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अमरेली के किसान का अनोखा प्रयोग: एक ही पेड़ पर उगाईं आम की 14 किस्में, होली से दिवाली तक मिलते हैं फल

| Updated: May 15, 2026 14:25

गुजरात के अमरेली में उकाभाई भट्टी ने एक ऐसा 'जादुई पेड़' तैयार किया है, जिस पर नवाबों के जमाने की लुप्त हो चुकी आम की 14 अलग-अलग किस्में एक साथ फलती हैं।

राजकोट: अगर आम बोल पाते, तो वे शायद गुजरात के अमरेली में मौजूद इस अनोखे पेड़ की तारीफों के पुल बांध देते। यह पेड़ उन दुर्लभ और लुप्त हो चुकी आम की किस्मों की कहानी को फिर से जिंदा कर रहा है, जिन्हें हम लगभग भूल चुके थे।

धारी तालुका के दितला गांव में रहने वाले सत्तर वर्षीय उकाभाई भट्टी मुख्य रूप से केसर आम की खेती करते हैं। लेकिन उन्होंने अपने घर पर एक ऐसा जादुई पेड़ तैयार किया है, जिसकी अलग-अलग शाखाओं पर 14 तरह के आम फलते हैं।

इस पेड़ को आमों का एक ‘जीवित एल्बम’ कहा जा सकता है, क्योंकि यह होली से लेकर दिवाली तक मिठास देता रहता है। उकाभाई अपने इस जादुई पेड़ में नई किस्में जोड़ने का प्रयास आज भी कर रहे हैं।

इस अद्भुत पेड़ पर जूनागढ़ के नवाब काल में उगाई जाने वाली आम की कई खास किस्में मौजूद हैं। इनमें नलियेरो, गुलाबियो, सिंदोरियो, दादमो, कालो जमादार, कैप्टन, पायलट, वरियालियो, बादाम, सरदार, श्रावणियो और अषाढ़ियो जैसी अनूठी किस्में शामिल हैं।

उकाभाई बताते हैं कि नवाबों के दौर में आम की 200 से अधिक किस्में हुआ करती थीं, लेकिन आज के समय में केवल केसर आम ही अपनी लोकप्रियता के साथ जीवित रह पाया है। इस किसान ने आम की खूबियों और उनके स्वभाव के अनुसार कुछ किस्मों के खुद ही दिलचस्प नाम भी रखे हैं।

अपनी इस पहल के बारे में उकाभाई कहते हैं कि वे यह सब आने वाली पीढ़ी के लिए कर रहे हैं, ताकि नई उम्र के लोग हमारे क्षेत्र की समृद्ध आम की किस्मों से अनजान न रहें। उन्होंने यह पेड़ सिर्फ अपने घर पर उगाया है और इसके फल बिक्री के लिए नहीं हैं।

हर किस्म से केवल कुछ किलो ही पैदावार होती है, जिसका इस्तेमाल सिर्फ उनके परिवार के लोग करते हैं। करीब चार दशक पहले भी उनके पास एक ऐसा ही पेड़ था जिस पर 44 किस्में उगती थीं, लेकिन समय के साथ वह पेड़ प्राकृतिक रूप से सूख गया।

एक किताब पढ़ने के बाद उन्हें आम की कुछ ऐसी स्वदेशी किस्मों के बारे में पता चला जो अब विलुप्त हो चुकी हैं। इन किस्मों की तलाश में उन्होंने महाराष्ट्र के कृषि विद्यापीठ, राजस्थान और डांग के जंगली इलाकों की खाक छानी। उन्हें कई दुर्लभ किस्में मिलीं, लेकिन कुछ का कोई नाम नहीं था।

ऐसे में इस किसान ने जंगली किस्मों के रंग-रूप और उनके गुणों के आधार पर खुद उनके नामकरण किए। उदाहरण के लिए, अगर कोई आम सख्त और मजबूत था, तो उसका नाम ‘कैप्टन’ रख दिया गया, और जिसके छिलके का रंग काला था, उसे ‘कालो जमादार’ का नाम दिया गया।

भट्टी के अनुसार, इस पेड़ की सबसे बड़ी खूबी यह है कि हर किस्म अलग-अलग समय पर फल देती है। कुछ किस्मों में सीजन की शुरुआत में ही फल आ जाते हैं, जबकि कुछ में फूल काफी देर से खिलते हैं। यही कारण है कि यह एक अकेला पेड़ पूरे साल यानी होली से लेकर दिवाली तक फल देता रहता है।

गुजरात का गिर क्षेत्र केसर आम का सबसे बड़ा केंद्र माना जाता है। केसर के बागान जूनागढ़, अमरेली, गिर सोमनाथ और भावनगर जिलों में फैले हुए हैं। इस खास आम को जीआई (GI) टैग भी मिल चुका है और इसकी मिठास ने दुनिया भर के लोगों का दिल जीता है।

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