अहमदाबाद: भारत में म्यूचुअल फंड एसआईपी (SIP) का चलन तेजी से बढ़ रहा है, लेकिन इसे लंबे समय तक जारी रखने के मामले में आंकड़े कुछ और ही कहानी बयां करते हैं। उद्योग के नवीनतम आंकड़ों के अनुसार, देश में हर 10 में से केवल एक एसआईपी खाता ही पांच साल से अधिक समय तक सक्रिय रह पाता है। मार्च 2026 में पांच साल से ज्यादा चलने वाले एसआईपी खातों की संख्या 11.2 प्रतिशत गिरकर 1.06 करोड़ रह गई, जो एक साल पहले इसी अवधि में 1.19 करोड़ थी।
दिलचस्प बात यह है कि लंबी अवधि के खातों में गिरावट के बावजूद, इसी दौरान देश में कुल एसआईपी खातों की संख्या 3.9 प्रतिशत बढ़ी है। यह संख्या 10.05 करोड़ से बढ़कर 10.45 करोड़ हो गई है। निवेशकों के इस व्यवहार को लेकर गुजरात में भी बिल्कुल ऐसा ही रुझान देखने को मिला है।
आंकड़ों की गहराई में जाएं तो डायरेक्ट-प्लान एसआईपी खातों में सबसे भारी गिरावट दर्ज की गई है। मार्च 2026 में इनकी संख्या 34.7 फीसदी लुढ़ककर 17.55 लाख पर आ गई, जो पिछले साल 26.87 लाख थी। वहीं, रेगुलर-प्लान वाले एसआईपी खातों में 4.4 प्रतिशत की कमी आई और यह आंकड़ा 92.51 लाख से घटकर 88.44 लाख रह गया।
एक प्रमुख म्यूचुअल फंड डिस्ट्रीब्यूशन कंपनी में इन्वेस्टर रिलेशंस के प्रमुख पार्थ पारेख के मुताबिक, यह अंतर साफ तौर पर बताता है कि खुद अपने पोर्टफोलियो का प्रबंधन करने वाले निवेशक बाजार के खराब प्रदर्शन के दौरान एसआईपी बंद करने की अधिक जल्दबाजी करते हैं। उन्होंने बताया कि डायरेक्ट निवेश करने वाला एक वर्ग हालिया एक या तीन साल के रिटर्न को देखकर फंड चुनता है।
पार्थ पारेख का मानना है कि जब फंड का प्रदर्शन थोड़ा धीमा होता है, तो ऐसे निवेशक या तो अपनी एसआईपी रोक देते हैं या फिर दूसरी स्कीम में स्विच कर जाते हैं। दूसरी तरफ, जो लोग डिस्ट्रीब्यूटर के साथ काम करते हैं, उन्हें एसेट एलोकेशन, रिस्क प्रोफाइलिंग और व्यवहारिक मार्गदर्शन मिलता रहता है। इससे उन्हें उतार-चढ़ाव वाले बाजार में भी टिके रहने में काफी मदद मिलती है।
अहमदाबाद स्थित एक वित्तीय सलाहकार फर्म के निदेशक मुमुक्षु देसाई इस ट्रेंड को अलग नजरिए से देखते हैं। उनका कहना है कि इस रुझान का मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि म्यूचुअल फंड के प्रति लोगों की दिलचस्पी कम हो रही है, क्योंकि एसआईपी निवेश का कुल मूल्य लगातार बढ़ रहा है। बल्कि यह स्थिति इस बात की ओर इशारा करती है कि निवेशक पांच साल से आगे अपनी एसआईपी को जारी नहीं रख पा रहे हैं।
देसाई इस प्रवृत्ति का एक बड़ा कारण ‘डू-इट-योरसेल्फ’ (खुद से निवेश करने वाले) प्लेटफॉर्म के तेजी से बढ़ते चलन को मानते हैं। इन प्लेटफॉर्म्स ने म्यूचुअल फंड को युवा निवेशकों के बीच काफी सुलभ बना दिया है। हालांकि इससे बाजार में भागीदारी तो बढ़ी है, लेकिन इसका एक नुकसान यह भी हुआ है कि कई निवेशक बिना किसी पेशेवर मार्गदर्शन के वित्तीय फैसले ले रहे हैं।
मुमुक्षु देसाई के अनुसार, कई युवा निवेशक पहली बार बाजार में लंबे समय तक रहने वाले उतार-चढ़ाव का सामना कर रहे हैं। ऐसे में बाजार के करेक्शन के दौरान उनके एसआईपी बंद करने या निवेश निकाल लेने की आशंका ज्यादा रहती है। अक्सर ये निवेशक बेहतर प्रदर्शन करने वाली स्कीम या नए लॉन्च हुए फंड में जाने के लिए अपने पोर्टफोलियो में बदलाव करते रहते हैं, जो कि लंबी अवधि के फंडामेंटल के बजाय शॉर्ट-टर्म प्रदर्शन पर आधारित होता है।
इंडस्ट्री के जानकारों का यह भी कहना है कि मैच्योर हो चुकी एसआईपी के बंद होने के पीछे कुछ अन्य व्यावहारिक कारण भी हो सकते हैं। इनमें नकदी प्रवाह का दबाव, किसी तय वित्तीय लक्ष्य का पूरा हो जाना, बैंक मैंडेट का खत्म होना या फिर अपने पोर्टफोलियो को कंसोलिडेट करना शामिल है।
वर्तमान में देश के कुल 10.45 करोड़ एसआईपी खातों में से पांच साल से अधिक पुराने खातों की हिस्सेदारी केवल 10.1 प्रतिशत ही है। यह आंकड़ा इस बात को रेखांकित करता है कि एसआईपी भागीदारी में लगातार वृद्धि के बावजूद, निवेशकों को पूरे बाजार चक्र के दौरान निवेशित और प्रतिबद्ध बनाए रखना आज भी एक बड़ी चुनौती है।
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