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मेडिकल के सपने के लिए ₹25 लाख: नीट पेपर लीक मामले में सीबीआई कर रही अभिभावकों से पूछताछ

| Updated: May 18, 2026 15:17

मेडिकल सीट के लिए दलालों को दिए ₹25 लाख; महाराष्ट्र के नांदेड़ और लातूर में CBI की रेड से अमीर परिवारों में मचा हड़कंप!

नीट-यूजी 2026 पेपर लीक मामले में केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) की जांच अब सिर्फ मुख्य आरोपियों, सॉल्वर गैंग और कोचिंग दलालों तक सीमित नहीं रह गई है। इस जांच का दायरा अब काफी बढ़ गया है।

एक बड़े घटनाक्रम में जांचकर्ता अब सीधे उन माता-पिता से पूछताछ कर रहे हैं जिन पर अपने बच्चों के लिए लीक हुए प्रश्नपत्र खरीदने का आरोप है। अधिकारियों का मानना है कि यह भ्रष्टाचार का एक बहुत गहरा नेटवर्क है, जिसमें ऐसे अमीर परिवार शामिल हैं जो किसी भी कीमत पर मेडिकल सीट हासिल करने के लिए बेताब हैं।

महाराष्ट्र के नांदेड़ और लातूर जिलों में हाल ही में हुई छापेमारी से यह साफ संकेत मिलता है कि यह घोटाला केवल कुछ अपराधियों द्वारा चलाया जा रहा कोई साधारण नकल रैकेट नहीं है। यह एक बहुत बड़ा तंत्र है जिसमें कोचिंग सेंटर, दलाल, पैसे वाले माता-पिता और पश्चिमी भारत के कई अन्य जिले भी शामिल हो सकते हैं।

अभिभावकों के दरवाजे तक पहुंची सीबीआई की छापेमारी

वीकेंड पर आठ सदस्यीय सीबीआई टीम ने नांदेड़ और लातूर में कई स्थानों पर एक साथ तलाशी ली। जांच एजेंसी को खुफिया जानकारी मिली थी कि कुछ परिवारों ने 3 मई की परीक्षा से पहले लीक हुए नीट-यूजी पेपर हासिल करने के लिए कथित तौर पर लाखों रुपये का भुगतान किया था।

इस छापेमारी में मुख्य निशानों में से एक नांदेड़ के विद्युत नगर इलाके में एक व्यवसायी का आवास था। जांचकर्ताओं के अनुसार, इस बिजनेसमैन ने अपनी बेटी के लिए लीक हुआ प्रश्न पत्र प्राप्त करने के लिए कथित तौर पर लगभग ₹10 लाख का भुगतान किया था।

अधिकारियों को शक है कि इस रकम में से ₹5 लाख एक बिचौलिए को दिए गए थे। बाकी के ₹5 लाख एक अन्य संपर्क के माध्यम से भेजे गए थे, जिसके बारे में माना जाता है कि वह सीधे लीक नेटवर्क से जुड़ा हुआ था।

सीबीआई अधिकारियों ने कथित तौर पर लड़की के माता-पिता से आठ घंटे से अधिक समय तक लंबी पूछताछ की। इस दौरान उनके मोबाइल फोन, इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस, वित्तीय दस्तावेजों और कॉल रिकॉर्ड्स की गहन जांच की गई।

जांच एजेंसियां अब कॉल लॉग, व्हाट्सएप चैट और डिजिटल पेमेंट हिस्ट्री खंगाल रही हैं। इसका मुख्य मकसद यह पता लगाना है कि यह पूरा लेन-देन कैसे हुआ और क्या इसमें कुछ और लोग भी लाभार्थी के तौर पर शामिल थे।

अधिकारियों का दृढ़ता से मानना है कि कई माता-पिता ने जानबूझकर इस घोटाले में भाग लिया। उन्होंने भारत की बेहद कठिन मेडिकल प्रवेश परीक्षा में सफलता पाने के लिए लीक हुए पेपरों को एक शॉर्टकट के रूप में इस्तेमाल किया।

पेपर लीक से लेकर ‘मेडिकल सीट के बाज़ार’ तक

जांच लगातार उस दिशा में इशारा कर रही है जिसे अधिकारी नीट के इर्द-गिर्द पनपा एक “व्यावसायिक तंत्र” बता रहे हैं। इस तंत्र में संगठित आपराधिक नेटवर्क के माध्यम से कथित तौर पर मेडिकल कॉलेजों में सीधे प्रवेश खरीदे जा रहे थे।

जांच से जुड़े सूत्रों का कहना है कि यह रैकेट पुणे, नांदेड़, लातूर और आसपास के जिलों में दलालों, कोचिंग संपर्कों और कुछ अन्य मददगारों की चेन के जरिए काम कर रहा था। ये लोग ऐसे परिवारों की पहचान करते थे जो पैसे वाले थे और अपने बच्चों के भविष्य को लेकर काफी चिंतित थे।

कथित तौर पर माता-पिता ने वादे के अनुसार ₹10 लाख से लेकर ₹25 लाख तक का भारी भुगतान किया। इस रकम के बदले उन्हें लीक हुए पेपर, हल की गई आंसर की और परीक्षा के दिन मदद जैसी सुविधाएं देने की बात तय हुई थी।

अब जांचकर्ताओं को शक है कि जिन माता-पिता ने पेपर खरीदे थे, उनमें से कुछ ने अपना खर्च किया हुआ पैसा वापस पाने के लिए उन पेपरों को आगे अन्य लोगों को भी बेच दिया। इससे परीक्षा से पहले ही पेपर लीक का दायरा और भी अधिक बढ़ गया।

इस बड़े घोटाले ने एक बार फिर भारत की सबसे बड़ी मेडिकल प्रवेश परीक्षा नीट को लेकर पैदा होने वाले भारी दबाव की ओर ध्यान खींचा है। इस परीक्षा में हर साल 20 लाख से अधिक छात्र सीमित एमबीबीएस सीटों के लिए कड़ी प्रतिस्पर्धा करते हैं।

कई निजी संस्थानों में मेडिकल की पढ़ाई का खर्च करोड़ों में होता है। ऐसे में माता-पिता की इसी मजबूरी और हताशा का फायदा उठाने वाले अवैध नेटवर्क पिछले कुछ वर्षों में तेजी से फले-फूले हैं।

जांच के घेरे में कोचिंग संस्थान

जांच की आंच अब सीधे तौर पर कोचिंग संस्थानों तक भी पहुंच गई है। अधिकारी उस छात्रा और पुणे स्थित एक कोचिंग सेटअप के बीच कनेक्शन की गहराई से जांच कर रहे हैं, जहां कथित तौर पर वह छात्रा परीक्षा से पहले लगभग दो सप्ताह तक रुकी थी।

इसके अलावा नांदेड़ में एआईबी (AIB) नामक एक निजी कोचिंग संस्थान पर भी विशेष ध्यान केंद्रित किया गया है। इस संस्थान ने आधिकारिक परिणाम घोषित होने से पहले ही “आने वाले परिणाम” की टैगलाइन के साथ “टॉप-परफॉर्मिंग छात्रों” की तस्वीरों वाले बड़े फ्लेक्स बैनर लगा दिए थे।

जांच एजेंसियां अब इस बात की पड़ताल कर रही हैं कि क्या इस तरह की प्रचार गतिविधि अंकों के हेरफेर की पहले से मौजूद जानकारी या रैकेट में संभावित संलिप्तता का स्पष्ट संकेत देती है।

एआईबी के अतुल मोरे ने स्वीकार किया कि वह छात्रा पहले उनके संस्थान में पढ़ती थी, लेकिन उन्होंने किसी भी गलत काम की जानकारी होने से साफ इनकार किया है।

अतुल मोरे ने कहा कि वह उनकी छात्रा थी और इस साल दोबारा नीट की तैयारी कर रही थी। उन्होंने बताया कि उनके मॉक टेस्ट में वह छात्रा आमतौर पर 400 से 450 के बीच अंक लाती थी। इसके साथ ही उन्होंने स्पष्ट किया कि वह परीक्षा से 15 दिन पहले से संस्थान नहीं आ रही थी।

यह बयान अपने आप में जांचकर्ताओं के लिए काफी अहम हो गया है। अधिकारी अब छात्रों के पिछले प्रदर्शन की तुलना नीट के संभावित परिणामों से कर रहे हैं। इससे अंकों में हुई किसी भी संदिग्ध वृद्धि को पहचाना जा सकेगा, जो लीक हुई अध्ययन सामग्री तक पहुंच का मजबूत संकेत दे सकती है।

क्या यह पिछले घोटालों से भी बड़ा है?

अधिकारियों का अब मानना है कि यह पूरा गोरखधंधा शुरुआती अनुमान से कहीं अधिक बड़ा हो सकता है। सीबीआई पहले ही कई कथित सरगनाओं, पेपर सॉल्वर और बिचौलियों को गिरफ्तार कर चुकी है।

हालांकि, अब एजेंसी का मुख्य ध्यान आर्थिक लाभार्थियों का पता लगाने की ओर जा रहा है। इसमें विशेष रूप से वे माता-पिता शामिल हैं जिन्होंने पूरी जानकारी होने के बावजूद जानबूझकर लीक हुए पेपर खरीदे थे।

पैसे का यह पूरा लेन-देन जांच का एक बहुत ही महत्वपूर्ण हिस्सा बनकर उभर रहा है। जांच अधिकारियों को शक है कि राज्यों के बीच फंड ट्रांसफर करने के लिए बड़े नकद लेन-देन, अनौपचारिक हवाला चैनलों और डिजिटल ट्रांसफर का भरपूर इस्तेमाल किया गया होगा।

इस बढ़ती जांच ने मध्य प्रदेश के व्यापम घोटाले और कई राज्यों में भर्ती परीक्षा के पेपर लीक के पिछले मामलों की कड़वी यादें ताजा कर दी हैं। आलोचकों का तर्क है कि भारत में प्रतियोगी परीक्षाएं राजनीतिक संरक्षण, कोचिंग उद्योग के लिंक और प्रशासनिक मिलीभगत से चलने वाले संगठित आपराधिक सिंडिकेट्स का तेजी से शिकार हो रही हैं।

परीक्षा की विश्वसनीयता पर देश भर में गुस्सा

नीट-यूजी 2026 विवाद ने देश भर के छात्रों और अभिभावकों में भारी आक्रोश पैदा कर दिया है। खासकर उन उम्मीदवारों में भारी निराशा है, जिन्होंने देश की सबसे कठिन प्रवेश परीक्षाओं में से एक के लिए वर्षों तक पूरी ईमानदारी से तैयारी की थी।

छात्र संगठनों और शिक्षा कार्यकर्ताओं ने अब डिजिटल सुरक्षा को सख्त करने, मजबूत जवाबदेही तंत्र बनाने और पेपर लीक रैकेट में शामिल लोगों के लिए सबसे कठोर सजा की मांग की है।

उम्मीदवारों के मानसिक स्वास्थ्य को लेकर चिंताएं भी काफी बढ़ गई हैं। प्रमुख प्रतियोगी परीक्षाओं में बार-बार भ्रष्टाचार के आरोप सामने आने से कई छात्रों ने गहरी निराशा और हताशा व्यक्त की है। छात्रों का मानना है कि यह पूरी व्यवस्था तेजी से पैसे और रसूख के पक्ष में धांधली का शिकार हो रही है।

सीबीआई के वरिष्ठ अधिकारियों का कहना है कि आने वाले दिनों में और भी छापेमारी होने की पूरी संभावना है।

जांचकर्ता अब इस बात की पुष्टि कर रहे हैं कि क्या अन्य जिलों में भी इसी तरह से पेपर का सौदा हुआ था। इसके साथ ही यह भी पता लगाया जा रहा है कि क्या महाराष्ट्र और पड़ोसी राज्यों के अन्य उम्मीदवारों ने भी इन लीक हुए पेपर्स का गलत फायदा उठाया है। एजेंसी का मानना है कि इस विशाल रैकेट की पूरी सच्चाई अभी सामने आना बाकी है।

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