गुरुवार को अहमदाबाद में आयोजित हेरिटेज मैनेजमेंट सेमिनार में उस वक्त गहमागहमी देखने को मिली, जब यूनेस्को वर्ल्ड हेरिटेज सिटी टैग के तहत आने वाले हेरिटेज मकानों के मालिकों ने अपनी संपत्तियों के संरक्षण से जुड़ी योजनाओं को मंजूरी देने में कथित देरी को लेकर अहमदाबाद नगर निगम (एएमसी) के अधिकारियों से तीखे सवाल किए।
यह पूरी बहस ‘बिल्ट हेरिटेज कंजर्वेशन’ विषय पर हुए एक पैनल डिस्कशन के बाद शुरू हुई। इस दौरान वहां मौजूद कई लोगों ने, जिनमें पुराने शहर में अपने पांच घरों का नवीनीकरण करने का दावा करने वाले एक मकान मालिक भी शामिल थे, नागरिक निकाय से रिनोवेशन योजनाओं को मंजूरी देने के लिए एक निश्चित समय सीमा तय करने की जोरदार मांग की।
यह अपनी तरह का पहला ऐसा परामर्श कार्यक्रम था जिसे एएमसी और अहमदाबाद वर्ल्ड हेरिटेज सिटी ट्रस्ट (AWHCT) ने संयुक्त रूप से आयोजित किया था। यह सेमिनार इस महीने के अंत में यूनेस्को के प्रतिनिधियों की होने वाली संभावित यात्रा से ठीक पहले हुआ है। ये प्रतिनिधि विरासत का दर्जा प्राप्त स्थलों की समीक्षा करने के लिए शहर का दौरा करने वाले हैं।
गौरतलब है कि 9 जुलाई, 2017 को अहमदाबाद के ऐतिहासिक पुराने शहर (वॉल्ड सिटी) को भारत के पहले यूनेस्को विश्व धरोहर शहर के रूप में आधिकारिक तौर पर मान्यता दी गई थी।
कार्यक्रम के दौरान स्थिति को संभालते हुए सहायक नगर आयुक्त प्रयाग लंगालिया ने आश्वासन दिया कि निगम इस प्रक्रिया में तेजी लाएगा। उन्होंने बताया कि पिछले छह महीनों में एएमसी द्वारा लगभग 73 योजनाओं को मंजूरी दी जा चुकी है।
साथ ही, उन्होंने लोगों से अपने व्यक्तिगत मामलों पर अलग से चर्चा करने का आग्रह भी किया। हालांकि, सेमिनार में आए लोगों का तर्क था कि निगम आयुक्त के पास महीनों से फाइलें बिना हस्ताक्षर के लंबित पड़ी हैं और उन्हें इस मंच पर अपनी बात रखने का पूरा अधिकार है।
कार्यक्रम की शुरुआत में उद्घाटन भाषण देने वाले नगर आयुक्त बंछानिधि पाणि किसी अन्य व्यस्तता के कारण वहां से जल्दी चले गए थे, इसलिए वे इस तीखी बहस के दौरान मौजूद नहीं थे।
लोगों ने सेमिनार के आयोजन स्थल को लेकर भी खासी नाराजगी जताई। साबरमती के पश्चिमी तट पर स्थित रिवरफ्रंट हाउस में रखे गए इस कार्यक्रम के बारे में उनका कहना था कि इसे वॉल्ड सिटी के भीतर ही आयोजित किया जाना चाहिए था, ताकि अधिक से अधिक हेरिटेज मकान मालिक इसमें आसानी से शामिल हो सकें।
इस तनावपूर्ण माहौल के बीच हंसी का एक पल भी आया। बहस के दौरान जब लंगालिया ने कहा कि जब तक एएमसी और मकान मालिकों के बीच दूरियां रहेंगी तब तक समाधान नहीं निकल सकता, तो उन्होंने गलती से इसे ‘आपकी समस्याएं’ कहकर संबोधित कर दिया। इस पर दर्शकों में से एक व्यक्ति ने उन्हें तुरंत टोकते हुए कहा कि यह ‘हमारी समस्याएं’ हैं, जिससे वहां मौजूद सभी लोग हंस पड़े।
मरम्मत और संरक्षण की अनुमति में हो रही महीनों की देरी से निराश मकान मालिकों ने स्पष्ट किया कि उन्हें ट्रेडेबल डेवलपमेंट राइट्स (टीडीआर) योजना के तहत मिलने वाले पैसों की फिलहाल उतनी चिंता नहीं है। उनकी मुख्य मांग सिर्फ यह है कि उन्हें जल्द से जल्द अनुमति दी जाए ताकि वे अपनी ऐतिहासिक इमारतों को जर्जर होने से बचा सकें।
टीडीआर दरअसल उपयोग न किए गए निर्माण अधिकार या फ्लोर स्पेस को दर्शाता है, जिसे कोई भी भूस्वामी निर्दिष्ट क्षेत्रों में बिल्डरों को बेच सकता है। यह योजना हेरिटेज संपत्तियों के मालिकों को प्रोत्साहन देने के लिए बनाई गई है। इसका लाभ हेरिटेज वर्गीकरण और उपयोग किए गए फ्लोर स्पेस इंडेक्स (एफएसआई) के आधार पर तय होता है, जिसमें बिल्डिंग यूनिट का क्षेत्रफल मायने नहीं रखता।
आंकड़ों के अनुसार, अहमदाबाद में कुल 2,698 सूचीबद्ध हेरिटेज संरचनाएं हैं। इनमें से 2,249 आवासीय संपत्तियां हैं और 449 संस्थागत हैं, जिनमें राष्ट्रीय स्मारक भी शामिल हैं।
इस पूरे विवाद और देरी के आरोपों पर प्रतिक्रिया देते हुए उप नगर आयुक्त राम्या भट्ट ने मंजूरी में किसी भी तरह की देरी होने की बात से साफ इनकार किया। उन्होंने दावा किया कि पिछले एक साल में पहले के मुकाबले कहीं अधिक अनुमतियां जारी की गई हैं।
योजना लागू होने के बाद से अब तक 134 संपत्तियों को हेरिटेज टीडीआर प्रमाण पत्र मिल चुके हैं और लगभग 16,000 वर्ग मीटर क्षेत्र के लिए 72 करोड़ रुपये के टीडीआर को मंजूरी दी जा चुकी है।
भट्ट ने आगे बताया कि पिछले साल ही निगम आयुक्त की अध्यक्षता में एक नई समिति का गठन किया गया है, जो प्रस्तावों का बारीकी से अध्ययन कर उन्हें स्वीकृति देती है। उन्होंने यह भी कहा कि सेमिनार में सवाल उठाने वाले कुछ लोग वास्तव में आरटीआई कार्यकर्ता थे, न कि हेरिटेज मकानों के असली मालिक, और वे जिन समस्याओं का जिक्र कर रहे थे वे लगभग एक साल पुरानी थीं।
तय समय सीमा के सवाल पर उप नगर आयुक्त ने स्पष्ट किया कि जो प्रस्ताव संरक्षण नियमों और पारंपरिक तरीकों के पूरी तरह अनुरूप होते हैं, उन्हें महज एक महीने के भीतर मंजूरी दे दी जाती है। लेकिन अगर कोई व्यक्ति हेरिटेज इमारत की आड़ में प्रबलित सीमेंट कंक्रीट (आरसीसी) संरचना बनाने का प्रस्ताव लाता है, तो उसे पांच साल में भी निगम की तरफ से अनुमति नहीं मिलेगी।
गुरुवार को जारी एक आधिकारिक बयान में एएमसी ने बताया कि हेरिटेज कंजर्वेशन कमेटी के तहत एक समर्पित ‘एक्सपर्ट सब-कमेटी फॉर हेरिटेज अप्रूवल्स (ESHA)’ का गठन किया गया है। इसका मुख्य उद्देश्य अधिसूचित हेरिटेज संपत्तियों के मरम्मत और विकास प्रस्तावों की तकनीकी जांच प्रक्रिया में तेजी लाना है।
इसके अलावा, कार्यप्रणाली में पारदर्शिता और कार्यकुशलता बढ़ाने के लिए सूचीबद्ध हेरिटेज इमारतों के रिनोवेशन की अनुमति हेतु एक डिजिटल एप्लिकेशन प्रणाली भी शुरू की गई है।
बयान के अनुसार, मंजूरी की प्रक्रिया और दस्तावेजीकरण को और अधिक तेज करने के लिए एएमसी के हेरिटेज विभाग में कंजर्वेशन आर्किटेक्ट, इंजीनियर और तकनीकी कर्मियों सहित अतिरिक्त पेशेवर कर्मचारियों की भी भर्ती की गई है।
अंत में भट्ट ने कहा कि एएमसी को इस बात का अंदाजा था कि सेमिनार में इस तरह की चिंताएं सामने आएंगी, लेकिन वे हितधारकों के साथ सकारात्मक और सार्थक बातचीत को लेकर पूरी तरह आशान्वित हैं। उन्होंने आश्वासन दिया कि लोगों की शंकाओं को दूर करने के लिए आने वाले दिनों में ऐसे और भी परामर्श सेमिनार आयोजित किए जाएंगे।
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