गुजरात के मोरबी में सिरेमिक निर्माताओं ने अपने उद्योग की बंदी को 1 मई तक बढ़ा दिया है। इससे पहले कारखानों को बंद रखने की समय सीमा 15 अप्रैल तय की गई थी। यह फैसला गुजरात गैस लिमिटेड द्वारा पाइप्ड नेचुरल गैस (पीएनजी) की नई कीमतों की घोषणा के बाद लिया गया है। टाइल निर्माताओं का कहना है कि इन नई और महंगी दरों पर उत्पादन फिर से शुरू करना आर्थिक रूप से पूरी तरह असंभव है।
यह बंदी 17 मार्च को शुरू हुई थी, जिसका मुख्य कारण ईरान युद्ध के बीच पैदा हुआ ईंधन संकट था। मोरबी की ज्यादातर टाइल फैक्ट्रियां प्रोपेन-एलपीजी पर चलती हैं, जिसे मुख्य रूप से फारस की खाड़ी से आयात किया जाता है। होर्मुज जलडमरूमध्य में हुई नाकेबंदी से यह आपूर्ति बाधित हो गई। इसके बाद टाइल निर्माताओं ने पीएनजी का रुख किया, लेकिन ‘लौटने वाले’ ग्राहकों के लिए तय की गई पीएनजी की ऊंची कीमतों ने इस संकट को और गहरा कर दिया।
बीती 19 मार्च को जब मोरबी का दौरा किया गया, तो देखा गया कि प्रोपेन-एलपीजी का स्टॉक खत्म होने के कारण अधिकांश टाइल इकाइयां बंद पड़ी थीं। कारखानों में केवल गिने-चुने लोग ही रखरखाव का काम कर रहे थे। बाकी मजदूरों को स्पष्ट कर दिया गया था कि कम से कम 15 अप्रैल तक उनके लिए कोई काम नहीं है।
काम रुकने के कारण बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, झारखंड और ओडिशा के प्रवासी मजदूर अपने घरों को लौटने लगे थे। ये मजदूर मोरबी के अलावा 66 किलोमीटर दक्षिण में राजकोट और 200 किलोमीटर पूर्व में अहमदाबाद से लंबी दूरी की ट्रेनें पकड़कर अपने गृह राज्यों की ओर जाते दिखे।
इस सिरेमिक क्लस्टर में चार लाख से अधिक मजदूर काम करते हैं, जबकि अन्य दो लाख लोग इससे जुड़े सहायक उद्योगों पर निर्भर हैं। गुजरात में ठेकेदारों के माध्यम से लाए गए इन मजदूरों को 15,000 से 18,000 रुपये प्रति माह का वेतन मिलता है। कई मजदूरों ने बताया कि उन्हें उनके काम का पिछला कई महीनों का वेतन भी अब तक नहीं मिला है।
इन सबके बीच सेनेटरी वेयर बनाने वाले मजदूरों को इस संकट से राहत मिली है। उनकी इकाइयां प्रोपेन-एलपीजी के बजाय सीधे पीएनजी पर चलती हैं, इसलिए वे पूरी तरह से चालू रहीं। मशीनों से चलने वाली टाइल इकाइयों की तुलना में सेनेटरी वेयर में मुख्य रूप से शारीरिक श्रम की अधिक आवश्यकता होती है। मोरबी क्लस्टर के कुल कारखानों में सेनेटरी वेयर का हिस्सा मात्र 17 प्रतिशत है, जबकि बाकी 83 प्रतिशत कारखाने दीवार, फर्श और विट्रीफाइड टाइल्स बनाते हैं।
गुजरात गैस लिमिटेड ने 1 अप्रैल को गुजरात और दादरा व नगर हवेली के औद्योगिक ग्राहकों को एक पत्र भेजा था। इसमें प्रोपेन छोड़कर वापस पीएनजी अपनाने वाले ग्राहकों के लिए नियमित ग्राहकों की तुलना में 23 रुपये प्रति घन मीटर अधिक कीमत तय की गई। इन ‘लौटने वाले’ उपयोगकर्ताओं के लिए यह कीमत 88 रुपये प्रति घन मीटर और 6 प्रतिशत जीएसटी बनती है, जो कि प्रोपेन-एलपीजी के लिए चुकाई जा रही उनकी पुरानी कीमत से लगभग दोगुनी है।
एक टाइल इकाई के मालिक ने बताया कि जब कारखाने बंद किए गए थे, तब वे प्रोपेन-एलपीजी के लिए 52 रुपये प्रति घन मीटर चुका रहे थे। अब उनसे पीएनजी के लिए जीएसटी सहित 93 रुपये मांगे जा रहे हैं, जो नियमित उपयोगकर्ताओं के मुकाबले बहुत अधिक है। उनका कहना है कि इन दरों पर व्यवसाय करना किसी भी तरह से व्यवहार्य नहीं है।
भारत के 75,000 करोड़ रुपये के सिरेमिक उद्योग में मोरबी की हिस्सेदारी 90 प्रतिशत है। इस क्लस्टर में लगभग 800 इकाइयां हैं, जिनमें 650 प्रमुख और 150 छोटी इकाइयां शामिल हैं। इनमें से करीब 500 टाइल निर्माता प्रोपेन-एलपीजी का उपयोग करते हैं और प्रतिदिन लगभग 55 लाख घन मीटर ईंधन की खपत करते हैं। शेष 150 सेनेटरी वेयर इकाइयां पीएनजी का उपयोग करती हैं, जिनकी खपत प्रतिदिन 25 लाख घन मीटर है।
नियमित पीएनजी उपयोगकर्ताओं के लिए अप्रैल 2026 की कीमतें सितंबर 2025 से पिछले छह महीनों की खपत के आधार पर तय की गई हैं। 9 मार्च की केंद्र सरकार की एक अधिसूचना के अनुसार, किसी भी इकाई की ‘दैनिक अनुबंध मात्रा’ (डीसीक्यू) पिछले छह महीनों की उसकी औसत खपत का 80 प्रतिशत तय की गई थी।
चूंकि टाइल निर्माताओं ने सस्ता होने के कारण प्रोपेन-एलपीजी अपना लिया था और इस दौरान पीएनजी का उपयोग न के बराबर किया, इसलिए अब उन्हें ‘गैर-नियमित उपयोगकर्ता’ मानकर उनसे ऊंची दरें वसूली जा रही हैं।
मोरबी सिरेमिक मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन (एमसीएमए) के वॉल टाइल्स डिवीजन के नवनिर्वाचित अध्यक्ष नरेंद्र संघत के अनुसार, मोरबी की सभी इकाइयां 2007 से गुजरात गैस की ग्राहक हैं।
प्रोपेन-एलपीजी पर चलने के दौरान भी अधिकांश ने न्यूनतम बिल का भुगतान करके अपने गैस कनेक्शन चालू रखे थे। उन्होंने कहा कि यह एक विडंबना ही है कि टाइल इकाइयां पीएनजी से सस्ती होने के कारण ही प्रोपेन-एलपीजी की तरफ गई थीं।
उद्योग जगत का स्पष्ट कहना है कि लौटने वाले उपयोगकर्ताओं के लिए कीमतों में 35 प्रतिशत का यह अंतर पूरी तरह अनुचित है। एमसीएमए के विट्रीफाइड टाइल्स डिवीजन के अध्यक्ष मनोज अरवड़िया ने कहा कि एक ही उद्योग के दो अलग-अलग हिस्सों को अलग-अलग कीमतें बताना इस पूरे क्षेत्र का संतुलन बिगाड़ता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि इतने ऊंचे दामों पर गैस खरीदकर उत्पादन नहीं किया जा सकता, इसलिए बंदी को बढ़ाने का सर्वसम्मति से फैसला लिया गया है।
कम मुनाफे और अधिक उत्पादन के कारण टाइल निर्माताओं पर इस मूल्य वृद्धि का असर सबसे ज्यादा पड़ा है। एमसीएमए के फ्लोर टाइल्स डिवीजन के अध्यक्ष संदीप कुंदरिया ने समझाया कि सेनेटरी वेयर में अगर कोई उत्पाद 3,000 रुपये का है, तो उसमें 100 रुपये की लागत बढ़ोतरी को आसानी से संभाला जा सकता है। लेकिन टाइलें 12-15 रुपये प्रति फुट के हिसाब से बिकती हैं, ऐसे में 10 रुपये की बढ़ोतरी एक बहुत बड़ा अंतर पैदा करती है।
ग्राहक भी हमेशा यही उम्मीद करते हैं कि कीमतें कम होंगी और वे इन नई तथा ऊंची दरों पर खरीदारी करने से कतराते हैं। अगर कोई ग्राहक 3,000 बॉक्स का ऑर्डर देता है और बाजार में सिर्फ 1,000 बेच पाता है, तो बाकी के माल को गोदाम में रखना उसके लिए सीधे तौर पर घाटे का सौदा साबित होता है।
दूसरी ओर सेनेटरी वेयर इकाइयां अपेक्षाकृत बेहतर स्थिति में हैं क्योंकि वे हमेशा पीएनजी पर ही चलती आई हैं और उनकी खपत भी सीमित है। फिर भी, वे इकाइयां भी अब बाजार का दबाव महसूस कर रही हैं। उनके लिए भी कच्चे माल की लागत काफी बढ़ गई है। इसके अलावा, पेट्रोलियम आधारित चीजें जैसे शीट कवर और पैकेजिंग सामग्री भी अब काफी महंगी हो गई हैं।
इस पूरे घटनाक्रम पर गुजरात गैस के सेक्रेटेरियल एंड लीगल, कॉर्पोरेट कम्युनिकेशन और सीएसआर के महाप्रबंधक संदीप दवे से संपर्क करने की कोशिश की गई, लेकिन उनके फोन या टेक्स्ट मैसेज का कोई जवाब नहीं मिला। लगातार बढ़ते इस संकट के समाधान के लिए अब सिरेमिक उद्योग सीधे तौर पर सरकार के हस्तक्षेप की मांग कर रहा है।
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