प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने गुजरात हाईकोर्ट को बताया है कि निलंबित आईएएस अधिकारी आरएम पटेल के निजी फोन में भूमि उपयोग परिवर्तन से जुड़ी फाइलों की 800 तस्वीरें मिली हैं। ये तस्वीरें उनकी टेबल से गुजरने वाली हर उस फाइल का सबूत थीं, जिन पर कथित तौर पर रिश्वत की कीमत तय थी। जांच एजेंसी ने अदालत को यह भी बताया कि ईडी की छापेमारी से ठीक एक दिन पहले अधिकारी ने गूगल पर “सैमसंग एस24 अल्ट्रा को कैसे रीसेट करें” सर्च किया था।
इन पुख्ता सबूतों को नजरअंदाज करना अदालत के लिए बेहद मुश्किल था। गुजरात हाईकोर्ट के जस्टिस एचडी सुथार ने सोमवार को अपना 48 पन्नों का फैसला सुनाते हुए सुरेंद्रनगर के पूर्व कलेक्टर की जमानत याचिका खारिज कर दी। अदालत ने मनी लॉन्ड्रिंग और रिश्वतखोरी के इस मामले में कहा कि पटेल पीएमएलए अधिनियम की धारा 45 के तहत जमानत की शर्तों को पूरा करने में विफल रहे हैं। अदालत को ऐसा कोई आधार नहीं मिला जिससे यह माना जा सके कि वह दोषी नहीं हैं या दोबारा ऐसा अपराध नहीं करेंगे।
ईडी ने अदालत में इस पूरे रैकेट को एक सुनियोजित ‘सिस्टम’ करार दिया। जांच एजेंसी के मुताबिक, तत्कालीन कलेक्टर के रूप में पटेल के पास आईओआरए (IORA) पोर्टल पर अंतिम मंजूरी देने का अधिकार था। इस पद का फायदा उठाते हुए उन्होंने कथित तौर पर रिश्वत का सबसे बड़ा हिस्सा यानी 50 प्रतिशत खुद लिया, जो करीब 3.12 करोड़ रुपये बैठता है।
इस पूरे मामले की जांच के तार 23 दिसंबर 2025 से जुड़े हैं। उस दिन कलेक्टर कार्यालय के तत्कालीन डिप्टी मामलातदार चंद्रसिंह मोरी के आवास पर छापेमारी की गई थी। वहां से 67.5 लाख रुपये नकद और कुछ हस्तलिखित ‘हिसाब की पर्चियां’ बरामद हुई थीं। इन पर्चियों में ‘चेंज ऑफ लैंड यूज’ (सीएलयू) की अनुमति देने के बदले ली गई रिश्वत का पूरा ब्योरा था। यह जानकारी पीएमएलए की धारा 66(2) के तहत भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (एसीबी) के साथ साझा की गई, जिसके बाद भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत एफआईआर दर्ज हुई और ईडी ने अपना अलग मनी लॉन्ड्रिंग का मामला दर्ज किया।
जांच एजेंसी की ओर से पेश हुए अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एसवी राजू ने अदालत को बताया कि इस गिरोह में रिश्वत की दरें पूरी तरह से तय थीं। गुजरात भूमि राजस्व संहिता के तहत मंजूरी के लिए 10 रुपये प्रति वर्ग मीटर और सौराष्ट्र घरखेड़ किरायेदारी निपटान अध्यादेश के तहत 5 रुपये प्रति वर्ग मीटर की दर से रिश्वत ली जाती थी।
अदालत के समक्ष ईडी ने बताया कि यह काली कमाई एक तय पदानुक्रम के हिसाब से बंटती थी। इसमें से 50 प्रतिशत कलेक्टर को, 25 प्रतिशत निवासी अपर कलेक्टर को, 10-10 प्रतिशत चिटनीस और मामलातदार को, और 5 प्रतिशत क्लर्क को मिलता था। जांच के दायरे में आई सीएलयू की कुल 842 फाइलों में से 501 फाइलें अकेले पटेल के कार्यकाल के दौरान निपटाई गई थीं।
जांच एजेंसी ने स्पष्ट किया कि पटेल सिर्फ लाभार्थी नहीं थे, बल्कि वह इस पूरे भ्रष्ट सिस्टम के मुख्य कर्ताधर्ता थे। डिजिटल मंजूरी देने का अधिकार केवल उनके पास था और उनकी सहमति या अस्वीकृति के बिना कोई भी फाइल आगे नहीं बढ़ सकती थी। यही विशेष अधिकार उन्हें उन सह-आरोपियों से अलग करता है जो अभी तक स्वतंत्र हैं। ईडी ने बताया कि अन्य आरोपियों के पास केवल फाइल डाउनलोड करने या टिप्पणी लिखने जैसे सीमित अधिकार थे।
अभियोजन पक्ष ने पीएमएलए की धारा 50 के तहत दर्ज बयानों पर भी जोर दिया। इसमें मोरी और अधिवक्ता चेतन कंजारिया के बयान शामिल हैं, जिन्होंने कथित तौर पर आवेदकों की ओर से मोरी को 65 लाख रुपये देने की बात कबूली है। बयानों में बताया गया कि अधिकारी फाइलें पास करने में जानबूझकर रुकावटें पैदा करते थे और पैसे मिलने तक बेतुके सवाल उठाते थे।
इसके अलावा, ईडी ने कुछ अन्य संदिग्ध गतिविधियों का भी खुलासा किया। पटेल की पत्नी के नाम पर 9 लाख रुपये के घोषित मूल्य वाली एक व्यावसायिक संपत्ति खरीदी गई थी, जिसकी बाकी रकम कथित तौर पर नकद चुकाई गई। जांच में 2 लाख रुपये के बेहिसाब आभूषण और एक आईफोन 17 प्रो मैक्स भी मिला, जबकि पूरे साल बैंक से सिर्फ 3,500 रुपये निकाले गए थे। इसके साथ ही 49,000 रुपये के कई नकद जमा भी पाए गए, जिन्हें पैन रिपोर्टिंग सीमा से नीचे रखने के लिए चालाकी से जमा किया गया था।
पटेल के वकील और वरिष्ठ अधिवक्ता सुधीर नानावटी ने इन सभी दलीलों का कड़ा विरोध किया। उनका तर्क था कि जिस समय ईसीआईआर दर्ज की गई, उस समय कोई मूल अपराध अस्तित्व में नहीं था, इसलिए कार्यवाही टिक नहीं सकती। उन्होंने कहा कि सारे आरोप केवल सह-आरोपियों के बयानों पर आधारित हैं और उनका कोई स्वतंत्र साक्ष्य नहीं है। बचाव पक्ष ने यह भी दलील दी कि यह सिस्टम फरवरी 2025 में पटेल के कलेक्टर बनने से पहले ही चल रहा था। इसके अलावा, घुटने की सर्जरी की आवश्यकता का हवाला देते हुए चिकित्सा आधार पर भी जमानत मांगी गई और लंबे ट्रायल के दौरान जेल में रखने को अनुच्छेद 21 का उल्लंघन बताया गया।
अदालत इन दलीलों से सहमत नहीं हुई। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि 800 तस्वीरों को रखने का उद्देश्य फाइलों की निगरानी करना बिल्कुल नहीं था, और फोन को रीसेट करने का प्रयास सीधे तौर पर सबूतों के साथ छेड़छाड़ है। अदालत ने यह भी माना कि पीएमएलए के तहत मामला चलाने के लिए पूर्व निर्धारित अपराध का होना कोई अनिवार्य शर्त नहीं है।
लॉर्ड एक्टन की मशहूर उक्ति “सत्ता भ्रष्ट करती है और पूर्ण सत्ता पूर्ण रूप से भ्रष्ट करती है” का जिक्र करते हुए अदालत ने कहा कि एक जिला प्रशासनिक प्रमुख के रूप में पटेल को जनता के हित में काम करना चाहिए था। इसके बजाय उन्होंने कथित तौर पर खुली आंखों से भ्रष्टाचार को पनपने दिया।
सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले का हवाला देते हुए न्यायाधीश ने आर्थिक अपराधों को ठंडे दिमाग से की गई साजिश बताया और इसे समाज के लिए घातक माना। अदालत ने कहा कि पटेल की चिकित्सा स्थिति जानलेवा नहीं है और उसका इलाज हिरासत में हो सकता है। साढ़े पांच महीने की हिरासत को भी जमानत के लिए पर्याप्त नहीं माना गया। अंत में अदालत ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि राष्ट्र की संप्रभुता हमेशा व्यक्तिगत स्वतंत्रता से सर्वोपरि होती है।
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