प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब भी विदेश यात्रा पर जाते हैं, तो अक्सर उन्हें उस देश के किसी न किसी सम्मान से नवाजा जाता है। इनमें से कुछ पुरस्कार तो ऐसे होते हैं, जिनके वे पहले और एकमात्र प्राप्तकर्ता होते हैं। लंदन स्थित गार्जियन अखबार के अनुसार, हाल ही में पीएम मोदी की सेशेल्स यात्रा के दौरान भी कुछ ऐसा ही देखने को मिला। हिंद महासागर के इस द्वीप राष्ट्र ने भारतीय प्रधानमंत्री को अपने एक सर्वोच्च सम्मान से सम्मानित किया।
सेशेल्स के राष्ट्रपति पैट्रिक हर्मिनी ने पीएम मोदी को एक ट्रॉफी और प्रमाणपत्र के साथ ‘गार्जियन ऑफ द ब्लू होराइजन’ पुरस्कार प्रदान किया। इसे स्वीकार करते हुए प्रधानमंत्री बेहद प्रसन्न नजर आ रहे थे। हालांकि, इस सम्मान समारोह के तुरंत बाद पर्यवेक्षकों ने ध्यान दिलाया कि इस अवार्ड में कई चीजें अटपटी लग रही थीं।
प्रमाणपत्र पर कई गंभीर गलतियां थीं। इसमें अंग्रेजी के ‘रिपब्लिक’ शब्द की स्पेलिंग ‘repubblic’ और ‘सेशेल्स’ को ‘Seycheeles’ लिखा गया था। बाद में यह भी पता चला कि इस पुरस्कार की शुरुआत पीएम मोदी के वहां पहुंचने से महज तीन दिन पहले ही की गई थी। इसके साथ ही, वे इस सम्मान को पाने वाले पहले और एकमात्र व्यक्ति हैं।
विवाद तब और गहरा गया जब एक सॉफ्टवेयर के जरिए जांच करने पर उस सर्टिफिकेट को एआई (AI) द्वारा जनरेट किया हुआ बताया गया। इन सब बातों ने एक बड़े राजनीतिक विवाद को जन्म दे दिया। विपक्षी पार्टी कांग्रेस ने इस मुद्दे को हाथों-हाथ लिया और तंज कसते हुए कहा कि मोदी जी को कोई भी अवार्ड दो, वे उसे लेने दौड़े चले आएंगे।
कांग्रेस नेता सुप्रिया श्रीनेत ने सोशल मीडिया पर इस घटना की आलोचना की। उन्होंने कहा कि उन्हें पुरस्कार देने की इतनी भयानक जल्दी थी कि वे सेशेल्स गणराज्य का आधिकारिक नाम तक सही से नहीं लिख पाए। दूसरी ओर, मोदी की भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने तुरंत पलटवार करते हुए इसका बचाव किया।
बीजेपी नेताओं ने कहा कि प्रधानमंत्री का यह ‘ग्रीन लीडरशिप’ सम्मान भारत के लिए एक बेहद गर्व का क्षण है। इस बढ़ते विवाद के बीच गुरुवार को सेशेल्स के विदेश मंत्रालय ने एक बयान जारी कर सफाई दी। मंत्रालय ने दावा किया कि गलती से एक वर्किंग ड्राफ्ट (कच्चा मसौदा) प्रसारित हो गया था और अब एक प्रामाणिक तथा विधिवत स्वीकृत संस्करण जारी कर दिया गया है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि गार्जियन ऑफ द ब्लू होराइजन सम्मान पूरी तरह से वास्तविक है।
आलोचकों का मानना है कि अपने 12 साल के कार्यकाल के दौरान पीएम मोदी ने देश और विदेश में पुरस्कार प्राप्त करने के प्रति एक विशेष रुचि दिखाई है। लंदन स्थित गार्जियन अखबार के अनुसार, यह कोई पहला मामला नहीं है जब किसी देश ने अचानक से नया सम्मान बनाकर प्रधानमंत्री को दिया हो। पिछले महीने ही पीएम मोदी की इजरायल यात्रा से कुछ दिन पहले, इजरायली संसद ने एक नया सर्वोच्च सम्मान ‘मेडल ऑफ द नेसेट’ शुरू किया था।
जैसे ही पीएम मोदी इजरायल उतरे, उन्हें यह मेडल प्रदान किया गया। इस मामले में भी वे अब तक के एकमात्र प्राप्तकर्ता हैं। इससे पहले साल 2019 में, पीएम मोदी भारत के पहले ‘फिलिप कोटलर प्रेसिडेंशियल अवार्ड’ के भी पहले प्राप्तकर्ता बने थे। यह सम्मान उन्हें राष्ट्र के उत्कृष्ट नेतृत्व के लिए दिया गया था।
सरकार की तत्कालीन प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार, फिलिप कोटलर सम्मान हर साल किसी न किसी देश के नेता को दिया जाना था। लेकिन, हैरानी की बात यह है कि उसके बाद से किसी अन्य वैश्विक नेता को यह पुरस्कार नहीं दिया गया है और उस अवार्ड की वेबसाइट भी अब निष्क्रिय पड़ी है।
निजी तौर पर कई लोग यह मानते हैं कि मोदी की विदेश यात्राओं के दौरान इस तरह के सम्मान और पुरस्कार अब एक आम अपेक्षा बन गए हैं। मोदी की जीवनी लिखने वाले लेखक नीलांजन मुखोपाध्याय ने इस पूरी प्रवृत्ति पर अपनी बेबाक राय रखी है।
नीलांजन के मुताबिक, वैश्विक स्तर पर पुरस्कारों के लिए यह होड़ प्रधानमंत्री की व्यक्ति-केंद्रित राजनीति का ही एक लक्षण है। उनका कहना है कि ऐसे पुरस्कारों को इकट्ठा करने के पीछे का असल इरादा समर्थकों को यह संदेश देना है कि मोदी जी की महानता के कारण पूरी दुनिया उनका सम्मान कर रही है। यह जताने की कोशिश होती है कि भारत का बढ़ता प्रभाव मोदी के व्यक्तित्व की ही देन है, भले ही कई बार ये सम्मान ऐसे हालात में दिए जाते हैं जो खुद ही कई सवाल खड़े करते हैं।
बीते एक साल की बात करें तो पीएम मोदी इथियोपिया का ‘ग्रेट ऑनर निशान’ और ‘ऑर्डर ऑफ द रिपब्लिक ऑफ त्रिनिदाद एंड टोबैगो’ प्राप्त करने वाले पहले विदेशी राष्ट्राध्यक्ष भी बने हैं। वहीं, इन तमाम विवादों के बावजूद बीजेपी लगातार यही कहती है कि ये सभी पुरस्कार अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पीएम मोदी के बढ़ते कद और प्रभाव की वैश्विक मान्यता हैं।
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