश के लिए एक चेतावनी बन गया था।
उस त्रासदी में सैकड़ों लोगों की जान चली गई थी, जिसके बाद प्रशासन को भारत की पहली ‘हीट एक्शन प्लान’ लागू करनी पड़ी थी। हालांकि, जलवायु वैज्ञानिकों का कहना है कि अब तापमान बढ़ने की गति पहले के अनुमानों से कहीं ज्यादा तेज हो चुकी है।
इतनी तेजी से क्यों गर्म हो रहा है गुजरात?
विशेषज्ञ इस खतरनाक स्थिति के लिए कई कारणों को जिम्मेदार मानते हैं। ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन के कारण होने वाली ग्लोबल वार्मिंग दुनिया भर में औसत तापमान बढ़ा रही है।
भारत अत्यधिक गर्मी के प्रति सबसे संवेदनशील देशों में से एक है। विशेष रूप से पश्चिमी भारत, जिसमें गुजरात और राजस्थान शामिल हैं, कई तटीय या जंगली क्षेत्रों की तुलना में कहीं अधिक तेजी से गर्म हो रहा है। जो हीटवेव कभी बेहद दुर्लभ मानी जाती थीं, वे अब सालाना घटना बन गई हैं।
अहमदाबाद, सूरत, राजकोट और वडोदरा में तेजी से हुए शहरीकरण ने गर्मी को कैद करने का काम किया है। कंक्रीट की सड़कें, कांच की इमारतें, घटते पेड़ और भारी ट्रैफिक दिन भर गर्मी को सोखते हैं।
रात में यह गर्मी धीरे-धीरे बाहर निकलती है, जिससे प्राकृतिक रूप से तापमान कम नहीं हो पाता। इस “अर्बन हीट आइलैंड” प्रभाव के कारण शहर आसपास के ग्रामीण इलाकों की तुलना में काफी ज्यादा गर्म हो रहे हैं।
आमतौर पर मई में होने वाली छिटपुट बारिश और गरज के साथ पड़ने वाली बौछारें अस्थायी ठंडक देती हैं। लेकिन इस साल गुजरात में मानसून से पहले की कोई खास बारिश नहीं हुई है।
शुष्क हवा, बादलों की कमी और तेज धूप हर दिन तापमान को और ऊपर धकेल रही है। इसके अलावा, राजस्थान और आसपास के शुष्क क्षेत्रों से आ रही शक्तिशाली शुष्क हवाएं सौराष्ट्र, उत्तरी गुजरात और मध्य जिलों में दिन के तापमान को तेजी से बढ़ा रही हैं।
सामने है ‘सुपर अल नीनो’ का बड़ा खतरा
जहां गुजरात वर्तमान में लू से जूझ रहा है, वहीं वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि प्रशांत महासागर में उभर रहा “सुपर अल नीनो” इस साल के अंत में भारत की जलवायु स्थिति को और भी खराब कर सकता है।
मौसम विभाग ने पहले ही 2026 के लिए सामान्य से कम मानसून की भविष्यवाणी की है। इस साल दक्षिण-पश्चिम मानसून के लंबी अवधि के औसत का केवल 92% रहने का अनुमान है। सबसे चिंताजनक बात यह है कि कम बारिश होने की 35% संभावना है, जो ऐतिहासिक औसत जोखिम से दोगुने से भी अधिक है।
यह सब एक बेहद मजबूत अल नीनो के तेजी से बनने के कारण हो रहा है। अल नीनो एक जलवायु घटना है जो मध्य प्रशांत महासागर के पानी के असामान्य रूप से गर्म होने के कारण होती है।
भले ही यह हजारों किलोमीटर दूर होता है, लेकिन यह पूरी दुनिया के वायुमंडलीय चक्र को बाधित करता है, विशेषकर भारत की मानसून प्रणाली को। सामान्य तौर पर मानसूनी हवाएं समुद्र से भारत की ओर नमी लाती हैं। लेकिन मजबूत अल नीनो के दौरान ये मानसूनी धाराएं कमजोर पड़ जाती हैं।
मानसूनी हवाओं के कमजोर पड़ने से बारिश कम होती है और सूखे का दौर लंबा खिंचता है। इससे लू की घटनाओं में वृद्धि, फसलों को नुकसान और पानी की भारी किल्लत जैसी समस्याएं पैदा होती हैं।
प्रशांत महासागर के तापमान पर नजर रखने वाले वैज्ञानिकों का कहना है कि इस साल समुद्र असामान्य रूप से तेजी से गर्म हो रहा है। कुछ वैश्विक जलवायु मॉडल पहले ही समुद्र की सतह के तापमान में 2 डिग्री सेल्सियस से अधिक की वृद्धि का अनुमान लगा रहे हैं।
इसी स्थिति को मौसम विज्ञानी “सुपर अल नीनो” कहते हैं। यदि यह तापमान 2.5 डिग्री सेल्सियस को पार कर जाता है, तो यह 1997 और 2015 के विनाशकारी जलवायु वर्षों के बराबर का कहर बरपा सकता है।
भारत के किन हिस्सों पर है सबसे ज्यादा खतरा?
अल नीनो का प्रभाव हर जगह एक जैसा नहीं होता, लेकिन यह संभावित रूप से बेहद विनाशकारी है। उत्तरी, पश्चिमी और मध्य भारत में कम बारिश का सबसे ज्यादा खतरा है। खतरे वाले इन क्षेत्रों में गुजरात, राजस्थान, पंजाब, हरियाणा, दिल्ली-एनसीआर, महाराष्ट्र का मराठवाड़ा क्षेत्र और मध्य प्रदेश के कुछ हिस्से मुख्य रूप से शामिल हैं।
गुजरात के लिए इसका सीधा मतलब पानी की किल्लत, जलाशयों के गिरते जल स्तर और कृषि संकट से है। बिजली की मांग बढ़ने के साथ-साथ अगस्त और सितंबर में लू का प्रकोप और गंभीर हो सकता है। यदि बुवाई के महत्वपूर्ण समय पर मानसून कमजोर पड़ता है, तो सौराष्ट्र और उत्तरी गुजरात के किसानों को सबसे ज्यादा नुकसान उठाना पड़ सकता है।
हैरानी की बात यह है कि अल नीनो दक्षिणी और पूर्वी भारत के कुछ हिस्सों में अत्यधिक बारिश का कारण भी बन सकता है। मजबूत अल नीनो वर्षों के दौरान चेन्नई और तटीय तमिलनाडु को बाढ़ के प्रति विशेष रूप से संवेदनशील माना जाता है। कुछ पूर्वी तटीय क्षेत्रों में भी बाढ़ का ऐसा ही खतरा उभर सकता है।
पिछले अल नीनो वर्षों से सबक
भारत ने पहले भी मजबूत अल नीनो के विनाशकारी परिणाम झेले हैं। 2015-16 के सुपर अल नीनो ने कई राज्यों में गंभीर सूखा, भारी बारिश की कमी और बड़े पैमाने पर फसलों की विफलता का कारण बना था।
उस दौरान जलाशयों का पानी सूख गया था और चेन्नई में आई भीषण बाढ़ ने शहर के बड़े हिस्से को जलमग्न कर दिया था। अकेले मराठवाड़ा में उस समय बारिश में 40% से अधिक की कमी दर्ज की गई थी।
इसके अलावा, 2023 के अल नीनो के दौरान अगस्त महीने में भारत में 36% कम बारिश हुई थी, जिससे महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, ओडिशा और छत्तीसगढ़ बुरी तरह प्रभावित हुए थे। विशेषज्ञों को डर है कि अगर प्रशांत महासागर का तापमान इसी तरह बढ़ता रहा, तो 2026 की स्थितियां और भी ज्यादा भयावह हो सकती हैं।
गुजरात का भविष्य: अधिक गर्म, शुष्क और चरम
जलवायु विशेषज्ञों का मानना है कि भौगोलिक स्थिति, तेजी से बढ़ते शहरीकरण और पानी के बढ़ते दबाव के कारण आने वाले दशकों में गुजरात भारत के सबसे अधिक गर्मी झेलने वाले राज्यों में से एक बन सकता है।
बढ़ता तापमान, अनियमित मानसून, गिरता भूजल स्तर, फैलते शहर और औद्योगिक गर्मी मिलकर राज्य में लोगों के रहने और काम करने के तरीके को पूरी तरह बदल सकते हैं।
इस चरम जलवायु परिवर्तन का सबसे बड़ा खामियाजा बाहर काम करने वाले मजदूरों, किसानों, निर्माण श्रमिकों, डिलीवरी करने वालों और कम आय वाली शहरी आबादी को भुगतना पड़ेगा।
मौसम विज्ञानियों का कहना है कि आने वाले कुछ सप्ताह बेहद महत्वपूर्ण होंगे। अगर मानसून से पहले की बारिश कमजोर रहती है और जुलाई-अगस्त तक अल नीनो और तीव्र हो जाता है, तो गुजरात को हाल के वर्षों के अपने सबसे कठिन जलवायु सत्र का सामना करना पड़ सकता है।
फिलहाल, राज्य एक ऐसे निर्दयी आसमान के नीचे फंसा हुआ है, जिसे लेकर वैज्ञानिक चेतावनी दे रहे हैं कि यह सिर्फ मौसम का कोई बदलाव नहीं, बल्कि हमारे भविष्य की कड़वी सच्चाई है।
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