विधानसभा में पेश किए गए आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, गुजरात के सरकारी स्कूलों में बच्चों को परोसे जाने वाले दैनिक मिड-डे मील (मध्याह्न भोजन) की संख्या में पिछले तीन वर्षों के दौरान 1.76 लाख की कमी आई है। हालांकि, हैरानी की बात यह है कि इसी अवधि में इस योजना पर होने वाले खर्च में 57 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि दर्ज की गई है।
आंकड़ों पर गौर करें तो प्रतिदिन दिए जाने वाले मिड-डे मील की संख्या वर्ष 2022-23 में 42,21,257 थी। यह आंकड़ा 2023-24 में घटकर 41,80,492 और 2024-25 में 40,44,689 रह गया। इस तरह पिछले तीन वर्षों के दौरान कुल 1,76,568 कम भोजन परोसे गए।
भोजन करने वाले बच्चों की संख्या घटने के बावजूद योजना का खर्च तेजी से बढ़ा है। 31 मई, 2025 तक के आंकड़ों के अनुसार, इसका बजट 2022-23 के 1,035.82 करोड़ रुपये से बढ़कर 2024-25 में 1,626.08 करोड़ रुपये तक पहुंच गया। वहीं, वर्ष 2023-24 में यह खर्च 1,155.98 करोड़ रुपये था, जिसका सीधा मतलब है कि इन वर्षों में योजना के खर्च में 590.26 करोड़ रुपये का बड़ा इजाफा हुआ है।
राज्य सरकार द्वारा दी गई जानकारी के मुताबिक, 31 मई, 2025 तक गुजरात भर के 32,266 सरकारी स्कूलों में कक्षा 1 से 8 तक के बच्चों को यह भोजन उपलब्ध कराया जा रहा था।
यह अहम जानकारी शिक्षा मंत्री प्रद्युम्न वाजा ने पिछले महीने संपन्न हुए विधानसभा के बजट सत्र के दौरान दी। दरअसल, जमालपुर से कांग्रेस विधायक इमरान खेड़ावाला ने एक अतारांकित प्रश्न के जरिए 31 मई, 2025 तक चालू मिड-डे मील केंद्रों, वर्ष 2022-23 से अब तक लाभान्वित बच्चों की संख्या और इस पर होने वाले सालाना खर्च का ब्योरा मांगा था।
सरकारी अधिकारियों का कहना है कि इस अवधि के दौरान योजना पर खर्च बढ़ने का मुख्य कारण रसोई के सामान सहित अन्य आवश्यक इनपुट लागतों में हुई भारी वृद्धि है।
प्रधानमंत्री पोषण शक्ति निर्माण (पीएम पोषण) योजना की संयुक्त आयुक्त नेहा गुप्ता ने मिड-डे मील के लाभार्थियों की संख्या में कमी का एक संभावित कारण बताया। उनके अनुसार, अब अधिक बच्चे घर से अपना खाना (टिफिन) स्कूल ला रहे हैं, जिससे सरकारी भोजन लेने वालों की संख्या घटी है।
गुप्ता ने स्पष्ट किया कि मिड-डे मील मूल रूप से एक पूरक आहार है। अक्सर देखा जाता है कि अर्ध-शहरी और शहरी क्षेत्रों के बच्चे स्कूल में घर से टिफिन लाते हैं। हालांकि, उन्होंने यह भी जोड़ा कि ग्रामीण क्षेत्रों में छात्र अभी भी मुख्य रूप से मध्याह्न भोजन का ही सेवन करते हैं।
मिड-डे मील योजना, जिसे अब पीएम-पोषण के नाम से जाना जाता है, देश भर के सरकारी स्कूलों में प्राथमिक और उच्च प्राथमिक कक्षाओं के बच्चों को मुफ्त भोजन प्रदान करने वाली दुनिया की सबसे बड़ी पहल है। गौरतलब है कि वर्ष 1984 में तमिलनाडु के बाद गुजरात इस कार्यक्रम को शुरू करने वाला दूसरा राज्य बना था और 1990 के दशक के अंत तक इसे सभी राज्यों में लागू कर दिया गया था।
गुजरात सरकार की वेबसाइट के अनुसार, कक्षा एक से आठवीं तक के स्कूली बच्चों को सभी कार्य दिवसों पर मुफ्त में गर्म पका हुआ भोजन उपलब्ध कराने वाली इस योजना के कई बड़े उद्देश्य हैं। इनमें स्कूलों में नामांकन दर बढ़ाना, ड्रॉपआउट दर को कम करना, गरीब माता-पिता पर गरीबी का बोझ कम करना और समाज में मौजूद जातीय भेदभाव को मिटाना शामिल है।
नेहा गुप्ता ने खर्च के बारे में विस्तार से बताते हुए कहा कि योजना के बजट में केवल भोजन ही नहीं, बल्कि बर्तन, किचन शेड और किचन-कम-स्टोर क्षेत्रों के निर्माण जैसी चीजें भी शामिल होती हैं। उन्होंने उदाहरण देते हुए बताया कि इस साल के बजट में स्वीकृत नई वस्तुओं में रसोई के बर्तन और भंडारण के लिए इस्तेमाल होने वाले पात्र शामिल किए गए हैं।
वांसदा से कांग्रेस विधायक अनंत पटेल के एक अलग सवाल के जवाब में पेश किए गए डेटा से पता चला कि सरकार की ओर से भोजन उपलब्ध कराने वाले गैर-लाभकारी संगठनों (एनजीओ) को किए जाने वाले भुगतान में भी बढ़ोतरी हुई है। इन संस्थाओं को 2022-23 में 77.63 करोड़ रुपये का भुगतान किया गया था, जो 2023-24 में बढ़कर 92.32 करोड़ रुपये और 2024-25 में 144.88 करोड़ रुपये हो गया।
मंत्री ने पटेल के इस सवाल का भी जवाब दिया कि कितने मिड-डे मील एनजीओ या निजी संगठनों को आउटसोर्स किए गए। इसके जवाब में एक जिलेवार सूची पेश की गई, जिसमें बताया गया कि 3,012 स्कूलों ने भोजन आउटसोर्स किया था, जिससे 6,50,155 छात्र कवर हुए। ध्यान देने वाली बात यह है कि यह आंकड़ा राज्य भर में मिड-डे मील लेने वाले छात्रों की कुल संख्या में ही शामिल है।
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