अहमदाबाद-स्थित शेलाडिया ग्रुप की करोड़ों रुपये की टैक्स चोरी का पर्दाफाश करने वाले एक मुखबिर को गुजरात हाईकोर्ट से बड़ा झटका लगा है। अदालत ने उस याचिका को खारिज कर दिया है जिसमें आयकर विभाग से तय रकम से अधिक इनाम की मांग की गई थी।
हाईकोर्ट ने अपने अहम फैसले में स्पष्ट किया कि मुखबिरों को दिया जाने वाला इनाम पूरी तरह से विभाग के विशेषाधिकार (अनुग्रह राशि) और विवेक पर निर्भर करता है। पीठ ने कहा कि जब तक कोई स्पष्ट मनमानी या गैरकानूनी बात साबित न हो, तब तक न्यायपालिका ऐसे मामलों में दखल नहीं दे सकती।
इस फैसले के बाद, अपनी पहचान गुप्त रखने वाले उस रियल एस्टेट कंसल्टेंट को अब केवल 17.51 लाख रुपये के कुल इनाम से ही संतोष करना पड़ेगा। गौरतलब है कि उनकी दी गई अहम जानकारी के आधार पर साल 2010 में इस कंस्ट्रक्शन कंपनी पर छापेमारी हुई थी। इस दौरान 60.48 करोड़ रुपये की अघोषित आय और 1.50 करोड़ रुपये नकद बरामद हुए थे।
मुखबिर ने अपनी याचिका में 44.5 लाख रुपये के इनाम की मांग की थी। उनका तर्क था कि केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (सीबीडीटी) के सिफारिश करने वाले प्राधिकरण ने उनके इनपुट्स के महत्व को देखते हुए, वसूल किए गए कुल टैक्स का 5.48 प्रतिशत बतौर इनाम देने का प्रस्ताव रखा था।
अदालत के दस्तावेजों के अनुसार, मुखबिर ने साल 2010 में आयकर विभाग को एक बड़ी जमीन की डील के बारे में गुप्त सूचना दी थी। उनका दावा था कि शेलाडिया ग्रुप ने एक जमीन मालिक को 47.5 करोड़ रुपये का नकद भुगतान किया है। इसके बाद हुई गहन जांच में इस सौदे से जुड़े अन्य लोग भी रडार पर आ गए, जिसके परिणामस्वरूप विभाग ने कुल 8.12 करोड़ रुपये का टैक्स वसूला।
शुरुआत में आयकर विभाग ने मुखबिर को 15 लाख रुपये दिए थे और इसे अधिकतम सीमा बताया था। हालांकि, इनाम नीति के तहत योग्य मामलों में वसूल किए गए टैक्स का 20 प्रतिशत तक देने का प्रावधान मौजूद है।
इस रकम से असंतुष्ट होकर मुखबिर ने साल 2018 में हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। उन्होंने वित्त मंत्रालय की 2007 की गाइडलाइंस का हवाला दिया, जिसमें 5 करोड़ रुपये से अधिक की टैक्स रिकवरी होने पर इनाम की अधिकतम सीमा में छूट देने की बात कही गई है।
उस समय अदालत के निर्देश पर विभाग ने उनके दावे पर पुनर्विचार किया। इनाम की दोबारा व्यवस्थित गणना की गई और दिसंबर 2018 में 2.51 लाख रुपये की अतिरिक्त राशि का भुगतान किया गया। इससे कुल इनाम 17.51 लाख रुपये हो गया, लेकिन भारी रिकवरी का हवाला देते हुए मुखबिर ने इनाम की राशि और बढ़ाने के लिए एक बार फिर अदालत का रुख किया।
याचिका का कड़ा विरोध करते हुए आयकर विभाग ने दलील दी कि 2007 की नीति के तहत इनाम पूरी तरह से अनुग्रह राशि (ex gratia) है। फुल बोर्ड ने दावे का बारीकी से मूल्यांकन किया था और पाया कि मुखबिर द्वारा लिखित में दिए गए 14 बिंदुओं में से केवल छह ही सटीक थे।
कम सटीक जानकारी होने की वजह से इनाम का वेटेज कम कर दिया गया। विभाग ने अदालत में वह अंडरटेकिंग भी पेश की जिस पर छापेमारी से पहले मुखबिर ने हस्ताक्षर किए थे। इसमें उन्होंने खुद स्वीकार किया था कि कोई भी इनाम सक्षम प्राधिकारी के पूर्ण विवेक और अनुग्रह पर निर्भर करेगा।
जस्टिस ए.एस. सुपेहिया और जस्टिस वी.डी. नानावटी की पीठ ने सभी दलीलों को सुनने के बाद याचिका खारिज कर दी। अदालत ने अपने आदेश में कहा कि इनाम की रकम किसी वैधानिक प्रावधान से तय नहीं होती है।
पीठ ने टिप्पणी की कि अदालत सीबीडीटी जैसे विशेषज्ञ निकाय की जगह नहीं ले सकती। जब तक किसी व्यवस्थित गणना में कोई स्पष्ट मनमानी न हो, तब तक अदालत फुल बोर्ड द्वारा तय किए गए अंतिम इनाम में किसी भी तरह का कोई हस्तक्षेप नहीं करेगी।
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